बुधवार, 25 जून 2008

आदमी का चरित्र - तसलीमा नसरीन



जिंदा रहती हूं

आदमी का चरित्र ही ऐसा है
बैठो तो कहेगा - नहीं बैठो मत
खड़े होओ तो कहेगा,क्‍या बात हुई चलो भी
और चलो तो कहेगा, छि: बैठो।
साने पर टोकेगा-चलो, उठो
न सोने पर भी चैन नहीं,थोड़ा तो सोएगी..

उठा-बैठक करते-करते बर्बाद हो रहा वक्‍त
अभी मरने जाती हूं तो कहता है- जिंदा रहो
पता नहीं कब
जिंदा होते देख बोल पड़ेगा-छि: मर जाओ ..

बड़ा डर डर कर
चुपके-चुपके जिंदा रहती हूं।

कुछ न कुछ

कुछ पेटू पुरूष हैं
स्‍त्री को वे नरम,गाय का मांस समझते हैं
समझते हैं आम का मुरब्‍बा
समझते हैं उबला हुआ अंडा
दूध का संदेश।

कुछ बीमार पुरूष
स्‍त्री को समझते हैं रोग-शोक
सोचते हैं ठहरा हुआ जलाशय
जीवाणुओं का नष्‍ट मरघट
समझते हैं धरती पर
निम्‍नकोटि निस्‍संग प्राणी।

कुछ धर्मांध कापुरूष
स्‍त्री को समझते हैं
पसलियों का उच्छिष्‍ट हडडी से बना
अजीबोगरीब प्राणी
रमण के लिए उपयोगी
भोग की सामग्री।

कुछ विष्‍ठा हमेशा धरती पर रहता है
कुछ दुर्गंध आती ही रहती है।

3 टिप्‍पणियां:

advocate rashmi saurana ने कहा…

aapne aadmi ke charitra ko sahi bataya hai. itne kam sabdo mei itani badi bat kahane ke liye badhai.

pallavi trivedi ने कहा…

hmm..tasleema ke teekhe vichaaron ki tarah hi hain ye kavitaayen.

vijaymaudgill ने कहा…

क्या बात है। बहुत ही सही लिखा है। सच में 99 प्रतिशत आदमी ऐसा ही होता है। एक प्रतिशत इसलिए नहीं, क्योंकि कई बार वो भी समझौता करता है। अच्छा लगा पढ़कर। धन्यवाद