मंगलवार, 10 जून 2008

न्यायदंड - कविता - कुमार मुकुल


हम हमेशा शहरों में रहे
और गांवों की बावत सोचा किया
कभी मौका निकाल
गांव गए छुटि्टयों में
तो हमारी सोच को विस्तार मिला
पर मजबूरियां बराबर
हमें शहरों से बांधे रहीं

ये शहर थे
जो गांवों से बेजार थे
गांव बाजार
जिसके सीवानों पर
आ-आकर दम तोड़ देता था
जहां नदियां थीं
जो नदी घाटी परियोजनाओं में
बंधने से
बराबर इंकार करती थीं
वहां पहाड़ थे
जो नक्सलवादियों के पनाहगाह थे

गांव
जहां देश (देशज) शब्द का
जन्म हुआ था
जहां के लोग
यूं तो भोले थे
पर बाज-बखत
भालों में तब्दील हो जाते थे
गांव, जहां केन्द्रीय राजनीति की
गर्भनाल जुड़ी थी
जो थोड़ा लिखकर
ज्यादा समझने की मांग-करते थे

पर शहर था
कि इस तरह सोचने पर
हमेशा उसे एतराज रहा
कि ऐसे उसका तिलस्म टूटता था
वहां ऊचाइयां थीं
चकाचौंध थी
भागम-भाग थी
पर टिकना नहीं था कहीं
टिककर सोचना नहीं था
स्वावलंबन नहीं था वहां
हां, स्वतन्त्रता थी
पर सोचने की नहीं

बाधाएं
बहुत थीं वहां
इसीलिए स्वतन्त्रता थी
एक मूल्य की तरह
जिसे बराबर
आपको प्राप्त करना होता था
ईमान कम था
पर ईमानदारी थी
जिस पर ऑफिसरों का कब्जा था
जिधर झांकते भी
कांपते थे
दो टके के चपरासी

वहां न्यायालय थे
और थे जानकार बीहड़-बीहड़
न्याय प्रक्रिया के
शहर से झगड़ा सुलझाने
सब वहीं आते थे
और अपनी जर-जमीन गंवा
पाते थे न्याय

न्याय
जो बहुतों को
मजबूर कर देता
कि वे अपना गांव छोड़
शहर के सीमांतों पर बस जाएं
और सेवा करें
न्यायविदों के इस शहर की
पर ऐसा करते
वे नहीं जान रहे होते थे
कि जहां वे बस रहे हैं
वह जमीन न्याय की है
और प्रकारांतर से अन्याय था यह
और उन्हें कभी भी बेदखल कर
दंडित किया जा सकता था
और तब
जबकि उनके पास
कोई जमापूंजी नहीं होती थी
उनके लिए न्याय भी नहीं होता था

हां, न्याय के पास
दया होती थी थोड़ी
और दृष्टि भी
जिससे उनका इस तरह बसना वह
लंबे समय तक अनदेखा करता था
बदले में थोड़ा सा श्रम
करना होता था उन्हें
जिससे न्यायालय तक जाने का रास्ता
चौड़ा और पक्का होता जाता था
और न्याय प्रक्रिया के
अलंबरदारों के लिए
रेस्तरां-भवन-दफ्तर
तैयार होते जाते थे

अब उन आलीशान भवनों से
न्याय की तेज रफ्तार सफेद गाडि़यां
जब भागती थीं सड़कों पर
और अपने सीमांतो का
मुआयना करती थीं
तो वहां बसे वाशिन्दे
उन्हें धब्बों की तरह लगते थे
जिन्हें मिटाने की ताकीद वे
पुलिस-प्रशासन से करते
और लगे हाथ उसकी
मुनादी भी कर दी जाती थी
इस तरह
न्यायपूर्ण शहरों की सीमाएं
बार-बार उजाड़कर
पीछे धकेल दी जाती थीं
और बार-बार
न्याय की दया दृष्टि उन्हें आगे
नए सीमांतों पर टिकने की
मोहलत देती थी

शहर की जो न्याय प्रक्रिया थी
उसमें भी
सोचने-समझने की मनाही थी
इसीलिए आधी सदी से वे
नहीं सोच पा रहे थे
कि हिन्दोस्तां के
इन गर्म इलाकों में

सालों क्यूंकर
गर्म काला चोगा उठाए फिरते हैं
कि क्यों हिन्दी-उर्दू-तेलुगू-तमिल की
इस जमीन पर
अंग्रेजी-फारसी-संस्कृत
डटाए फिरते हैं

जैसे-शहर
एक तिलस्म की तरह था
उसकी न्याय प्रक्रिया भी
एक मिथक की तरह थी
और एक मिथक यह था
कि सोचने-विचारने के मामले में
अन्धी है वह
और जब-तक उसके कान के पास आकर
कोई अपनी फरियाद नहीं दुहराता
उसे कुछ मालूम नहीं पड़ता
इसके लिए उसके पास
ऊंची आवाज में विचरने वाले
हरकारे थे
जो सीमांत के बाशिंदों से
लंगड़ा संवाद बना पाते थे
ये हरकारे
न्यायप्रियता के ऐसे कायल थे
कि मुनादी के वक्त
आंखे मूंदकर
उसके आदेशों को प्रचारित करते थे
न्याय प्रक्रिया के
इस दोहरे अन्धेपन का लाभ
सीमान्त की डंवाडोल जमीन के
बाशिन्दे लेते थे
और उनकी खुसुर-पुसुर देखते-देखतेे
विचारधाराओं का रूप ले लेती थीं
और जब तक वे
अन्धे कानून को छू नहीं लेती थीं
उसे इसका इल्म तक नहीं होता था
कि उसकी नाक के नीचे
कैसी-कैसी विचारधाराओं ने
अपने तम्बू डाल रखे हैं
ऐसे में परेशान न्यायदंड
तुरत-फुरत
अपनी धाराओं की सेवाएं लेता था
मजेदार बात यह थी
कि न विचारधारा साफ दिखती थी
न धारा
स्थिति की गम्भीरता का पता
तब चलता था
जब दोनों टकराती थीं
और उसकी आवाज
न्याय के ऊंचे दंडों तक जाती थी

अब एक बार फिर
वही पुराना न्याय
दुहराया जाता था
जिसमें अच्छी कीमत अदाकर
विचारधाराओं को
थोड़ी मोहलत दी जाती थी
कि वे अपना तेवर सुधार सकें

न्यायदंड के आस-पास
उसकी सहूलियत के
सारे साजो-सामान भी थे
यथा जेलें थीं
आदर्श कारागृह
वहां बुद्ध की
ऊंची पत्थर की मूर्ति थी
क्योंकि वहीं वह सुरक्षित थी
और कारागृह के निवासियों को
उसकी छाया में शान्ति मिलती थी
जो मोबाइल-चैनल्स-सुरा-सुन्दरी
और मनोरम उत्तर-आधुनिक अपराधों का
सेवन करते
वहीं टेक लेते
बिरहा और चैता का गायन सुनते
लोकगीतों के रसिक सीएम, पीएम
अपने काफिलों के साथ
महीनों वहीं छुिट्टयां मनाते थे
इसके लिए उन्हें न्यायदंड की
धाराओं की
सेवाएं लेनी पड़ती थीं
फिर जेलों से बाहर आते ही वे
जेल प्रशासन की मुस्तैदी की
समीक्षा करते थे
कारागृहों का यह रूप देखकर
उत्तर रामकथा वाचकों का मन भी
विचलित हो जाता था
और धन-बल-पशुओं को
गीता का उपदेश देने
वे भी वहां जा धमकते थे

न्यायदंड के आस-पास
बिखरे हुए थाने थे
जो पूंजी-प्रसूतों को रास आते थे
बावजूद इसके ये थाने
ढहती लोककला के अद्भुत नमूने थे
जिसकी दीवार के पलस्तर के भीतर से
लाल ईंटें
अपना बुरादा झारती रहती थीं
और रात में जिन्हें
लालटेन की नीम रोशनी रास आती थी
न्यायदंड की सुरक्षा के लिए तैनात
ये थाने थे
जिनकी जीपें
जनता के उस खास वर्ग की
सेवा में जाती थीं
जो कि उसमें पेट्रोल भरा पाती थीं
जहां वैसी मुट्ठी गर्म करने वाली
जनता नहीं थी
वहां पुलिस भी नहीं थी
इसीलिए विकल्प की तरह वहां
आतंकवादी थे

राजभाषा के सारे कवि
न्यायदंड के पास ही निवास करते थे
अपनी अटारियों से वे
पृथ्वी-पृथ्वी चिल्लाते थे
पर पृथ्वी से उनका साबका इतना ही था
जितनी कि उनके गमलों में मिट्टी थी
जिसे सुबह-शाम पानी देते
वे निहारते थे हसरत से

ये कवि थे
और काले बादलों को देख
इनका खून
भय से सफेद पड़ जाता था
ये कवि थे जो न्यायदंड से
अपना प्रेमपत्र बचाने की
याचना किया करते थे

और न्यायदंड प्रेमपत्र तो नहीं
उन कवियों को जरूर बचा लेता था

वह उन्हें कीमती जूते प्रदान करता था
जो न्यायदंड को देखते ही
खुशी से मचमचाने लगते थे
वह उनकी कमरों को
बल (लोच) प्रदान करता था
जिस पर कलाबाजी खाते वे
विचारों को
महामारी की तरह देखते थे
और खुद को उससे बचाने की जुगत
भिड़ाते रहते थे
इनका एक काम
जनता की कारगुजारियों से
न्यायदंड को आगाह करना भी था

इन शहरों में
सार्वभौम कला की तरह
तोंदें थीं
जिसके हिसाब से मोटर कम्पनियां
अपनी डिजाइनें बदलती रहती थीं
नतीजतन सड़कों पर
डब्बे की शक्लवाली
बूमों-मन्तरों-काटिज आदि गािड़यां
बढ़ती जा रही थीं
यहां अपहरण और नरसंहार
एक उद्योग था
जिसकी रिर्पोटिंग को
पत्रकारिता कहते थे
और पत्रकार खबरें नहीं लिखते थे
विवस्‍त्र रक्तिम लाशें गींजते थे
उनकी जातियों का हिसाब लगाते थे
और जनता सुिर्खयों में तब आती थी
जब वह गोलबन्द हो
रैलियों में हिस्सा लेने आ धमकती थी
राजनेताओं के बाद प्रेस
चििड़याखानों के जीवों की
गतिविधि बताना
ज्यादा जरूरी समझते थे
क्योंकि उसका नगर के पर्यावरण पर
सीधा असर पड़ता था

बन्दूक पर निशाना साधते-साधते
हत्यारों-अपहत्ताओं और
निजी सेनाओं के स्त्री-शिशु संहारकों की
एक आंख कमजोर हो गई थी
इसीलिए मीडिया में जब भी
उसकी तस्वीर उभरती थी
तो उसकी एक आंख और आधा चेहरा
गमछे से ढंका होता था

इस बारे में लोगों के
जुदा-जुदा खयालात थे
कि ऐसा वे पहचाने जाने के
भय से करते थे
पर जनमत की राय यह थी कि
खौफ को सार्वजनिक करने के लिए
वे ऐसा करते थे

बुद्ध के बाद गांधी
हत्यारों की पहली पसन्द थे
मीडिया पर इश्तेहारों में
हिंसा को वे मजबूरी बतलाते
और मीडियाकर (दलाल) उनमें
गांधी की अकूत सम्भावनाएं तलाशते
थकते नहीं थे !

यह कविता 2002 के युद्धरत आम आदमी के युवा विशेषांक में छपी थी।

5 टिप्‍पणियां:

hakim hari ram ने कहा…

वाह क्या लाजवाब है शब्दों के अहसास की रचना कुमार बाबू ये आपका यथार्थवादी सोच है ..कुमार बाबू आप शब्दों के मर्म से समाज को जो दिशा और समझाने की कौशीश कर रहे निसंदेह वो पर्शंस्नीय है ..
आपकी कवीता के बारे में इतना ही कहूंगा की .....

मस्तिष्क का जवार
और वेचारो की आंधी
हर्दे की धारा को
वापीस
पर्वतों में मोद्ती है
वही पर मान्य्ताये
दम तोड़ती है .........
..काश आप के शब्द का मर्म हर कोई समझ पाता........
आपका स्नेहेहील ..हकीम हरी हरण "हथोड़ा"

pallavi trivedi ने कहा…

lambi zaroor hai aapki kavita lekin yathaarthvaadi bhaavon se otprot hai..umda.

preeti ने कहा…

उनके पास
कोई जमापूंजी नहीं होती थी
उनके लिए न्याय भी नहीं होता था

preeti ने कहा…

उनके पास
कोई जमापूंजी नहीं होती थी
उनके लिए न्याय भी नहीं होता था

balaji ने कहा…

SORRY SIR, IT IS NOT A POEM, IT IS COMPLAINTY LETTER JUST LIKE VICTIM WRITE TO GOVT. DEPARTMENT...