कारवॉं

नयी मंज़िल के मीरे-कारवाँ भी और होते हैं
पुराने ख़िज़्रे-रह बदले वो तर्ज़े-रहबरी बदला
-फ़िराक़ गोरखपुरी

रविवार, 1 जून 2008

अरेंज्‍ड मैरिज-1 : कविथा : कुछ कविता-कथानुमा - कुमार मुकुल



बना लेगी वह अपने मन की हंसी...

अक्‍सर वह
मुझसे खेलने के मूड में रहती है
खेलने की उम्र में
पहरे रहे हों शायद
गुडि़यों का खेल भी ना खेलने दिया गया हो
सो मैं गुड्डों सा रहूं
तो पसंद है उसे
मुझे बस पड़े रहना चाहिए
चुप-चाप
किताबें तो कदापि नहीं पढनी चाहिए
बस
मुस्‍कुराना चाहिए
वैसे नहीं
जैसे मनुष्‍य मुस्‍कुराते हैं-
तब तो वह पूछेगी-
किसी की याद तो नहीं आ रही
फिर तो
महाभारत हो सकता है
इसीलिए मुझे
एक गुड्डे की तरह हंसना चाहिए
अस्‍पष्‍ट
कोई कमी होगी
तो सूई-धागा- काजल ले
बना लेगी वह
अपने मन की हंसी
जैसे
अपनी भौं नोचते हुए वह
खुद को सुंदर बना रही होती है

मेरे कपड़े फींच देगी वह
कमरा पोंछ देगी
बस मुझे बैठे रहना चाहिए
चौकी पर पैर हिलाते हुए
जब-तक कि फर्श सूख ना जाए
मेरे मित्रों को देख उसे बहुत खुशी होती
उसे लग‍ता कि वे
उसके गुड्डे को देखने आए हैं
वह बोलेगी-देखिए मैं कितना ख्‍याल रखती हूं इनका
ना होती तो बसा जाते
फिर वह भूल जाती
कि वे उसकी सहेलियां नहीं हैं
और उनके कुधे पर धौल दे बातें करने लगेगी
बेतकल्‍लुफी से
बस मुझे
चुप रहना चाहिए इस बीच

मेरे कुछ बोलते ही
जैसे उसका गुड्डों का खेल
समाप्‍त होने लगता है
पहले तो खेल भंग होने के दुख में
काठ मार जाएगा उसे
फिर या तो वह रोएगी चुप-चाप
या सरापते हुए बहाएगी टेसुए-
कि बरबार कर दूंगी तुमको
फिर हम दोनेां में एक गुमनाम झगड़ा
शुरू हो जाएगा
जिसमें घर की जरूरी सार्वजनिक बातों के अलावे
अन्‍य आपसी मुद्दों पर
कोई बातचीत नहीं होगी
मेरे कपड़े साफ कर देगी वह
पर खाना देने नही आएगी
आएगी तो रोटी करीब फेंकते हुए देगी

हां
सोने से पहले
एक ग्‍लास पानी जरूर लेकर आएगी वह
-जिसे मैं चुप-चाप पी लूंगा

यह पानी का ग्‍लास
जैसे मील का पत्‍थर हो हमारे झगड़े में
अब-तक
इस एक ग्‍लास पानी के पत्‍थर को
पार नहीं कर पाए हैं हम

अक्‍सर पानी नहीं पीने के बाद
छोटे से मनाने जैसे झगड़े के बाद
फिर मिलन हो जाता
पर यह पूर्णिमा
माह में एक ही बार आता
बाकी चौथायी चांद से
चौदहवीं के चांद तक
कई स्‍तर होते हैं बीच में
पर साल में कभी-कभार
यह पूर्णिमा गायब होकर
चंद्रग्रहण का रूप ले लेता
असामाजिक अराजकतोओं के
राहू-केतु
जैसे उसके हमारे बीच के चंद्र को ग्रस लेते

इस दौर में लगातार
उसका हमला जारी रहता

मौखिक आलाप से
शारीरिक आदान-प्रदान तक
इस लड़ाई को मुझे
एक खेल की तरह निबाहना पड़ता
और अखीर में
अपनी ही लाश पर सवार होकर मुझे
चंद्रग्रहण काल की वैतरणी
खुद पार करनी पड़ती है ...

4 टिप्‍पणियां:

राजीव रंजन प्रसाद ने कहा…

मुकुल जी,

प्रभावी रचना है, पंक्तियाँ संवेदित करती है।

***राजीव रंजन प्रसाद

बेनामी ने कहा…

Aapki kavita mere bachpan ke ghar ki tasvir hai,Mukul ji.
aaj main apne ghar se bahut door hu,na jaane kyon aankhe bhar aayee.

Dhanyavad

shashi ने कहा…

mukuljee aapka aatm-kathy jo is kvita me hai, use padhkar mai rone laga...aapke jivan me bhi .....

बेनामी ने कहा…

Ruke kyon hai?Arranged Marriage-1 se aage kya?Kripya likhe, Mukul ji
Intejar hai aur besabri bhi