कारवॉं

नयी मंज़िल के मीरे-कारवाँ भी और होते हैं
पुराने ख़िज़्रे-रह बदले वो तर्ज़े-रहबरी बदला
-फ़िराक़ गोरखपुरी

शुक्रवार, 23 मई 2008

नरीमन प्‍वाइंट पर - कविता - सैलानी सिंह

कुंवारी लड़की
बेचती है गजरे
लुभाती है नये-पुराने जोड़ों को
गजरों की गंध से
चंद जोड़ा वड़ा-पाव के वास्‍ते

कुंवारी लड़की बेचती है गजरे

कुंवारी लड़की नहीं जानती
बिस्‍तर की सलवटों के मायने
देहों के संसर्ग का अर्थ
देह की भूख की गंध का
उसे नहीं पता

उसे पता है
पेट की भूख
वड़ा-पाव की गंध
और चार जोड़ा खाली पेटों का इंतजार

कुंवारी लड़की
बेचती है गजरे
नरीमन पाइंट पर...

2 टिप्‍पणियां:

pallavi trivedi ने कहा…

waah...bahut khoob chitran kiya hai.

संदीप ने कहा…

achchi kavita hai