शनिवार, 3 मई 2008

नगरपुरूषों से सवाल करती नगरवधुएं - कुमार मुकुल


अजन्‍ता देव की कविताएं

नृत्‍या, गीत, चित्रकला और कविता के क्षेत्र में सक्रिय 1958 में जोधपुर में जन्‍मीं फिलहाल भारतीय सूचना सेवा से संबद्ध अजन्‍ता देव की कविताओं की पचास पृष्‍ठों की एक पुस्तिका आई है - एक नगरवधू की आत्‍मकथा। इसमें संकलित कविताएं नगरबधू के बहाने जिस तरह स्‍त्री की सतत पीड़ा को अभिव्‍यक्‍त करती हैं, वह अवाक करने वाली है -

मैं हर दिन बदलती हूं चोला
श्रेष्‍ठजनों की सभा में
आत्‍मा नहीं हूं मैं
कि पहने रहूं एक ही देह
मृत्‍यु की प्रतीक्षा में ।


पारंपरिक शब्‍दावलियों का प्रयोग कर जिस तरह अजन्‍ता परंपरा से चले आरहे पाखंड का शिरोच्‍छेद करती हैं वह विस्मित करता है।

... पर मैं नहीं पृथ्‍वी सी
कि धारण करूं विराट
... मुझे तो चाहिए एक पोशाक
जिसे काटा गया हो मेरी रेखाओं से मिलाकर
इतना सुचिक्‍कन कि मेरी त्‍वचा
इतने बेलबूटे कि याद न आये
हतभाग्‍य पतझर
सारे रंग जो छीने गये हों
अन्‍य जीवन से

इतना झीना जितना नशा
इतना गठित जितना षडयंत्र


ये पंक्तियां जीवनजगत के तमाम सुगठित व्‍यापारों की पोल खोलती हैं, उसके झीनेपन के बहाने खुद पर तारी किए गए नशे की पोल, षडयंत्रों के सुव्‍यवस्थित होने की पोल और अन्‍य जीवन से छीने कर उसे खुश करने को लाए गए तमाम रंगों की पोल।

यूं ही कभी
हठात मत चले आना
मेरे रंग महल में
आया था जैसे भर्तृहरि सा जोगी
और देखकर
मेरी निष्‍प्रभ आंखें फीके अधर पीली त्‍वचा
और उजड़े केश
कह गया था
हाय
प्रात: नभ का चंद्रमा।


ये कविताएं स्‍त्री के सौंदर्य के नाम पर जो खेल चलता है उसकी तहें बाहर करती हैं कि सौंदर्य तो हमेशा आरोपित आकाक्षाओं का स्‍वरूप होता है। कि उसकी सच्‍चाई को स्त्रियों के आंसुाओं से बनी शराब को चखकर कर ही जान सकते हैं श्रेष्‍ठजन। पर नगरवधुएं उनसे पूछती हैं कि क्‍या वे उसमें तैरते काजल का स्‍वाद भी जानते हैं। जिसे वे रोज चखते हैं। कि वह काजल उनकी झूठी भावविगलित प्रशंसा को सहन करने को अर्जित उनके कपट से काले पड़ गए उनके हृदयों की राख से ही बनता है।

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