कारवॉं

नयी मंज़िल के मीरे-कारवाँ भी और होते हैं
पुराने ख़िज़्रे-रह बदले वो तर्ज़े-रहबरी बदला
-फ़िराक़ गोरखपुरी

मंगलवार, 6 मई 2008

दुश्‍मन - कुमार मुकुल - व्‍यंग्‍य

हैदराबाद के उस अखबार के दफ्तर में प्रवेश के पहले ही दिन मेरे सांस्‍थानिक अभिभावक ने मुझे उसकी बाबत बता दिया था - कि देखिए वहां एक दुश्‍मन भी है आपका। पर आपको इससे क्‍या लेना-देना है- आज के जमाने में दुश्‍मनी कौन निभाता है,काम से काम रखिएगा, पर इसका यह मतलब नहीं कि उससे डर के रहिएगा। अरे रे उसकी औकात ही क्‍या है ...पर क्‍या कीजिएगा कि समय ही ऐसा है कि ...
जिस संस्‍थान में मुझे काम करना था उसके बास का गोतिया था वह- ठीक है, गोतिया शब्‍द खुद दुश्‍मनी का परिचायक है नहीं तो उसे भैयाड़ी नहीं कहा जाता- पर इस शब्‍दावली के गांव में जो अर्थ निकलते हैं महानगर की एक लोकतांत्रिक सी संस्‍था में उसके विपरीत मानी हो ही जाना है्...
अब गांव में बास चाहे इसकी जमीन पर नजर रखता हो पर इस अज्ञात कुलशीलों की भीड़ महानगर में वह उसे गले लगाकर नहीं रखे तो करे क्‍या ...
मेरे संस्‍थापक ने शब्‍दों से उसका जो खाका खींचा था तो लगा कि मेरा दुश्‍मन गांव के किसी बिगड़ैल बाभन जैसा होगा पर जब उसे देखा तो वह किराने के सेठ जैसा निकला ... मैंने सोचा कि क्‍या दुर्गति है - इसकी तो यूं ही किसी दिन धुकधुकी निकल जाएगी सीढियां चढते। फिर शायद मुझे ही एुबुलेंस बुलानी पड़े। पर हाय रे विधाता - इस बनडमरू को ही मेरा दुश्‍मन बनाना था।मैं चिंता में पड़ गया कि इससे दुश्‍मनी क्‍या खाक निभेगी। और एक लोकतांत्रिक संस्‍थान में दुश्‍मन के बगैर रहा ही कैसे जा सकता है- फिर दुश्‍मन तो था ही वह नामालूम सा ही सही ...

1 टिप्पणी:

DR.ANURAG ARYA ने कहा…

likhte rahe....agli kadi ka intzar hai...