कारवॉं

नयी मंज़िल के मीरे-कारवाँ भी और होते हैं
पुराने ख़िज़्रे-रह बदले वो तर्ज़े-रहबरी बदला
-फ़िराक़ गोरखपुरी

शनिवार, 12 अप्रैल 2008

हमने भगवान को पत्‍थर समझ के छोड दिया - आर चेतनक्रांति


क्‍या जाने करता है क्‍या महबूब का जलवा
सिजदे से उठा करते हैं होकर के कोई और।

दुनिया से जब मिला नहीं जो हमने था मांगा
देते फिरे दुनिया को जो था पास हमारे।

ना कोई शब्‍द ना आवाज ना स्‍पर्श कोई
हमने भगवान को पत्‍थर समझ के छोड़ दिया।

तपते हुए माथे पे ना रखा किसी ने हाथ
जल जल के अपनी आग में हम राख हो गये।

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