गुरुवार, 3 अप्रैल 2008

हरेप्रकाश का आप कुछ नहीं उखाड़ सकते - यशवंत सिंह

शशीभूषण द्विवेदी का आत्‍मवक्‍तव्‍य

बुराई के पक्ष में होने की बेशर्म घोषणा करने वाले तथाकथित कवि हरेप्रकाश उपाध्‍याय की काली करतूतों का कोई अंत नहीं है। उसकी बदतमीजी,बददिमागी और खुराफातों का एक भुक्‍तभोगी मैं भी हूं। यह बात आज मुझे बहुत पीड़ा और दुख के साथ कहनी पड़ रही है। हरेप्रकाश की बेहूदगियों का एक लंबा इतिहास रहा है और इसके शिकार एक-दो नहीं,मेरे समेत दर्जनों रहे हैं जिसमें प्रसिद्ध आलोचक विजय कुमार,कर्मेंदु शिशिर,अजय नावरिया,भाषा सिंह,वंदना देवेंद्र,वंदना मिश्र जैसे कई लोग हैं।
मेरे साथ जो कुछ हुआ,उस पर मैं अब तक चुप रहा और बार-बार उसे माफ करता रहा। कारण शायद उसका कवि होना हो,एक-दो बार के उसके मुझ पर छिटपुट एहसान हों या शायद अखिलेश जी की उसके प्रति आत्‍मीयता हो,यूं हर नये रचनाकार के प्रति उनकी आत्‍मीयता रहती है,सबसे बड़ा कारण मेरी अपनी ही एक कमजोरी थी-भावुकता,जिसका हमेशा उसने बेजा लाभ उठाया। फिर चूंकि हम एक ही दफ्तर में काम करते हैं इसलिये यह सोचकर कि माहौल खराब न हो,अपनी पहल पर संबंधों को सुधारने की कोशिश की पर अब तो हद ही हो चुकी है।
सारे साहित्‍य समाज को पता है कि अभी हाल ही में मेरे जबड़े में तीन फ्रैक्‍चर आये। आपरेशन में करीब 70 000 सत्‍तर हजार खर्च आया। वो तो संयोग से नौकरी की वजह से मेरे पास मेडिक्‍लेम पालिसी थी सो इतना बड़ा झटका मैं झेल गया। खैर... मैंने एकाध मित्रों के अलावा सार्वजनिक रूप से कभी नहीं कहा कि आखिर ये हादसा हुआ कैसे...सच्‍चाई ये है कि सामान्‍य बातचीत और बहस के दौरान अपने पागलपन की वजह से हरेप्रकाश ने मुझे बहुत खतरनाक ढंग से धक्‍का दिया था। इससे पहले भी एक बार उसने ऐसी ही हरकत की थी जिससे मुझे कान के नीचे चोट आई थी और उस घटना के गवाह कथाकार रामजन्‍म पाठक हैं। पाठक के सामने ही गुंडई करते हुए उसने कहा था कि - मैं सुनील पांडे,बिहार का कुख्‍यात माफिया,के गैंग में उसकी एके47 लेकर घूमा हूं। दरअसल,यह हरेप्रकाश की प्रवृत्ति है। जोड़-तोड़ ,तिकड़म और गुंडागर्दी उसका स्‍वभाव है। जबड़ा टूटने की घटना से उबरने के बाद उसके साथ मैंने बातचीत बंद कर दी थी लेकिन दफ्तर में कुछ मित्रों के बीच-बचाव के बाद एक बार फिर मैंने उसे माफ किया और संबंधों को सुधारने की कोशिश की मगर दो दिन के भीतर ही वह अपनी आपनी औकात पर आ गया। उसने न केवल मेरे साथ मार-पीट की बल्कि मां-बहन की गंदी-गंदी गालियां भी दीं। गाली गलौज और माफी मांगने की भंगिमा के एसएमएस अब भी मेरे पास सुरक्षित हैं। इस बीच कवयित्री वंदना देवेंद्र ने रोते हुए मुझे फोन किया और तस्‍दीक करनी चाही कि हरेप्रकाश उनके बारे में क्‍या बकवास करता है। मैं कहना नहीं चाहता था क्‍योंकि वे सारी बातें बहुत अश्‍लील हैं। बहरहाल,यह एक सामंती और विकृत दिमाग का व्‍यक्ति है जिसने एक बार खुद मुझसे कहा था कि दलितों और औरतों को जूते की नोंक पर रखना चाहिये।
ऐसा आदमी साहित्‍य में क्‍यों है - मैं समझ नहीं पाता। हाल ही में इसने हमारे वरिष्‍ठ कथाकार और पितातुल्‍य
ब्रजेश्‍वर मदान के साथ भी गाली-गलौज की। अब फैसला आपको करना है।

शशीभूषण के वक्‍तव्‍य पर आई टिप्‍पणियां
बोधिसत्व
विवाद और बहस अपनी जगह हैं पर किसी के प्रति शारीरिक हिंसा निंदनीय है....

शेष
इस दुष्ट आदमी ने कोई पहली बार यह "करामात" नहीं किया है। मगर पता नहीं यह हमारा कैसा साहित्य समाज है कि अब तक इसे सिर-आंखों पर बिठाए घूम रहा है। निजी तौर पर अपमानित करने, प्रताड़ित करने और आपराधिक हरकतें करने के किस्से जगजाहिर होने के बावजूद इसे "भाई हरेप्रकाश" कहने वाले महानुभावों की कमी नहीं रही है। जहां तक बहस की बात है, तो यह आदमी उस लायक ही नहीं है। और अगर बोधिसत्त्व जी शारीरिक हिंसा के अलावा उनके सारे "विवाद" और बहस को स्वीकार्य करने के लिए तैयार हैं तो एक सवाल हम सबके लिए है कि क्या हम तब किसी गाली-गलौज और अश्लील हरकतों को आपत्तिजनक नहीं मानेंगे जब तक वह हमारी बेटी, बहन या पत्नी को संबोधित नहीं हो। हरेप्रकाश उपाध्याय ने अब तक किया क्या है? शशीभूषण के साथ उसने जो किया है, अगर उसे माफ किया गया तो समझ लीजिए कि उसके हर अपराध में हम खुद शरीक होंगे।

यशवंत सिंह
hare prakash original aadmi hai jo kabhi banawati jeevan nahi jiya. jo dil me hota hai wahi muh pe bhi hota hai. mere khayal se aise sahaj logo se sabhi ki phati rahti hai. aap ye sab jo likhkar kar rahe hai, wo ek tuchchi harkat hai. par es sabase hare prkash ka aap kuchh nahi ukhad sakte. aap rote rahiye, lekin apne andar bhi jhankiye ki aakhir aapka jabda todne ki sthiti aayi kyon?

Raviratlami
साहित्य में मारधाड़ के कुछ प्रसंगों को आपने सप्रयास संजोया है. निस्संदेह और भी ढेरों होंगे. आग्रह है कि उन्हें भी दस्तावेज़ीकृत करें ताकि सनद रहे...

khalid A khan
शायद लेखकों ने आलोचना करने का तरीका बदल दिया है .वे कलम छोड़ कर हाथ पैर से काम लेने लगे हैं ,और गुटबाजी तो हर जगह अपने पैर फैला चुकी है .फिर साहित्य समाज इससे केसे अछूता रह सकता है

1 टिप्पणी:

shashi ने कहा…

यशवन्त जी आपके ओरिजिनल आदमी हरे प्रकाश के मुख पर अगर दलिटो और महिलाओ को जुटे की नोक पर रखने की बात आई तो जाहिर है की उनके दिल मे भी वही सब होगा. शशि भूषण द्विवेदी