कारवॉं

नयी मंज़िल के मीरे-कारवाँ भी और होते हैं
पुराने ख़िज़्रे-रह बदले वो तर्ज़े-रहबरी बदला
-फ़िराक़ गोरखपुरी

गुरुवार, 27 मार्च 2008

आभा की कविताएं



घृणा से
टूटे हुए लोगों
दर्पण और अनास्‍था से
असंतुष्‍ट महिलाओं को
वक्‍तव्‍य न दो।

मोहित करती है वह तस्‍वीर
जो बसी है रग रग में
डरती हूं
कि छू कर उसे मैली ना कर दूं
हरे पत्‍तों से घिरे गुलाब की तरह
खूबसूरत हो तुम
पर इसकी उम्‍मीद नहीं
कि तुम्‍हें देख सकूं
इसलिए
उद्धत भाव से
अपनी बुद्धि मंद करना चाहती हूं।

बचपन में परायी कहा
फिर सुहागन
अब विधवा
ओह किसी ने पुकारा नहीं नाम लेकर
मेरे जन्‍म पर खूब रोयी मां
मैं नवजात
नहीं समझ पायी उन आंसुओं का अर्थ
क्‍या वाकई मां
पुत्र की चाहत में रोई थी।

मेरी तकदीर पर वाहवाही लूटते हैं लोग
पर अपने घ्रर में ही
घूमती परछाई बनती जा रही मैं
मैं ढूंढ रही पुरानी खुशी
पर मिलती हैं तोडती लहरें
खुद से सुगंध भी आती हैं एक
पर उस फूल का नाम
भ्रम ही रहा मेरे लिए।

शादी का लाल जोडा पहनाया था मां ने
उसकी रंगत ठीक ही थी
पर उसमें टंके सितारे उसकी रंगत
ढंक रहे थे
मुझे दिखी नहीं वहां मेरी खुशियां
मुझ पर पहाड सा टूट पडा एक शब्‍द
शादी
बागों में सारे फूल खिल उठे
पर मेरी चुनरी की लाली फीकी पडती गयी
बक्‍से में बंद बंद।

1 टिप्पणी:

शेष ने कहा…

जमशेदपुर, पटना और अब दिल्ली। कितना फर्क है आभा जी। जितना मैं जानता हूं, कविता उनका वह पक्ष सामने रखती है, जहां कहने और करने में कोई फर्क नहीं होता। बेटे का कैंसर उनके भीतर की ताकत में और कितना इजाफा कर सका है, अगर किसी को यह जानना हो तो उनके काम को देखना होगा। बहुत-बहुत बधाई आभा जी।