शनिवार, 22 मार्च 2008

मीना कुमारी - कविता - कुमार मुकुल


दर्द
तुम्‍हारी आंखों में नहीं
हमारी रगों में होता है

छू देती हैं
निगाहें

उभर आता है दर्द
फफोले-फफोले।

यह कविता मेरे दूसरे कविता संकलन सभ्‍यता और जीवन से है।

3 टिप्‍पणियां:

Mrs. Asha Joglekar ने कहा…

जितना खूबसूरत शेर उतनी ही खूबसूरत तस्वीर ।
शुक्रिया ।

मीत ने कहा…

जैसे जागी हुई आंखों में चुभें कांच के ख़्वाब
रात इस तरह दीवानों की बसर होती है -
मीना कुमारी का ही एक शेर

Ek ziddi dhun ने कहा…

`ये आँखें हैं तुम्हारी/या दर्द का उमड़ता समंदर...`