मंगलवार, 18 मार्च 2008

अपने आज की झुर्रियां हम कल के चेहरे पर नहीं डाल सकते - संदर्भ - आलोक धन्‍वा


घर की जंजीरें
कितनी साफ दिखायी देती हैं
जब कोर्इ लड़की घर से भागती है

यह आलोक धन्‍वा की कूबत ही थी कि अपने घर की जंजीरें भी वे दिखला सके। वर्ना बाकी रचनाकारों के घर की सांकलों के पीछे झांकने की हिमाकत कौन कर सकता है ...। हम तो वह ही देख सकते हैं जो वे दिखाएं। अरसे बाद इसबार पटना गया तेा आलोक जी को फोन किया तो उनकी एक सेविका ने कहा साहब नाश्‍ता कर रहे हैं। कुछ देर बाद उनका फोन आया और वे बोले कि शाम में सात बजे आएं तेा बातें हों, कुछ कविताएं भी लेते आएंगे अपनी। शाम गया पर अपनी कविताएं नहीं ले गया साथ थी ही नहीं नई कविताएं।
विष्‍णु भवन पहु्ंचा तो आपने फ्लैट में कुछ वैसी ही स्थितियों में थे जिस में साल भर पहले देखा था। उसी तरह एक पुरानी कुर्सी पर बैठे थे। जाड़ा अब नहीं था पर ओवरकोट डाले थे। पिछले महीनों वे जांडिश और फिर मलेरिया से उबरे, हड्डी का ढांचा थे। वैसे भी पिछले सतरह सालों से उस ढांचे पर कहां चर्बी चढ पायी कभी। हां एक चमक आती जाती रही। जाते ही वे शुरू हो गये। कौन चुप कराये उनकेा कि यह आपके हित में नहीं। बोलते समय कमजेारी से मुंह से चप चप की आवाज बीच बीच में आती थी।
तो यह मेरा सबसे प्‍यारा कवि था हमारे सामने। क्‍या उसे अपने बारे में कुछ बताने की जरूरत थी। मैं क्‍या हिंदी जगत जानता है उसे। वे दुखी थे प्रेमकुमार मणि के उस संपादकीय को लेकर जिसमें उन्‍हें लिजपिज और विनोबायी लिखा था उन्‍होंने। इन बातों का मेरे लिए कोई मतलब नहीं। जैसे हमारे पडोंसी पत्रकार श्रीकांत ने मणि जी के संपादकीय को लेकर कहा कि तब तो हम मणि जी को संघी कहेंगे जदयू और भाजपा से उनके रिश्‍ते को लेकर। पर मणि जी को जानने वाले जानते हैं कि वे संघ से बराबर लड़ते रहे हैं। उसी तरह जैसे आलोक जी को लोग उनके संघर्षों को लेकर जानते हैं। आज उनका या किसी का भी बुढापा या बीमारी के चलते आया लिजपिजापन कल के आलोक की लानत मलामत के काम नहीं लाया जा सकता। मणि जी भी मेरे प्रिय रचनाकारेां में हैं। उनके उपन्‍यास की ताकत को मैं नहीं भूल पाता। ढलान अपनी तरह का अकेला उपन्‍यास है उस पर बात नहीं हो सकी ठीक से, हर बार यह जरूरी भी नहीं। पर इससे उसका महत्‍व कम नहीं हो जाता। हमारे आज के चेहरे पर अगर झुर्रियां आती हैं तो उसे हम अपने युवा दिनों के चेहरे पर नहीं डाल सकते। हमारे प्रिय कवि और कथाकार के बारे में भी यही सही है।
मणि जी के साथ मैं आलेाक धन्‍व से ज्‍यादा रहा हूं। इस बार भी मिला और वाणी में रखने के लिए उनकी पत्रिका की प्रतियां भी साथ लाया। पहले साथ घूमते उन्‍होंने कर्इ बार पटना के कवियों की चर्चा करते कहा था कि अरूण कमल को चाहे जो पुरस्‍कार मिल जाये पर आलोक की कविता का कोई सानी नहीं। यही नहीं अरूण कमल की गद्य पुस्‍तक जब आयी तो उन्‍होंने यह कहकर दी थी कि बहुत रद्दी है इसे जिल्‍द लगा पढिएगा। खरीद लाया पर इसे लौटा दूंगा। हालांकि किताब उन्‍होंने लौटाई नहीं दुकानदार को पर उससे उनकी अरूण जी के बारे में राय तो जाहिर हो ही गयी थी। फिर मैंने अरूण कमल की भोगवादी भाषा के बारे मे लिखा भी थ न्‍यूजब्रेक में।
यूं अरूण कमल के मधुर व्‍यवहार का कोई सानी नहीं पर उसमें मिठास इतनी है कि अब उनसे बचता हूं , आखिर मेरी भी अब उमर हो गयी है इसलिए मीठे से थोड़ा परहेज जरूरी लगता है। उनके मधुर व्‍यवहार पर पहले संकलन में एक अच्‍छी कविता भी है मेरी।
संदर्भ आलेाक जी का था। तो वे परेशान थे और बताए जा रहे थे बौखलाहट में क्‍या क्‍या ...। कि आज इतनी बीमारी के बाद भी गोष्ठियेां में जाने से बाज नहीं आता। वह तो है, उनका वक्‍तव्‍य भी उनकी कविताओं से कम ताकतवर नहीं होता इसे सब जानते हैं । कुछ लोग कहते हैं कि बातें दुहराते हैं वे तेा क्‍या केवल अपनी बातें ही दुहराते हैं हम अपना चेहरा नहीं दुहराते। फिर आलोक धन्‍वा ने ही लिखा है - कि छोटी सी बात का विशाल प्रचार करते हैं वे ... इस शोषण और दमन की दुनिया में उनका दुहराव उनकी लड़ाई है और वही उनका चेहरा है....

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