कारवॉं

नयी मंज़िल के मीरे-कारवाँ भी और होते हैं
पुराने ख़िज़्रे-रह बदले वो तर्ज़े-रहबरी बदला
-फ़िराक़ गोरखपुरी

शनिवार, 23 फ़रवरी 2008

थी पास जो अपने महज तस्‍वीर नहीं थी : आर चेतनक्रांति शेर



खुशवक्‍त था रकीब बहुत पर खुदा का शुक्र
थी पास जो अपने महज तस्‍वीर नहीं थी - चेतन

ये चुप्पियां ही उसकी बनाती थीं उसे
हर बात का जवाब जो दे वो खुदा क्‍या - चेतन

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