कारवॉं

नयी मंज़िल के मीरे-कारवाँ भी और होते हैं
पुराने ख़िज़्रे-रह बदले वो तर्ज़े-रहबरी बदला
-फ़िराक़ गोरखपुरी

गुरुवार, 7 फ़रवरी 2008

हम हैं न कविगण - कुमार मुकुल

हम हैं न कविगण(समकालीनों को पढ़ते हुए)

अरे रे रे
इस तरह क्यूं बिसूर रहे आप
हम हैं न कविगण
दुखी होने का कॉपीराइट लिए
हम दुख से अदबदाकर इस क़दर गदगद हो जाएंगे
कि हमारे पाठकखुशी से बगलें बजाएंगे
क्या कहा भूखमरी-किसान-पिरथवी
जरा फिर से
क्‍या कहा पिरथवी
अरे पिरथवी पर तो अपना स्पेशल कांफीडेंस है
हम उसे निराश करेंगे, हताश करेंगे
मन हुआ तो रोटी सा बेलेंगे, भात-सा पकाएंगे,पदकंदुक बनाएंगे
सागर को हम
असंख्य लहरों, धाराओं, नदी-नालों का महाकाव्य नहीं
असंख्य जलकणों का महाकाव्य बताएंगे
और उस पर वारी जाएंगे
हर जड़ चीज को हम
विकल कर डालेंगे
मेज-जबड़े-परीक्षा भवन´ सबको हम
अपनी कला से जीवित करेंगे
और फिर स्तब्ध तब `तलुओं को आएगी नींद´
और आंखों में पड़ जाएगी मोच
कैनवस के जूते पहनेंगे हम
और आपके चमड़े के जूतों में
उन मरी गायों का मुंह दिखाएंगे
जिनकी खालों से बने थे वो
गायों का और भी बहुत कुछ करेंगे हम
उन्हें पेट भर पॉलीथिन खिलाएंगे
और आशा करेंगे `पवित्र गोबर´ की
हम इस तरह की मार-तमाम
गदहपच्चीसियां करेंगे
और चुल्लू भर पानी में नहीं
हॉल में कविता पाठ सुन
प्रमुदित श्रोताओं की तालियों के
शोर में डूबकर मरेंगे
हम हर उस चीज को अपनी
स्मृति-पुराण का हिस्सा बना लेंगे
जिन्हें छोड़कर आ गए थे गांव से
फिर उत्तर आधुनिक ढंग से
विचरण करते हुए
हम उनका दुखड़ा रोएंगे
ईश्वर के नाम का फेंटा हम
इतनी तरह से और इतनी बार मारेंगे
कि उसे बस ईश्वर ही समझ सकेगा
हम रेल लाइनों के किनारे सुबह-सुबह
लोटा लेकर बैठे नर-नारियों पर
नारद की तरह हंसेंगे
अपने-अपने अंतरिक्षों से
हम यमुना को देखने
तब-तक नहीं जाएंगे
जब-तक वह
सरस्वती नहीं हो जाएगी
फिर हम कलम-फावड़ा ले
उसकी सांस्कृतिक निशानियों पर सर मारेंगे
बाबा सहगल को हम मात करेंगे
अपनी में में की मारक तुकों से
हम एक स्वर में गाएंगे
मैं लोटा-थारी-डोरी-पनहा-सोंटा हूं
मैं अपनी अटूट पृथ्वी का कजरौटा हूं
कि मेरे दुख बड़े अनोखे हैं
उनके रंग गहरे चोखे हैं
हम में-में का राग त्याग
आपके दुखों की आढ़त तक भी आएंगे
बस जरा सरकार बदल जाए
अपना मुखड़ा त्याग
हम आपका दुखड़ा गाएंगे
धरती पर प्रदूषण बढ़ा है
चलिए हम मंगल पर नाव उड़ाएंगे
अच्छा ? ? ? ? फल महंगे हो रहे
हम आपको पत्थर-गिट्टी के फल खिलाएंगे
जिन्हें खाकर आपकी चेतना के दांत
मिट्टी हो जाएंगे
इससे भी ना हुआ तो
हम सब दिल्ली के नाथद्वारों में जाएंगे
मत्था टेकेंगे
कोई न कोई हल होगा उनके पास
हल न हुआ तो हम
बैल की स्मृतियों से ही काम चलाएंगे
हम स्मृतियों की पगही आपको थमाएंगे।

6-6-2004, नई दिल्ली

कोई टिप्पणी नहीं: