रविवार, 10 फ़रवरी 2008

ठाकरे राज - अपनी गली के शेर या कुत्‍ते

राजेश जोशी ने एक कविता में लिखा है कि घृणा इतनी गैरजरूरी चीज भी नहीं कि जहां उसकी जरूरत हो वहां भी ना की जाए तो पढें राज ठाकरे द्वारा पैदा की जा रही घृणा की फसल यह कविता,आज हिन्‍दुस्‍तान में फुलपैंट शर्ट पहने एक युवक द्वारा दूसरे को उछल कर छाती में पद प्रहार करते देख पैदा हुई खिन्‍नता से उपजी है यह कविता

तुम जो यह फुलपैंट और शर्ट पहने
इस बाहरी बिहारी को पीट रहे हो
क्‍या इस पैंट का डिजाइन
तुम्‍हारा बाप लंदन से लाया था
तो तुम लंदन क्‍यों नहीं चले जाते
अपनी गली के शेर
क्‍या मगध की याद तुम्‍हे
इतना सताती है
सताता है तुम्‍हें
चंद्रगुप्‍त अशोक बुद्ध
गुरू गोविंद सिंह का नाम सुन
भय होता है तुम्‍हें
नालंदा को याद कर तुम्‍हारी मति
मारी जाती है
अरे तुम्‍हें तो शेर का टाइटल
बहुत पसंद है
तो फिर तुम जंगल अपने
अपने बंधुओं के पास
क्‍यों नहीं चले जाते
या चिडियाघरों में ही मिल जाएंगे वे
हां हम चरवाहे चंद्रगुप्‍त की संतानें हैं
जो हमारा सम्राट भी है
क्‍या वह तुम्‍हारा सम्राट भी ही
राम और सीता के नाम को बेच कर खाने वालो
क्‍या वो तुम्‍हारे महाराष्‍ट्र में पैदा हुए थे
अरे जोतिबा ने इतनी कोशिश की
पर तू मूढमति ही रहा
अंबेदकर से सीख
नहीं तो मायावती दीदी से पढना पडेगा तुझे
पूंजी का पाठ
आखिर तुम्‍हारी इस सारी कुत्‍तागिरी का राज
यही तो है राज ......

6 टिप्‍पणियां:

शेष ने कहा…

बहुत बढ़िया

Pankaj Parashar ने कहा…

आपका आक्रोश उचित है.
वे यह भूल चुके हैं पूरी दुनिया महाराष्ट्र नहीं है।

vinkbarapi ने कहा…

mitra,mai aapaki bhavanaao se sahamat hun.aur aapaka gusaaa bhi jayaj lagata hai. lekin hame atat ka gaurav gan se kuchha bhala nahi hone wala, hame vartman paristhiyno mei bhi khud ka aakalan karana chahiye.migration koi local problem nahi hai.abhi malesiya ki ghatanaye, keniya aur europe me bhartiao ke prati hating attitude kya hai. hum bagladeshiyo ko bhagana chahate hai marathio ko lagata hai ki in hindiwalo ke chalate hame rojgar nahi mil rahe hai. mitra sare viswa men yahi chal raha hai.migration ka main karan economic hota hai. hum bangladesh mei kyo migrate nahi karate.samsya per tatkalik and sathi tippni se bachna chahiye

shashi ने कहा…

आपका आक्रोश उचित है. लेकिन मूल बहस यह है कि हिंदीभाषी लोगो कि वह कौन सी मजबूरी है कि तमाम अपमान सहकर भी दिल्ली मुंबई भाग रहे है. हिन्दी भाषी इलाक़ो के विकास और आधारभूत डाचे का मुद्दा बुनियादी है. इसके लिए यहाँ के नेताओ पर ब्रीच आफ ट्रस्ट का मुक़दमा होना चाहिए. शशि भूषण द्विवेदी

aatmahanta ने कहा…

भाई मुकुल जी,
रचना के लिए आवेग को थमने दिया करें। क्योंकि आवेग का क्षण हमें चीजों को उसकी समग्रता में नहीं देखने देता। फिर चूक हमीं से होती है। गालिब ने ठीक ही कहा है - आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक। अहसास को पकने दें। मैंने प्रभात खबर के प्रधान संपादक हरिवंश जी को इस विषय पर एक पत्र लिखा था। उसका जिस्ट मैंने अपने ब्लाक आत्महंता में छापा था।
'भाइयों के विरोध की मनोरचना' शीर्षक से। बाद में वेब पत्रिका सृजनगाथा ने भी इसे अपने यहां साभार छापा। हो सके तो देख लें -
www.aatmahanta.blogspot.com

aatmahanta ने कहा…
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