सोमवार, 4 फ़रवरी 2008

मनकी मेरी माँ - कुमार मुकुल - कविता


मनकी मेरी मां
जैसी माटी थी उसके देश की
काली-काली
उसके केश थे जो चिपक जाते
तो सूझता नहीं कि क्या करें
देश ही था उसका

हेठारके आगे
गांगी रोकती थी राह
पार का सबदेश ही था दूसरा
एक पोखर था गांव में
खच्चर चरते हैं अब वहां
वहीं नहाती थी सखियां समेत
डांटते थे भैयाकि डूब जाएगी मनकी
हालांकि मजबूत थी
खींच लाती मरकहे बैल नाद तक
जी करता सानी भी गोंत दे
मैनिया गाय थी दुआर पर
सफेद पूंछ वाली
उसकी हिलती सींगों पर
तेल इंगोरती थी मनकी
उधर बप्पा भईया जाते कचहरी
इधर सूखी गांगी लांघलाल पीली साड़ी पहन
गंगा के कछारों कोचल देती मनकी
सिनहा, सलेमपुर, त्रिभुआनी घाट
दो कोस का रहताटप जाती कित-कित करती
खेतों से चुराकर फूट चबाती
औरसियार की तरह
हुआं हुआं करती भाग जाती मनकी
बन्दरों को मारती ढेले
मिलते नीलगाय, हिरण
उसके पेंचदार सींगों को पकड़कर
झटझोरा करती
तो उलझकर फट जाता आंचल
और फूट पड़ती उसकी हंसी
फिर तान तुड़ा भागती
जाकर कूद जाती गंगा में
चली जाती दूर तक
जहां चकवा के झुंड
खिल रहे होते
कमलों की तरह
खिल जाती वह भी
फेनिल लहरों पर सवार
उसकी हंसीजब टकराती तटों से
तो कट-कटकर
गिरने लगती किनारों की मिट्टी
घर लौटती
तो घेर लेते बच्चे
वह समझाती बड़े और बड़े हो जाओ बबुआ
फिर ले चलूंगा गंगा जी
ललमूंहे बन्दर होते हैं वहां
नोच लेते हैं मुंह बच्चों का
कए-कए पोरसा दो
पानी होता है
डूबे
तो अछरंग किसे लगेगा
काडियों से काले-काले
सोंस
पलटते रहते हैं गंगा में
बच्चों को देख
लगाने लगते हैं डुबकी
हबर-हबर।

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