कारवॉं

नयी मंज़िल के मीरे-कारवाँ भी और होते हैं
पुराने ख़िज़्रे-रह बदले वो तर्ज़े-रहबरी बदला
-फ़िराक़ गोरखपुरी

शनिवार, 2 फ़रवरी 2008

कोहरा - महाप्रकाश - कविता

चिडि़यों ने आवाज दी
-सूरज न आया
मिलों ने भोंपू बजाये
-सूरज न आया
बच्‍चों की आंखों ने खोजा
-सूरज न आया
एन्‍टार्कटिक हुआ यह देश
-सूरज न आया

सर्द कोहरे के मारे
बुद्धिजीवि
सिमट आये चाय घरों में
बहसों की गरमाहट में सेंकते रहे
अपनी वजूद का जहां
विचारों के अलाव सी सुलगती
सिगरेट का धुंआं
सुबह अखबारों के सर्द सफेद सफों परआती है
न जाने किसके हिस्‍से की
मौत का तर्जुमा

हद्दे नजर तक वीरान है
धुंआ धुंआ है आलम
बंद दरवाजों और
बेताब हवाओं की चीख
गोया
उग्रवाद की मारी
पुलिस गुजरी हो
गली सड़कों पर
खतरे की सीटियां
बजाती हुई

रात भर तारों ने
धोयी रात
सुबह
जम गई
आओ
अपनी हथेलियों में
सूरज
पैदा करो।

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