कारवॉं

नयी मंज़िल के मीरे-कारवाँ भी और होते हैं
पुराने ख़िज़्रे-रह बदले वो तर्ज़े-रहबरी बदला
-फ़िराक़ गोरखपुरी

शुक्रवार, 25 जनवरी 2008

जूता मेरे माथे पर सवार है - मैथिली कविता - महाप्रकाश

बीस साल पहले सहरसा में जिन महाप्रकाश जी के साथ सडकों पर घूमते हुए वर्षों के साथ में मैंने हिन्‍दी कविता की बारहखड़ी सीखी थी उनका पहला कविता संग्रह अंतिका प्रकाशन से अब जाकर आया है , पढिए उससे एक कविता जो उसी काल खण्‍ड में लिखी गयी थी।


जूता
हमर माथ पर सवार अछि


जूता हमर माथ पर सवार अछि
हम नॉंगट पयर दरारि
शोणितक नदी कँ
पयर मे बन्‍हने
कॉंटक अनन्‍त जंगल सँ लड़ैत
मरूभूमि मे पड़ल छी...

आँखि मे पानिक सतह पर
टुटैत हमर अर्जित स्‍वप्‍न-संगीतक
विद्रोही राग-रागिनी
उलहन-उपराग अलापैत अछि...

हमर आस्‍थाक सार्थक शब्‍द
हमर संस्‍कारक आधारशिला
कोन आश्रम कोन ज्‍योतिपिंड केँ
हम देने रही हाक...
यात्रा पूर्व जत रोपने रही
संकल्पित पयर
जत भरने रही फेफड़ा में
सर्वमांगल्‍ये मंत्रपूरित हवा
कोन गली कोन चौबटिया पर आनाम भेल...

हमर संगक साथी सम्‍बन्‍ध सर्वनाम
अपन विशेषण अपन सुरक्षाक
अन्‍वेषण मे फँसि गेल
जूताक आदिम गह्वर में
बना लेलनि अपन-अपन घर दुर्निवार...

हे हमर हिस्‍साक ज्‍योति सखे!
देखू कत-कत सँ दरकि गेल अछि

हमर आस्‍थाक चित्र-लोक
कत-कत सँ दरकि गेल अछि रंग
हमर दर्द कहू...
कत-कत सँ टूटि गेल हमर शक्ति-क्रम
हमर हाथ गहू...

जूता हमर माथ पर सवार अछि।

1 टिप्पणी:

gajendra ने कहा…

अति सुन्दर मुकुलजी। महाप्रकाशजीक अप्रकाशित पद्य 'विदेह' ई पत्रिका जे http://www.videha.co.in/ पर सभ मासक 1 आ' 15 तिथिकेँ ई-प्रकाशित होइत अचि, केर हेतु ggajendra@videha.co.in वा ggajendra@yahoo.co.in पर पठाउ। हुनकर फोटो अवश्य पठायब।

गजेन्द्र ठाकुर