रविवार, 13 जनवरी 2008

त्रिलोचन ; दसों दिशाओं का सौरभ - कुमार मुकुल

फूल मेरे जीवन में आ रहे हैं
सौरभ से दसो दिशाएं
भरी हुई हैं
मेरा जी विब्हवल है
मैं किससे क्या कहूं
यह अंतरंग विन्हलता और इसके पश्चात् इससे उपजे मौन और उल्लास के द्वंद्व से उद्वेलित जो dhavani की लहरों का ज्वार-भाटा है, वही हिंदी kअविता में त्रिलोचन की पहचान है? जटिल और सात रंगों के गतिमय मेल से उपजे सादे रंग की सुरभिमय लय-ताल। अपनी सहज और उपस्थिति से शनै:-शनै: हमारी संवेदना की जटिल बुनावट को रससिक्त करती हुई।
और यह यूं ही नहीं है कि तुलसी से भाषा सीखनेवाले इस महाकवि से इतर आ/kqनिक cks/k की जमीन के कवि केदारनाथ सिंह त्रिलोचन से काफी सीखते हैं और बादलों को पुकारते धान के बच्चों का जी उन्मन हो उठता है। ये धान के बच्चे नहीं हैं। आधुनिक टेक्नालॉजी में पिछड़े आज भी बारिस पर अपनी आशा टिकाए रखनेवाले भारतीय किसानों के बच्चे हैं। उसी तरह यह fog~oलताek= आत्मोद्वेलन नहीं है, इसमें चार नहीं दसो दिशाओं का सौरभ भरा है।
शाखाएं, टहनियां
हिलाओ, झकझोरो,
जिन्हें गिरना हो गिर जाएं
जाएं-जाएं
जीवन की शुष्कता को मिटाने के लिए एक निर्मम आलोड़न की जरूरत होती है। आलोड़न जो अपने सूखे, झड़ने को आतुर अंगों को किनारे पर ला पटकता है। वह निर्मम कोमल उद्घाटन जो बीज का आवरण फाड़ कर सर से मिट्टी को हटाता खुले आकाश में अपना अंकुर फेंकता है। उसकी गहरी पहचान gS f=ykspu को और अतीत के प्रति अतिरिक्त मोह नहीं है। श्रम और संवेदना की सूंड से इकट्ठा किया e/kqकोष वे eqDत मन से लुटाते हैं। दिनकर के शब्दों मेंµ
ऋतु के बाद फलों का रुकना
डालों का सड़ना है
यह निर्ममता बड़ी सजग है। वे कहते हैं कि जिसे मिट्टी में मिलना हो मिल जाएं मिट्टी में, पर अतीत और स्मृतियों का जो सौरभ है उसे भी मिट्टी में ना मिला दिया जाए और वे प्रार्थना करते हैं कि उस विरासत को हम संभाल कर आगे ले जाएं, क्योंकि जीवन की शुष्क राहों को यही सिक्त करेगा।
सुरभि हमारी यह
हमें बड़ी प्यारी है
उसको संभाल कर जहां जाना
ले जाना।
जब से कविता की दुनिया में विचारों का प्रवेश हुआ है जीवन को देखने का नजरिया बदला है। अब vis{kk की जाती है कि कविता में भाव और विचारों का संतुलन हो। यह नहीं कि भावनाओं की बाढ़ आती चली जाये और उसमें डूबते व्यक्ति की अपने विवेक पर से पकड़ छूट जाए। अब पाठक Lora= होता है कि भाव की नदी में डूबकर वह मोती ढूंढ़े या तट पर रहकर ही जल पान करता रहे। f=ykspu के यहां भावों में बह जाने का खतरा नहीं है। एक शब्द `नीरf=ykspu के यहां बराबर आता है। अपनी सहजता के साथ। यह त्रf=लोचन की अपनी विशेषता का द्योतक है। उनकी कविताएं भी कोई शोर-गुल नहीं करतीं। वो गया की उस नदी (फल्गु) की तरह हैं जिसका जल अगर पीना हो तो थोड़ा श्रम करना पड़ेगा। तल की रेत हाथों से हटानी होगी, तभी स्वच्छ प्रदूषण मुक्त अंतर/kkjk का पान कर सकेंगे आप।f=लोचन की कविता की एक प्रबल स्थिति उसका èkSर्य है। किसी भी स्थिति पर चिढ़कर वे आत्म हिंसक चोट नहीं करते, खुद को संगठित करते हैं वह अपनी सहयोगी अंत/kkराओं को क्रम से जोड़ते जाते हैं। जब-तक विसंगतियों को बहा ले जाने लायक दबाव ना पैदा हो।
मुक्ति चाहते हो तो आओ धक्के मारें
और ढहा दें
उद्यम करते कभी न हारें

हमारे घर
जितने ही निकट-निकट होते हैं
उतने ही दूर-दूर
हमारे मन
वे लिखते हैंµ
हृदय को हृदय से
मिलाने के लिए हंसी
सेतु है
( चित्रा जम्बोरकर )
अतीत और विश्व संस्कृति के सापेक्ष भारतीय संस्कृति की विरासत की शायद lokZf/kक सही समझ रखने वाले इस कवि की आंखों से आèkqनिक समाज की विसंगतियां और टूटन कभी ओझल नहीं रहे हैं, और वे बतलाते हैं कि इस जटिल युग में भी इस पारिवारिक टूटन का हल मात्र उन्मुक्त सरलता निश्छलता ही हो सकती है।निराला के बाद अगर किसी कवि ने भाषा, शैली, शिल्प के स्तर पर इतने fofo/k प्रयोग किए हैं तो वो f=ykspu ही हैं और यह fofo/krk कहीं भी उनकी मूल/kkjk को कमजोर नहीं करती। जाने कितना पानी है इस कवि की xaxks=h में कि इतनी mप /kjkvkas के बाद भी उसकी गहराई और गति में निरंतरता बनी रहती है

2 टिप्‍पणियां:

छत्‍तीसगढिया .. Sanjeeva Tiwari ने कहा…

यहां भी देखें त्रिलोचन : एक किवदन्‍ती पुरूष

Sanjeeva

जेपी नारायण ने कहा…

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