शनिवार, 5 जनवरी 2008

पूरब की बेटी - बेनजीर - कुमार मुकुल

१९८९ में बेनजीर शीर्षक से एक कविता लिखी थी मैंने , जो मेरी दूसरी कविता पुस्तिका ' सभ्यता और जीवन ' में संकलित है , अब बेनजीर के नहीं रहने पे वह कविता 'कारवां' के पाठकों के लिए ।

बेनजीर

पैराहन-ए -दरीदान में लिपटी
जिगर-फिगार अवाम की
अफ्सुर्दा आहों का मरहम-ए -आजार
संगीनों का सीना चाक करता
तमाम तवारीखों की तःरीरें करता तार-तार
माह-ए -रवां जो उगा है आज की शब
फैज़ के लैला-ए -वतन के अफलाक पर
दिलकश है बड़ी तस्वीर उसकी
सर -ए -रु पर है जवानी का फरोजां जमाल
रगों में इंसानी मुहब्बत की तासीर है
हाथों मे है हजारों द्रौपदिओं का चीर
पूरब की इस बेटी का नाम है
बे -नजीर बेनजीर ।

फटे वस्त्र , घायल दिल , उदास , घावों का मरहम , फाड़ना , लिखावट , गतिशील चांद, रात , आकाश , चेहरा , उज्जवल , सौंदर्य , मिठास , बेमिसाल


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