कारवॉं

नयी मंज़िल के मीरे-कारवाँ भी और होते हैं
पुराने ख़िज़्रे-रह बदले वो तर्ज़े-रहबरी बदला
-फ़िराक़ गोरखपुरी

रविवार, 11 नवंबर 2007

आदमजादों के अभयारण्‍य - कुमार मुकुल

शेर - चीतों के बाद
अब आदमी के भी
बनने लगे हैं अभयारण्‍य

शुभ्र धवल छंटी हुई दाढ़ी
और चश्‍मे के भीतर से चमकती
उस दरिंदे की आंखों को तो देखो
एक मिटती प्रजाति है यह

पर एक पूरा राज्‍य है
इसके हवाले

ओह
कैसी गझिन
रक्‍तश्‍लथ है
हंसी इसकी
इस रक्‍तपायी की जीभ तो
दिखती नहीं कभी
सारे रक्‍तचिन्‍ह
चाट गया है यह
बस इसकी दाढ़ों में लगा
बच रहा है खून।

2 टिप्‍पणियां:

मीनाक्षी ने कहा…

मैने भी देखे हैं इंसानों के जंगल मे ऐसे ही लोग जो...... ! बहुत प्रभावशाली व सारगर्भित रचना...

परमजीत बाली ने कहा…

बढिया!!