कारवॉं

नयी मंज़िल के मीरे-कारवाँ भी और होते हैं
पुराने ख़िज़्रे-रह बदले वो तर्ज़े-रहबरी बदला
-फ़िराक़ गोरखपुरी

शुक्रवार, 26 अक्तूबर 2007

दीवारें चारों ओर खड़ी हैं - जीवट के सहज रूप . त्रिलोचन

हिन्‍दी कविता में अपनी सहज भाषा और जीवट के लिए जाने जाने वाले त्रिलोचन आजकल अस्‍वस्‍थ हैं,पर उनकी कविता हमेशा की तरह आज के इस कठिन समय में भी हमें संघर्ष का पाठ पढ़ा रही है आएं उनकी एक कविता पढ़ें .

दीवारें दीवारें दीवारें दीवारें

दीवारें दीवारें दीवारें दीवारें
चारों ओर खड़ी हैं । तुम चुपचार खड़े हो
हाथ धरे छाती पर , मानो वहीं गड़े हो।
मुक्ति चाहते हो तो आओ धक्‍के मारें
और ढ़हा दें । उद्यम करते कभी न हारें
ऐसे वैसे आघातों से । स्‍तब्‍ध पड़े हो
किस दुविधा में।हिचक छोड़ दो। जरा कड़े हो।
आओ , अलगाने वाले अवरोध निवारें।
बहार सारा विश्‍व खुला है , वह अगवानी
करने को तैयार खड़ा है पर यह कारा
तुमको रोक रही है। क्‍या तुम रूक जाओगे।
नहीं करोगे ऊंची क्‍या गरदन अभिमानी।
बांधोगे गंगोत्री में गंगा की धारा।
क्‍या इन दीवारों के आगे झुक जाओगे।

उस जनपद का कवि हूं से साभार

1 टिप्पणी:

बोधिसत्व ने कहा…

मुकुल जी
बहुत अच्छा कर रहे हैं
कुछ फोटो वगैरह भी लगा दिया करें....।