कारवॉं

नयी मंज़िल के मीरे-कारवाँ भी और होते हैं
पुराने ख़िज़्रे-रह बदले वो तर्ज़े-रहबरी बदला
-फ़िराक़ गोरखपुरी

बुधवार, 10 अक्तूबर 2007

महानायक - कुमार मुकुल

करिश्‍मैटिक है उसका व्‍यक्तित्‍व
एक साथ एक ही समय वह
अपने महान पिता की अर्थी को
कंधा देते
और अपने बेटे के साथ
वैगन-आर के प्रचार में
ठुमका देते दिखाई देता है
उसके पुतले बनते हैं
देवताओं की तरह
पूजा होती है
और नाकारा देवताओं की
लंबी लिस्‍ट में
शामिल कर लिया जाता है
उसे भी एक दिन।

3 टिप्‍पणियां:

शेष ने कहा…

बहुत अच्छी कविता। शायद उठाने होंगे इसी तरह के खतरे। तोड़ने होंगे सब मठ और गढ़।

हर उस नायकी के तिलिस्म के पर्दे उघाड़ने होंगे, जो दौड़ती रहती हैं, एक खेत में कटने वाले की रगों में, बन कर काला लहू, इस दंभ के साथ कि मैं ही समय हूं। मैं ही तुम्हारा आज हूं और मुझे ही अपना कल बनाओ। आओ, मेरे पीछे आओ। अपनी आंखों को खोलने की जरूरत नहीं है, क्योंकि तुम्हारे लिए रास्ता बनाने के लिए ही मुझे भेजा है तुम्हारे पास भूदेवों ने।

बोधिसत्व ने कहा…

अच्छा जा रहे हो मुकुल भाई.....बधाई

अजित ने कहा…

मुकुल भाई , पहली बार आपके ब्लाग पर आना हुआ । बोधिभाई के धाम से सूत्र मिला । हमें लगा कि नवभारत टाइम्स वाले मुकुल होंगे सो
आ गए। पर शायद आप वो नहीं हैं। जो भी हो, अब तो हम अक्सर आया करेंगे। आपका ब्लाग सार्थक है।
सादगी में ही आकर्षण है। अच्छी कविताएं पढ़ीं, शुक्रिया...