कारवॉं

नयी मंज़िल के मीरे-कारवाँ भी और होते हैं
पुराने ख़िज़्रे-रह बदले वो तर्ज़े-रहबरी बदला
-फ़िराक़ गोरखपुरी

सोमवार, 3 सितंबर 2007

घृणा से टूटे हुए लोगों - आभा

घृण से टूटे हुए
लोगों
दर्पण और अनास्‍था से
असंतुष्‍ट
महिलाओं को
वक्‍तव्‍य
ना दो .

कोई टिप्पणी नहीं: