कारवॉं

नयी मंज़िल के मीरे-कारवाँ भी और होते हैं
पुराने ख़िज़्रे-रह बदले वो तर्ज़े-रहबरी बदला
-फ़िराक़ गोरखपुरी

गुरुवार, 13 सितंबर 2007

हर तरफ कातिल निगाहें...कुमार मुकुल

धूप मीठी और चिडिया बोलती है डार पर
पर पडोसी ढहा सा है दीखता अखबार पर।

सूझती सरगोशियां फाकाकशी में भी जनाब
अगर रखनी नजर तो तू ही रख ब्‍योपार पर।

जानता हूं वक्‍त उल्‍टा आ पडा है सामने
कौन सीधा सा बना है अपन ही धरतार पर।

हर तरफ कातिल निगाहें और हैं खूं-रेजियां
फिक्र क्‍या जब निगहबानी यार की हो यार पर।

2 टिप्‍पणियां:

रवीन्द्र प्रभात ने कहा…

आपकी कविता को बार -बार पढ़ने का मन कर रहा है, आछी कविता है.

अतुल ने कहा…

रोचक. डंगवाल साहब की फ़ोटो देख मन प्रसन्न हुआ.

अतुल