बुधवार, 8 अगस्त 2007

समझदारों का गीत - गोरख पांडे

हवा का रूख कैसा है , हम समझते हैं
हम उसे पीठ क्यॊं दे देते हैं , हम समझते हैं
हम समझते हैं खून का मतलब
पैसे की कीमत समझते हैं
क्या है पक्ष में विपक्ष में क्या हे हम समझते हैं
हम इतना समझते हैं कि समझने से डरते हैं और चुप रहते हैं
चुप्पी का मतलब हम समझते हैं
बोलते हैं तॊ सॊच समझकर बॊलते हैं हम
हम बॊलने की आजादी का मतलब समझते हैं
मगर हम क्या कर सकते हैं
अगर बेरॊजगारी अन्याय से तेज दर से बढ़ रही हो
हम आजादी और बेरॊजगारी दॊनॊं के खतरे समझते हैं।

2 टिप्‍पणियां:

बोधिसत्व ने कहा…

मुकुत जी यह कविता तो अच्छी है ही। आप से आग्रह है कि आप अपनी हंस वाली कविता भी छापें। मुझे वह कविता बहुत अच्छी लगी है।

बोधिसत्व ने कहा…

मुकुल भाई नाम गलत छप गया। अन्यथा न लेंगे।