बस एक जिद है कि मरते नहीं, मरेंगे नहीं
ये एक अंधी सी जिद है कि जिसकी आँख नहीं
ये बहरी भी है, ये गूंगी भी और लंगडी भी
न इसका दोस्त है कोई, न कोई हमराही.
न ये खाने के लिए कहती है न पीने को
ये अपना गोश्त चबाती है और जीती है
ये एक जिद है जो अपने में इतनी पूरी है
कि जब रुके तो अपने दर्द कि ईंटों से घर उठाके रुके
औ' जब चले तो उसी दर्द की बैसाखियाँ बनाके चले.
Saturday, May 24, 2008
बस एक जिद है कि ... आर चेतनक्रांति
Friday, May 23, 2008
नरीमन प्वाइंट पर - कविता - सैलानी सिंह
कुंवारी लड़की
बेचती है गजरे
लुभाती है नये-पुराने जोड़ों को
गजरों की गंध से
चंद जोड़ा वड़ा-पाव के वास्ते
कुंवारी लड़की बेचती है गजरे
कुंवारी लड़की नहीं जानती
बिस्तर की सलवटों के मायने
देहों के संसर्ग का अर्थ
देह की भूख की गंध का
उसे नहीं पता
उसे पता है
पेट की भूख
वड़ा-पाव की गंध
और चार जोड़ा खाली पेटों का इंतजार
कुंवारी लड़की
बेचती है गजरे
नरीमन पाइंट पर...
मुंबई सेंट्रल - कविता - सैलानी सिंह
ये जो झोपड़पटटी में
बालकनी है
गमलों को भी
सजा के रक्खा है
पर फूल नहीं हैं जिनमें
मत हंसो इन पर कभी
ये जुगनूं हैं सपनों के
इनके
जुगनुओं को
आसपास ही रहने दो
उजाले का अहसास
बना रहता है...
Monday, May 19, 2008
आ रहा है विकास का रथ - लाल बहादुर ओझा
हर तरफ चल रहा है काम
हथौड़े बज रहे हैं
फर्श घिसी जा रही है
रामदीन बना रहे हैं मसाला छह एक का
बदल रहा है ईंटों का रंग
जमीन नया आकार ले रही है।
ऐसा होते हुए
किस्से याद आते हैं इस जमीन के
जिसमें लहलहाती थी फसलें, साल में चार दफे
वहां उस ढूहे पर थी अमराई, बीच में कई किस्म के गाछ
नलकूप और भी बहुत कुछ
जिनसे छाया की तरह चिपके थे गांव के किस्से
काम चालू है
हथौड़े की मार से चकनाचूर हो रही हैं स्मृतियां
परत खुल रही हैं जमीन की
इसके कई रंग, कई अन्य रंगों के साथ अनगिनत प्रकृतियां बना रहे हैं
सुना आपने! किसी के चीखने की आवाज आ रही है
नहीं! चीख में घुल रही हैं कुछ और ध्वनियां
एंबुलेंस की आवाज है या पुलिस की पेट्रोल कार
कहीं कुछ हुआ है ... हुआ है कुछ
आवाजों का कहां तक पीछा किया जा सकता है भला
कई रूपों में तैर रहे हैं हमारे आस पास
अभी बाईं तरफ छाती के निचले हिस्से में झनझनाहट सी हुई है
मोबाइल घरघराया होगा- साइलेंट मोड था
लेकिन नहीं, मोबाइल नहीं है यह
कौन पुकार रहा है मुझे
किसकी ध्वनि मेरी धमनियों में धड़क रही है
अनजाना सा डर पसरा हुआ है नंदीग्राम में
पता नहीं अगले पल क्या हो
कब कौन जांच समिति पहुंचे
कब कोई तालाशी दल
कब भाषण होने लगे पुलिया पर
और जुलूस में बदल जाएं लोग
कहीं भी हो सकती है मोर्चाबंदी
गूंज सकती हैं गोलियां
चीख और बारूद की गुत्थमगुत्थी संभव है किसी भी पल
थरा थरा रहा है गांव गांव
आ रहा है विकास रथ!
नहीं यहां कोई लोहा नहीं है
चिमनियों का धुआं नहीं उठा है प्रकाश में
कोई रासायनिक गंध नही उतरी है हवा में
लेकिन यह कैसी हलचल है
यह कैसा हौआ है
भय किसका है अपने गांव और अपने ही घर में
कौन भयभीत कर रहा है हमें इस प्रजातांत्रिक देश में?
Saturday, May 17, 2008
विकसित होते समय संदर्भों की कहानियां - कुमार मुकुल
जैसे विष्णु खरे की ताकत को समझने के लिए पाठक से एक सीमित खास तैयारी की उम्मीद की जाती है युवा रचनाकार पंखुरी सिन्हा की कहानियों का आस्वाद लेने के लिए भी कुछ वैसी ही तैयारी चाहिए। क्योंकि विवरण की बारीकियों से जिस तरह इन कहानियों की शुरूआत होती है वह शुरू में पाठकों को बोर करती सी लगती हैं पर अगर किनारे पर हाथ पांव मारने से आगे लहरों में धंसने का साहस पाठक करता है आगे गहराई में जाकर भी वह एक निश्चिंतता से तैरते हुए दूसरे किनारे तक आसानी से जा सकता है।
पंखुरी के दूसरे संग्रह 'किस्सा-ए -कोहनूर' की कहानियां कला फिल्मों की तरह प्रभाव छोड़ती हैं,जिनमें क्रियाओं से ज्यादा सोचने को दिखाया जाता है। सोच के कई स्तर इनमें एक साथ दिखायी पड़ते हैं। कहीं विचार कहीं भाव कहीं इनका द्वंद्व अभिव्यक्त होता है जिनमें। और जैसे कला फिल्में लोकप्रिय फिल्मों के नायक आधारित मिथ को तोड़ने की कोशिश करती हैं ये कहानियां भी कथा के रूप या फार्मेट को तोड़ती हैं। कथा के पारंपरिक रूप को जो कहानी सबसे कम तोड़ती है वह पहली कहानी 'समानान्तर रेखाओं का आकर्षण' है। यह एक लड़की के अपने से कम उम्र लड़के के प्रति आकर्षण की कहानी है। लड़की उसे एक बार प्राप्त कर लेती है पर अगली बार लड़क खुद को नियंत्रित कर लेता है। कहानी कई बातों को अपने ढंग से सामने ला पाती है। कहानी दिखाती है कि बाजार किस तरह प्रेम की कंडिशनिंग करता है कि प्रेम आकर्षण की परिभाषा से आगे नहीं बढ़ पाता। दूसरी बात कि बाजार और भूमंडलीकृत दुनिया में एक लड़की की स्थिति में परिवर्तन आया है और अब वह भी आपने प्रेम और आकर्षण को पुरूषों के मुकाबिल उतनी ही ताकत से सामने रख पाने की सामर्थ्य रखने लगी है। यह कहानी संग्रह की बाकी कहानी की अपेक्षा ज्यादा गति से घटित होती है।
संग्रह की कई कहानियां भारतीय समाज के वैचारिक संकट को भी दिखलाती हैं। यह लेखिका का भी संकट है - कि वह निरूपाय ,अकेली है,संकट को वह देखती है,पहचानती है पर उससे दो-चार होने की ताकत वह अभी जुटा नहीं पायी है। 'शत्रु का चेहरा' कहानी में इसे देखा जा सकता है। संकट यही है कि शत्रु का कोई मुकम्मल चेहरा नहीं बनता और यही लेखिका की परेशानी का सबब है। शत्रु का चेहरा ना तलाश पाने की 'कड़वाहट' में कथा नायिका जलूस का साथ नहीं दे पाती और भाग खड़ी होती है। उसे अपने भागने का अहसास भी है -' ... वह भाग ही रही है। जाने कहां से भागकर कहां को जा रही है। जाने किससे भाग रही है।' दरअसल मंजिल हर बार साफ नहीं दिखती,वह सफर में होती है या उसके बाद ही मिलती है। इसलिए मंजिल ना दिखे तेा भागने की बजाय उस राह पर चलना ही सही होगा।पंखुड़ी की कहानियों में विद्रोह और विचार जहां तहां छोटे-छोटे विस्फोट के रूप में आते हैं। पर उनमें एक तारतम्य या निरंतरता ना होने से वो बदलाव की ताकत नहीं बना पाते और लेखिका को संघर्ष की राह से भागने को मजबूर होना पड़ता है। शत्रु की पहचान के लिए इन विद्रोही स्वरों को एक सूत्र में जोड़ना होगा। दरअसल चेहरा तो है ही शत्रु का पर आंतरिक ताकत के अभाव में उसे सामने रखने की हिम्मत अभी बटोरनी है लेखिका को।यूं देश और दुनिया के अंतरविरोधों को पूरी जटिलता के साथ जिस तरह ये कहानियां अभिव्यक्त करती हैं वैसा सामान्यत: कविता में होता है। इन्हें खोलने की कोशिश में जैसे पूरी दुनिया खुलती चली जाती है।और इस दृष्ठि से देखा जाए तो यह एक नयी शुरूआत है और आगे उनसे उम्मीद की जा सकती है।
पंखुरी की कहानियों से गुजरने के बाद चन्दन पाण्डेय के पहले कहानी संग्रह 'भूलना' से गुजरते हुए यह अहसास गहराता है कि हिन्दी कहानी धीरे-धीरे अपना चोला बदलती एक नये मुकाम की ओर अग्रसर है। पंखुड़ी के यहां अगर आकलन स्पष्ट है तो चंदन के यहां कल्पना भविष्य के आभासी यथार्थ को एक नयी जमीन मुहय्या कराती दिखती है। आपने समय और समाज के अंतरविरोधों को उसके क्रूर चेहरे के साथ सामने ला देने में चन्दन की कहानियां समर्थ हैं। इस मायने में अकेले से हैं अपनी युवा जमात में।
चन्दन की कहानी 'सिटी पब्लिक स्कूल, वाराणसी' को ही लें। यह किशोर जीवन पर इक्कीसवीं सदी की मार को जिस तरह बहुस्तरीयता में पकड़ती है वह विस्मित करता है। पूंजी का क्रूरतम चेहरा, बेचारा स्कूल टीचर आज माट साहब से भी ज्यादा दुर्गती को प्राप्त हो रहा है। और जन्म लेने से पहले ही प्रेम की सुकोमल भावनाओं पर आधुनिक पूंजी के दंश को कहानी पढ़कर ही जाना जा सकता है।
कभी शमशेर ने भविष्य के होने वाले कवि के लिए के लिए कहा था कि उसे विज्ञान,कला,इतिहास और तमाम आधुनिक प्रविधियों की जानकारी होनी चाहिए। युवा कविता के अन्वेषियों में तो ज्ञान की वह ललक और उसका प्रयोग नहीं दिखता है पर चन्दन जैसे युवा कथाकरों को पढते हुए संतोष होता है कि अपनी तमाम अत्याधुनिक सूचनाओं का प्रयोग वे कुशलता से कर पारहे हैं । पूंजी प्रसूत समकालीन क्रूरताओं का चेहरा दिखाने में चन्दन का सानी नहीं है । लीलाधर जगूड़ी की कविता मंदिर लेन और विष्णु खरे की कुछ कविताएं पहले यह काम सफलता से करती दिखती थीं, आज वही काम चन्दन की कहानियां करती दिखाई देती हैं। उनकी करीब करीब सारी कहानियां इसका उदाहरण हैं।
संग्रह की पहल कहानी 'रेखाचित्र में धोखे की भूमिका' का आरंभ तो पंखुड़ी की कहानियों की तरह एक बारीक विवरणात्मकता से होता है पर आगे यह अपने समय के मारे गंवई प्रेमियेां की कथा में तब्दील हो जाती है। क्रूरता का चेहरा सर्वत्र एक सा है क्या सिटी स्कूल और क्या गांव-पथार। संग्रह की शीर्षक कहानी भूलना व्यवस्था के अत्याधुनिक चेहरे की कठोरता को उसकी गलघोंटू छवियों के साथ सामने लाती है। इसी तरह 'परिन्दगी है कि नाकामयाब है' ग्रामीण जीवन में जमीन जायदाद के प्रति लोगों के अंधमोह से उपजी दारूण स्थितियों को अपना विषय बनाती है। यह दिखलाती है कि धन कि लालसा कैसे एक स्त्री को भी पुरूषों की तरह एक क्रूरतम चेहरा प्रदान करती है। शिवपूजन सहाय ने 'देहाती दुनिया' में लिखा था कि गांव के लोग भोले तो क्या भाले जरूर होते हैं। तो ग्रामीणों के इस भालेपन की नोंक इस कहानी के हर पृष्ठ पर एक तीखा दबाव बनाती दिखती है।
'उलटबांसी' कविता का दूसरा कथा संग्रह है। चन्दन के मुकाबले कविता की कहानियां ज्यादा सकारात्मक हैं। नये युग में व्यक्ति और समाज के अंतरसंघर्षों को उदघाटित करती हैं कविता की कहानियां। 'उलटबांसी' कहानी में ही जिस तरह एक मां अंतत: शादी का निर्णय लेती है वह समाज की बदलती अंतरसंरचना की झलक दिखाता है। मां, बाप, पिता, पति आदि तमाम शब्द आज नये अर्थ ग्रहण कर रहे हैं। इस कहानी में अपूर्वा सवाल खड़े करती पूछती है - 'नदियां बदलती हैं आपना रास्ता,फिर मां से ही अथाह धीरज की अपेक्षा क्यों .... मां पर्वत नहीं थी और पर्वत भी टूटता है छीजता है समय के साथ-साथ'।
यहां यह खयाल कितना वाजिब है कि आखिर क्यों प्रकृति के जड़ संबोधनों को जीवित करने में आदमी अपनी भावनाओं-विचारों की हत्या कर खुद को पत्थर में तब्दील कर दे। कथा में एक मां पहली बार निर्णय लेती है अपने जीवन में और चाहती है कि उसके बेटे उसका साथ दें। बेटे साथ नहीं देते पर समय साथ देता है। तभी तो मां के पत्थर होते जेहन में इस तरह का विचार पहली बार वजूद में आता है । और चारों ओर के पथरीले आवरण को तोड़ अपनी जगह बनाता है। आखिर ये विचार भी तो मां की संतानें हैं अन्य भावनाओं की तरह। हिन्दी कविता में युवा कवि पवन करण की पहचान ही इस तरह के आधुनिक सवालों को स्त्री के संदर्भ में उठाने के चलते बनी है। कविता की कहानियां उसी बात को शिद्दत से रेखांकित कर पाती है।
'उलटबांसी' की कहानियां प्रेम और उससे पैदा उहापोह की कहानियां हैं। प्रेम को लेकर जो विचार प्रेमीजनों के दिलो-दिमाग को मथते रहते हैं उनका एक दर्शन प्रस्तुत करती हैं कहानियां। जैसे कि - प्यार सच्चा हो तो बड़ी से बड़ी बात छोटी लगती है , या प्रेम वह है जिसकी खातिर आदमी खुद को आमूल-चूल बदल डाले। कहानी लौटते हुए हेा या आशिया-ना सबका मुख्य बिंदु प्रेम की उहापोह ही है। 'आशिया-ना' प्रेम में बिना विवाह किए सहजीवन में रहने से नये जोड़ों के सामने आई समस्याओं को लेकर बुनी गयी कहानी है। कि सहजीवन की परेशानियां प्रेमियों को दर-बदर करती हैं पर आशा है कि दूर के तारे की तरह टिमटिमाती रहती है।
कुलमिलाकर पंखुरी सिन्हा के यहां जीवन जगत का आकलन है तो कविता के यहां प्रेमियों के मनोजगत की छानबीन। यथार्थ भी जहां तहां पांव पसारता है पर एक उधेड़बुन चलती रहती है। कविता की कहानियां प्रेम पर एक जिरह छेड़ती हैं , एक अनंत जिरह। 'जिरह:एक प्रेमकथा' का एक पात्र जिरह करता कहता है - दरअसल कहानी और जिन्दगी दो अलग-अलग चीजें हैं, दो अलग-अलग धरातल हैं । मैं चाहता हूं कि उनके बीच का यह फेंस टूटे। शायद कविता आगे की अपनी कहानियों में यह फेंस तोड़ सकें।
दहशतगर्दो के नाम एक पैगाम - खालिद ए खान
जयपुर में बम विस्फोट करने वाले दहशतगर्दो के नाम एक पैगाम ..............
आओ लोट कर देखो
उस जमी को
जो सहम कर काली
हो गयी है
देख सकते हो
तो देखो
जमी पर बिखरे लहू को
जो अब सुख चुका है
शायद तुम देख सको
उसका रंग
जो मिलता है
तुम्हारे लहू से
आओ लोट कर देखो
शव-गृह में लेटी
उस बच्ची के हाथों को
जिसने अभी तक
अपना लड्डू नहीं खाया है
जो उसके हाथो में है
और देखो
उस बच्चे की आखों
को जो दो दिन से टिकी हैं
दरवाजे पर
अपने पापा के
इन्तजार में
शायद तुम्हें
अपने बच्चो की
झलक मिल जाए
आओ लौट कर देखो
Friday, May 9, 2008
बुद्ध और मार्क्स साथ साथ - प्रेम कुमार मणि
मई महीने के पूरे चांद का दिन गौतम बुद्ध का जन्म दिन है और ५ मई कार्ल मार्क्स का। इसलिए इस बार जब लिखने बैठा तब इन दोनों का स्मरण स्वाभाविक था। इन दोनों के विचारों ने हमारी पीढ़ी और समय को प्रभावित किया था। पूरी बीसवीं सदी मुख्य तौर से मार्क्सवादी और मार्क्सवाद विरोधी खेमों में बंटी रही। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद पूरी दुनिया को बुद्ध ने भी अपने अंदाज में प्रभावित किया।कम्युनिस्ट घोषणा-पत्र जब मैंने पहली दफा पढ़ा था तब हाई स्कूल में था। इस पुस्तिका की अधिकांश बातें हमारे सिर के ऊपर से निकल गयी थीं, फिर भी बहुत कुछ ऐसा था, जिसने सम्मोहित किया था। हमारी पीढ़ी घर में पिता और बाहर में परमपिता से डरने वाली पीढ़ी थी। तमाम नैतिकतायें हमें इनका पालतू होना सिखलाती थीं। इस घोषणा-पत्र के द्वारा हमने वर्ग-संघर्ष, पूंजी, सर्वहारा जैसे कुछ नये शब्द और परिवार, राष्ट्र व आजादी के नये अर्थ पाये थे। 'कम्युनिस्ट क्रांति के भय से शासक वर्ग कांपते हैं तो कांपे! सर्वहारा के पास खोने के लिए अपनी बेड़ियों के सिवा कुछ नहीं है और जीतने के लिए उनके पास सारी दुनिया है` जैसे ओजपूर्ण समापन ने हमारे संस्कारों की चूलें हिला दी थीं। वास्तविक आजादी संस्कारों की आजादी होती है। कम्युनिस्ट घोषणा-पत्र ने हमें आजादी का नया अर्थ दिया था। गांव में बैठ कर हम दुनिया की आजादी का स्वप्न देखते थे। इस आजादी की तलाश में हम साहित्य, राजनीति, इतिहास और विज्ञान के पृष्ठ-दर-पृष्ठ पलटते थे। कभी गोर्की और चेखब मिलते थे, कभी माओ और फिदेल को । इसी क्रम में जब हमने इतिहास में प्रवेश किया तब गौतम बुद्ध से मुलाकात हुई। बुद्ध और मार्क्स में हमने अद्भुत साम्य पाया।मार्क्स वाया शॉपेनहावर बुद्ध के नाम से तो परिचित थे,उनकी विचारधारा से नहीं। हालांकि मार्क्स ने जर्मन दर्शनशा में ही अपनी जड़ें तलाशी हैं, और हीगेल के दर्शन को ही पैर के बल खड़ा किया है, लेकिन दर्शनशा का कोई विद्यार्थी कह सकता है कि हीगेल कि अपेक्षा बुद्ध मार्क्स के ज्यादा करीब हैं।बुद्ध के गुजरे ढ़ाई हजार साल हुए और मार्क्स के गुजरे कोई सवा सौ साल। आज बहुत सी स्थितियां बदली हैं। अनेक आविष्कारों और अर्थशा व राजनीति के क्षेत्र में नये प्रयोगों ने हमें नये तरीके से सोचने के लिए विवश किया है। आज न बुद्ध का जमाना है, न मार्क्स का। इसलिए आज हम यदि बुद्ध और मार्क्स को हू-ब-हू वैसे ही अंगीकार करना चाहें जैसे वे अपने जमाने में थे, तो हम अजायबघर की सामग्री बन जायेंगे। लेकिन उन दोनों के अध्ययन का अभाव हमारी विचार प्रणाली को कमजोर करेगा, इसमें कोई संदेह नहीं है।हमारे देश में बुद्ध और मार्क्स से लोग बीसवीं सदी के आरंभ में परिचित हुए। मार्क्स से बीसवीं सदी के आरंभ में परिचित होने की बात तो समझ में आती है क्योंकि उनका निधन १८८३ में हुआ और वे जर्मन थे, किन्तु बुद्ध तो हमारे ही देश के थे और कोई हजार वर्ष तक उनके धर्म की धूम हमारे देश में रही थी। यह अजीब बात है कि वर्णाश्रम धर्म वालों ने बुद्ध का निर्वासन इस तरह किया था कि वे पुन: विदेशियों के द्वारा ही हमारे बीच आ सके। एडविन अर्नाल्ड के काव्य 'लाइट ऑफ एशिया` के द्वारा उन्नीसवीं सदी के आखिर में हमारे भद्रलोक को बुद्ध की जानकारी मिली। बीसवीं सदी के आरंभ में पुरातात्विक खुदाइयों से जब मोहनजोदड़ो, हड़प्पा की खुदाई हुई तो आर्य श्रेष्ठता का दंभ ढीला पड़ा, क्योंकि पता चला कि आर्य संस्कृति से पूर्व ही यहां उससे कहीं श्रेष्ठ सभ्यता-संस्कृति मौजूद थी। कुम्हरार, नालंदा, विक्रमशिला आदि की खुदाई के बाद लोगों को अशोक और बुद्ध के बारे में विस्तार से जानकारी मिली।कभी-कभी सोचता हूं कि जोतिबा फुले को यदि बुद्ध की जानकारी मिल गयी होती तो क्या होता। फुले भारत के दलितों के लिए इतिहास ढूंढते पौराणिक कथाओं में पहुंचे और बलि राजा को अपना नायक बनाया। भारत के लिपिबद्ध इतिहास में उनके लिए कुछ नहीं था। उन्हें अपने लिए एक गॉड की जरूरत थी, निर्मिक नाम से उन्होंने अपना भगवान गढ़ा। फुले को यदि संपूर्णता के साथ बुद्ध और बौद्ध इतिहास की जानकारी होती तो अपनी वैचारिकी को वे अपेक्षाकृत ज्यादा विवेकपूर्ण बनाते और तब संभवत: आधुनिक भारत के इतिहास का चेहरा जरा भिन्न होता। फुले रेगिस्तान के प्यासे हिरण की तरह बहुत भटकते रहे। वे समानता के आग्रही थे। ब्राह्मणवाद से वे मुक्ति चाहते थे। हिन्दू वर्णधर्म का खात्मा चाहते थे। किसानों और शूद्रों का राज चाहते थे। अपनी चेतना से जितना हो सका उन्होंने किया। अंबेडकर को बुद्ध और मार्क्स दोनों उपलब्ध थे, उन्होंने दोनों का उपयोग भी किया। इसलिए वैचारिक रूप से वे ज्यादा दुरुस्त और संतुलित हैं।आज यह कहना मुश्किल है कि बुद्ध और मार्क्स हमारे समय को कितना प्रभावित कर रहे हैं। कुछ सामाजिक दार्शनिक विचारहीनता के दौर की बात करते हैं। लेकिन जिसे लोग विचारहीनता कहते हैं, वह भी अपने आप में एक विचार है। पुराने जमाने के चार्वाक की बातों को लें तो कमोबेश ऐसी ही विचारहीनता अथवा सभी मान्य विचारों के निषेध की बात वह भी करते थे।आज कहीं-न-कहीं चार्वाकवाद के प्रभाव में हमारा जमाना आ चुका है। कम से कम ऋण लेकर घी पीने की उनकी सलाह (ऋण संस्कृति) तो हमारे समय का सबसे बड़ा विचार बन गया है। लेकिन हमें याद रखना चाहिए कि चार्वाकवादियों ने वेद और ईश्वर का चाहे जितना निषेध किया हो सामाजिक परिर्वतन के लिए कुछ नहीं किया। वर्ण धर्म पर वे चुप थे। इसीलिए कुछ मुकम्मल मार्क्सवादी मित्र जब भारतीय दर्शन में लोकायत और चार्वाक से अपनी नजदीकी तलाशते हैं तो मुझे एतराज होता है।मार्क्स ने बहुत सी बातें की हैं लेकिन उनकी बात जो आज भी हमें उत्साहित करती है वह यह कि अब तक के दार्शनिकों ने विभिन्न तरह से विश्व के स्वरूप की व्याख्या की है, लेकिन सवाल यह है कि इसे (विश्व समाज को) बदला कैसे जाय।
बुद्ध और मार्क्स यहां एक साथ नजर आते हैं।
भूत हैं कि भागते नहीं - डॉ विनय कुमार

उदारीकरण के प्रथम प्रस्तावक डाण् मनमोहन सिंह आज भारत के प्रधानमंत्री हैं। वामपंथियों और क्षेत्राीय पार्टियों के कंधों पर सवार गठबंधन सरकार के मुखिया होने के बावजूद उदारीकरण की प्रक्रिया के प्रति उनकी उदारता में कोई कमी नहीं आयी है, मगर पिछले दिनों उनका एक ऐसा बयान आया, जो विज्ञान की पूंजी और पूंजी के विज्ञान पर सवार इक्कीसवीं सदी के ग्लोबल मिजाज से मेल नहीं खाता। माननीय मनमोहन सिंह ने फरमाया था कि उनकी मृत्यु के लिए यज्ञ किया गया है। इस बयान के आते ही पत्राकार बंधुओं का इतिहासबोध जागा और हर खासो-आम को याद दिलाया गया कि इंदिरा जी की मृत्यु के लिए भी यज्ञ हुए थे। ज़मीन की राजनीति और राजनीति की ज़मीन से सीमित जुड़ाव के बावज़ूद प्रधानमंत्री बने डाण् सिंह के बयान को राजनीतिक हलकों में भले गंभीरता से न लिया जाय, लोकमानस के अध्येताओं की दृष्टि में यह एक ख़तरनाक बयान है। परंपरागत रूढ़ियों और मान्यताओं को दिल के आईने में तस्वीरे-यार की तरह बसाने वाले देश के लोग इसे आधुनिकता के प्रभावों में चेतन स्तर पर भले खारिज कर दें, अचेतन स्तर पर इसे ग्रहण करेंगे ही । और सबसे अहम बात तो यह कि सूचनाओं की पहुंच अब उस इलाके तक भी है जहां चिकेन पॉक्स और मीजल्स के शिकार व्यक्ति का परिवार अपने जाने-अनजाने अपराधों के लिए शीतला मैया से माफी मांगने लगता है। ऐसे बयानों और सूचनाओं के राजनीतिक निहितार्थ चाहे जितने छिछले हों, मनोवैज्ञानिक प्रभाव गहरे होते हैं। कोई जड़मति किसी भी बातचीत या बहस पर निर्णायक ठप्पा जड़ते हुए कह सकता है कि देखिए साहब, इंदिरा जी की हत्या हो गयी थी और मनमोहन सिंह जैसा व्यक्ति भी मारण-यज्ञ से चिंतित है, इससे यह सिद्ध होता है कि कलियुग में भी मंत्राशक्ति कारगर है।
रूढ़ियों और अंधविश्वासों की उत्पत्ति जानना आसान नहीं। पृथ्वी पर जीवन के संभव होने से आज तक उनके बनने-मिटने की प्रक्रिया जारी है। एक मोटे अनुमान के तहत यह माना जा सकता है कि ´पीड़ा के बदले पीड़ा´ और ´आनंद के बदले आनंद´ के सिद्धांत से संचालित पशुजगत के बीच विकसित होता मनुष्य अच्छा-बुरा, काला-सफेद, सुखद-दुखद जैसे सरलीकरणों में सदियों तक उलझा रहा होगा। सुर-असुर, खुदा-शैतान, गॉड-डेमॉन जैसे सरल सूत्रा भी इसी प्रिमिटिव माइंड की उपज प्रतीत होते हैं । जन्म और मृत्यु के शुभ-अशुभ के बीच हंसते-रोते मनुष्य के पास विचार के नाम पर इन सरल सूत्रों से अिधक कुछ संभव भी नहीं था। इन्हीं सरलीकरणों की रोशनी में सभ्यता का शकट आगे बढ़ा। इस यात्रा में जितनी भी उलझनें आयीं, उन्हें इन्हीं सूत्रों के आधार पर समझने की कोशिश की और इसी कोशिश में रूढ़ियां बनती रहीं। उदाहरण के तौर पर अगर कोई स्त्री पुरूष से प्यार न मिलने के कारण कई दिनों से उदास और चुप हो तो समझा जाता है कि वह किसी असुर या बुरी आत्मा के प्रभाव में है। उस काल के मनुष्य के पास स्त्राी की पीड़ा को समझने के वैचारिक औजार थे ही नहीं। तो इस प्रकार रूढ़ि बनी कि उदास और खामोश स्त्री और पुरूष का अर्थ है प्रेत व चुडै़ल का प्रभाव। इस तरह की हजारों रूढ़ियां सभ्यता के विकास-क्रम में बनीं। दरअसल जन्तु-जगत में मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है जो विचार और कल्पना कर सकता है। अपने इर्द-गिर्द घटित होने वाली घटनाओं के कारण-परिणाम पर विचार करना उसके स्वभाव में है। विचार के क्रम में उपलब्ध जानकारियों को कच्चेमाल की तरह इस्तेमाल करते हुए जब उसकी जिज्ञासा क्षुधा शांत नहीं होती तो वह बेचैन हो उठता है। मनुष्य और उसकी सभ्यता की विकास-यात्राा में असीमित जिज्ञासा की बेचैनी लगातार साथ चलती रही है। इस बेचैनी से एक हद तक राहत दिलाने का काम करती है कल्पना। कल्पना की कोई सीमा नहीं होती। वह न सिर्फ दृश्य-जगत की वस्तुओं के बीच असंभव प्रतीत होते संबंध गढ़ती है, प्रत्युत अदृश्य जगत में भी दृश्यों की सृिश्ष्ट करती है। इन स्थापनाओं की रोशनी में समझा जा सकता है कि किस प्रकार मनुष्य ने अदृश्य जगत में मिथकों का संसार रचा और अपने सरलीकरणों के आधार पर देवता और दानव गढ़े । जब डरे हुए मनुष्य का काम एक देवता से नहीं चला तो उनकी आबादी बढा़ता चला गया और जब डर और दुख के कारणों की जड़ में एक ही असुर की भूमिका स्थापित नहीं कर पाया तो तरह-तरह के अुसरों की दुनिया बसा ली। भूत और प्रेत इसी दुनिया के बाशिंदे हैं। जब दृश्य और अदृश्य दो संसार बन ही गए तो कल्पना ने दोनों के बीच आवाजाही भी सुनिश्चित की। मनुष्य स्वर्ग और नरक जाने लगे और देवता और भूत-प्रेत मनुष्यों की सवारी गांठने लगे। प्रागैतिहासिक जंगलों में शुरू हुई यह रिश्तेदारी आज भी बदस्तूर कायम है। जब भूत-प्रेत दृश्य जगत में आने लगे तो उन्हें बुलाने वाले दुष्ट स्रोतों की कल्पना करनी पड़ी। इसी कोशिश में डायन तंत्रा का विकास हुआ । भूत-प्रेत की कहानियां पीढ़ी-दर-पीढ़ी पकती रहीं और एक ऐसा समय भी आया कि ये सच प्रतीत होने लगीं। तब जरूरत महसूस हुई उनसे मुक्ति की। इसके लिए उस समय के मनीषियों ने मंत्रों की सृिष्श्ट की। इसे ओझागिरी की शुरुआत माना जा सकता है। दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग तरह की सभ्यताओं का विकास हुआ। मगर सब में एक समानता रही। सुरों और असुरों के मिथकीय संसार सबमें विकसित हुए।
दृश्य और अदृश्य संसारों में विकसित होती हुई सभ्यता में एक और विभाजन शुरु से ही रहा-सबल और निर्बल का। सबल वे हुए जो बल या बुिद्ध से किसी पर बीस पड़े। सभ्यता के सारे कानून और समाज को चलाने के सारे नियम सबलों के मुख से निकले। उन्होंने वही कहा जो उन्हें सूट किया। उन्होंने अपने को देवता घाषित किया और निर्बलों से उनका मनुष्यत्व तक छीन लिया। सभ्यता की सारी अच्छाइयों का श्रेय सबलों ने लिया और बुराइयों का ठीकरा कमजोर मनुष्यों के सिर पर फोड़ा। इसी क्रम से जादू-टोना, भूत-प्रेत और डायन विद्या का कचरा सामाजार्थिक दृष्टि से कमजोर लोगों के खाते में डाला गया। स्त्रियों की स्थिति शुरू से ही खराब रही। शायद यही कारण है कि `डायन´ और `विच´ जैसे शब्द स्त्रीलिंग हैं। इतिहास इस बात की भरपूर गवाही देता है कि सबलों ने अपने शत्रुओं को असुर और बुरी आत्माओं का एजेंट बताकर मारा। आधुनिक यूरोप के आरंभिक तीन सौ सालों के इतिहास में `विच-हन्ट´ के नाम पर होने वाली लाखों हत्याओं का उदाहरण हमारे सामने है। इन तीन सौ सालों में पूरे यूरोप पर एक जुनून सवार रहा। सब इस अंधविश्वास पर कायम रहे कि उनके इर्द-गिर्द जो भी हो रहा है वह डायनों की करतूत है। इस अंधविश्वास का सबसे खतरनाक पहलू यह रहा कि शासन तंत्रा भी इसे मानता रहा। डायनों पर मुकदमे हुए, एकतरफा सुनवाई हुई और उन्हें सजा सुनाई गई। क्रूरताओं के मामले में मानव सभ्यता के इतिहास में अव्वल यूरोप की अदालतों ने डायनों के लिए घनघोर उत्पीड़न से लेकर हत्या तक की सजाएं सुनायीं। विच-हन्ट के जड़बुिद्ध उन्माद में पुरुषों की तुलना में स्त्रिायां अिधक मारी गयीं।
भारत मानवीय ही नहीं मिथकीय चरित्रों और भूत-प्र्रेतों की आबादी के दृष्टिकोण से भी काफी संपन्न है। इस संपन्नता को बढ़ाने की कोशिशें कई स्तरों पर जारी हैं। आज भी गांवों मे स्त्रिायों को डायन बताकर मारा जा रहा है डायन-हत्या के `मास्टर-माइंड´ को अच्छी तरह मालूम होता है कि यह डायन नहीं है। यह सारा नाटक किसी परिवार से शत्रुता साधने के चक्कर में होता है और उद्देश्य होता है कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे। यानी हत्या भी हो जाए और हत्या का मुकदमा भी न चले। अक्सर ऐसी घटनाएं वंचितों के बीच घटित होती हैं। मगर ऐसा नहीं है कि डायन और भूत के चक्कर में सिर्फ गरीब और अशिक्षित लोग हैं। मंदिरों और मजारों पर भूत झड़वाने वालों की कतार में आपको आइआइटियन, आईएएमियन, आइएएस, आइपीएस, आमीZ ऑफिसर्स से लेकर वैज्ञानिक तक मिल जाएंगे । नेताओं और फिल्मवालों के अंविश्वासों की मिसालें तो आए दिन मिलती ही रहती हैं। यह नीति नियामकों की कुढ़मगजी का ही करिश्मा है कि प्राइम-टाइम में `हवाएं´ जैसे अंधविश्वासवधर्क सीरियल दिखाए जाते हैं।
और ऐसे वक्त में आया है हमारे प्रधनमंत्री डाक्टर मनमोहन सिंह का बयान। यह बयान अंधविश्वास के झंडाबरदारों और पिछलग्गुओं के मन मोह लेगा, इस बात की पूरी संभावना है मगर अफसोस कि यह मनमोहक बयान देश के मानसिक स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है।
मनोरोग और भूत-प्रेत के बीच गहरे संबंध इनकी उत्पत्ति के युग से कायम हैं। सुदूर अतीत में मनुष्य के व्यवहार में अचानक या क्रमश: होनेवाले परिवर्त्तनों की व्याख्या संभव नहीं थी। उस वक्त मनुष्य के पास अपने सरल सोच से काले पहलू की तरफ उंगली उठाने के सिवा कोई चारा भी न था। बुरी आत्माओं और भूतों की जकड़न की अवèाारणा जब एक बार आ गयी तो आ गयी। यह सिलसिला टूटने का नाम नहीं ले रहा। वैज्ञानिक दृष्टि-संपन्न लोगभी अपने परिजन की पीड़ा देखकर सोचते हैं- भूत झड़वाकर देख लेने में क्या हर्ज है। इनके प्रसार का एक और महत्वपूर्ण कारण है, गंभीर मनोरोगों का वह लक्षण जिसे रोगग्रस्त व्यक्ति यह कहकर प्रकट करता है कि उसे भूत ने पकड़ लिया है या वह किसी डायन के प्रभाव में है। यह लक्षण एक तरह का वहम होता है, वहम यानी एक ऐसा गलत यकीन जो सिर्फ रोगी का सच हो। रोगी के मन में यह गलत यकीन उस परिवेश और परंपरा से आता है, जिसमें वह पला बढ़ा होता है। चूंकि रोगी के मुंह से यह बात निकलती है, इसलिए परिजनों को लगता है कि मंदिरों और मजारों की मदद ली जाए। समाज के प्रबुद्ध अंधविश्वासियों की जानकारी के लिए बता दूं कि मनोचिकित्सकीय कार्य करते हुए कई बार ऐसे मौके आए हैं जब मुझे भूत झाड़ने वालों का इलाज करने का मौका मिला है। उनकी शिकायत यह होती है कि उन्होंने किसी का भूत झाड़ा और वह भूत उन्हीं पर आ गया । ये भूत ऐंटीसायकोटिक दवाओं की हल्की मार से ही दुम दबाकर भाग निकलते हैं।
भारत भौगोलिक दृष्टि से बड़ा और समाजार्थिक-संस्कृतिक दृष्टि से विविधताओं का देश है। कहा जाता है यहां एक ही साथ कई सदियां रहती है। इस देश में आज भी काफी लोग हैं जो राजनीतिक फायदे के लिए बड़ी मासूमियत से यह मानते हैं कि यहां इसी धरती पर एक समय ऐसा भी था कि हनुमान के चरण रखते ही पर्वत पाताल चला जाता था । यह देश राकेश शर्मा और कल्पना चावला का यकीनन है मगर यह औद्योगिक क्रांति की मलाई खानेवाले गोरों की तरह तिजारत में माहिर उन सौदागरों का भी है जिन्होंने सुनीता विलियम्स को बचाने के नाम पर एसएमएस के जरिए करोड़ों की कमाई की और यह देश ग्लोबलाइजेशन की रोशनी में नहाए उन करोड़ों हाथों का भी है जिनके हाथों में संचार का अत्याधुनिक यंत्र है मगर मन में यह भोली आस्था भी कि थर्मल ब्लैंकेट की मरम्मत टेक्नोलॉजी करे-न-करे दुआएं अवश्य कर देंगी।
सभ्यता के विकास ने मनुष्य की तर्कबुिद्ध और विवेकशक्ति का विकास किया। वह पूछने लगा कि काला काला क्यों और सफेद सफेद क्यों ? रोशनी जब उसकी बुिद्ध के प्रिज्म से गुजरी तो फट गयी और वह जान गया कि सफेद के पेट में रंगों का मेला है। बुिद्ध और विवेक ने रूढ़ियों का विरोध किया। यह संघर्ष आज भी जारी है। सच है कि वह कारवां जिसकी लंबाई प्रकाश-वर्षों में नापी जाए एक साथ `सन-राइज´ प्वाइंट तक नहीं पहुंच सकता। मगर यह भी सच है कि जानकारी का प्रकाश, प्रकाश की गति से सिर्फ आठ मिनटों में सूरज से पृथ्वी तक आ जाता है।
Thursday, May 8, 2008
साधो, मन माने की बात - कुमार मुकुल
मन एवं मनुष्याणां मन यानी कि मानस ही मनुष्य है, एक प्रचलित उक्ति है। वेद भी मन की महत्ता से भरे हैं। आज भी मन की शक्ति से खुद को मुक्त नहीं कर पा रहा है कोई। सारे संयम मन से ही संचालित होते हैं। कबीर ने भी लिखा था : मन ना रंगाये रंगाये जोगी कपड़ा। पिछले वर्षों में भारत में ऐसे जोगियों की धूम मची रही। वेद-परम्परा आदि के नाम पर एड़ी-चोटी का पसीना एक करते रहे।
काश! उन्होंने वेदों को पढ़ने की जहमत उठाई होती तो उनहें एक-दूसरे के खून से अपने हाथ न रंगने पड़ते। मानो तो देव नहीं तो पत्थर यह लोकोक्ति वैदिक ही है। क्योंकि वहा¡ भी यही लचीलापन है। जिसके मन को जो भा रहा है, वही बात कर रहा है, कह रहा है। वहा¡ कोई नियम नहीं है, मन को बांधने वाला।
यजुर्वेद में मन के बारे में ऋचा है : इयमुपरि मति:, मतलब यह जो मानस से उपजी बुिद्ध है। वही सर्वोपरि है। आगे की ऋचाओं में उसे विश्वकर्मा भी बताया गया है। प्रजापति विश्वकर्मा मनो गंèार्व: यानी मन रूपी गंधर्व ही प्रजापति ब्रह्म और विश्वकर्मा है।
दरअसल वेद के सारे कथन `मनमाने´ की बात हैं। वे प्रमाण हैं कि कैसे मानव मन का निरन्तर परिष्कार होता गया। उन्होंने वही लिखा, जो उनके मन को भाया। ऋग्वेद के पा¡चवें मंडल के सत्तरवें सूक्त में एक पंक्ति हैµवय ते रुद्रा स्यामा। यानी हम भी दु:खहारी रुद्र हों। वहीं पहले मंडल के 164वें सूक्त में एक पंक्ति में इसी तरह कहा गया है कि हम सब भगवान हों।
माने आदमी-देवता और भगवान में कोई विशेष अन्तर नहीं था। वैदिक माल में वैदिक ऋषि देवता होने की कामना करते थे, देवता होते थे और जो उनके मन को भाता था उसे देवता पुकारते थे। यह सब मनोभाव के स्तर पर था, उसकी कोई मूर्ति नहीं थी। यजुर्वेद के बत्तीसवें सूक्त में एक पंक्ति है : न तस्य प्रतिमा ·अस्ति। यानी उस परमचैतन्य की मूर्ति नहीं बनाई जा सकती। ऐसा इसलिए था कि ईश्वर या देव एक मनोभाव था। अलग-अलग लोगों के लिए अलग-अलग काल में उसके जुदा निहितार्थ थे।
देखा जाए तो वैदिक काल में मनुष्यों का मन भी तरह-तरह की कल्पनाए¡ करता है। जब वह सुबह को देखता है तो उल्ल्सित हो उठता है। और उषा की अर्चणा में ऋचाए¡ रचता है। रात से वह भी भय खाता है और उसे सर्वग्रासी बताता है। सोमपान के बाद उसका मन भी प्रमत्त हो जाता है और वह असंभव कल्पनाए¡ करने लगता है। जरा ऋग्वेद के दसवें मंडल के 119वें सूक्त की पंक्तियों के अर्थ देखें। उसमें कहा गया है : ``मैं पृथ्वी को जहा¡ चाहू¡ उठाकर रख सकता हू¡, क्योंकि मैं अनेक बार सोमपान कर चुका हू¡।´´ या ``मेरा एक पक्ष स्वर्ग में स्थापित है तो दूसरा पृथ्वी पर। क्योंकि मैं अनेक बाद सोमपान कर चुका हू¡।´´
मनोभावों को स्वच्छन्द ढंग से अभिव्यक्त करने की यह प्रवृतî