कारवॉं

नयी मंज़िल के मीरे-कारवाँ भी और होते हैं
पुराने ख़िज़्रे-रह बदले वो तर्ज़े-रहबरी बदला
-फ़िराक़ गोरखपुरी

मंगलवार, 11 दिसंबर 2018

अपने दुख से सौंदर्य की रचना करो : वॉन गॉग - कुमार मुकुल

चित्रकार बनने की आकांक्षा वॉन गॉग में शुरू से थी। गरीबी और अपमान में मृत्यु को प्राप्त होनेवाले महान चित्राकार रैम्ब्रां बहुत पसंद थे विन्सेन्ट को और उसका अंत भी रैम्ब्रां की तरह हुआ और दुनिया के कुछ महान लोगों की तरह उसकी पहचान भी मृत्यु के बाद हुई। जीते जी तो कला के प्रति उसकी दीवानगी अभाव और उपेक्षा की आंच में झुलसती रही पर मरने के बाद प्रसिद्धि ने कभी उसका दामन नहीं छोड़ा। उसके चित्रा दुनिया के सबसे महंगे चित्राों की सूची में हमेशा जगह बनाये रहे। आज वॉन गॉग के सेल्फ पोर्टे्रट की कीमत तीन अरब है। और दुनिया के सबसे महंगे दस चित्राों में उसके चार चित्रा शामिल हैं। उनके शिक्षक मेन्डेस ने उससे कहा था-÷...तुम्हें कई बार लगेगा कि तुम हार रहे हो लेकिन आखिरकार तुम खुद को अभिव्यक्त करोगे और वह अभिव्यक्ति तुम्हारे जीवन को मायने देगी।'
और विन्सेन्ट की रचनाओं ने, चित्राें ने उसके जीवन को जो मायने दिये उनके अर्थ उसकी मौत के बाद खुले तो खुलते चले गए और आज उसके रंग दशों दिशाओं में फैलते चले जा रहे हैं।इक्कीस साल की उम्र में विन्सेन्ट को उन्नीस साल की एक गरीब, पतली-दुबली लड़की उर्सुला से प्यार हो गया था। त्राासदी यह कि उर्सुला की मंगनी हो चुकी थी और जब विन्सेन्ट ने प्यार का वास्ता दे उसके सामने विवाह का प्रस्ताव रखा तो रोते हुए उर्सुला ने कहा-÷क्या मुझे हर उस आदमी से शादी करनी होगी जिसे मुझसे प्यार हो जाए?' आखिर वह नहीं मिली उसे और इस विडंबना ने अंत तक उसका पीछा नहीं छोड़ा। उसके जीवने में जो भी स्त्राी उसके निकट आई और जिसे भी उसने अपने अंतर्तम से प्यार किया उसे खो दिया विन्सेन्ट ने। इस दौरान राग-विराग के दौर में कभी तो उसने पादरी बनने की कोशिश की, कभी शिक्षक और कभी खदान मजदूर का जीवन जीते उसने खुद को भूखा रखकर मौत की कगार तक पहुंचा दिया। पादरी बनने की कोशिश के दौरान वे उपदेश देते-÷...कोई भी दुख बिना उम्मीद के नहीं आता...'। वह प्रार्थना करता-÷...कि हमें न निर्धनता दे न धन, हमें उतनी रोटी दे जितना हमारा अधिकार बनता है।' अंत तक यह उपदेश जैसे उसके साथ खुद को प्रमाणित करता रहा।बोरीनाज के खदान मजदूरों को उपदेश के दौरान जब उसे लगा कि उसके गोरे चिट्ठे रंग के चलते मजदूर दूरी महसूस करते हैं तो उसने अपने चेहरे पर कोयले की धूल मलनी आरंभ कर दी ताकि उन जैसा दिख सके। अंत में यह नाटक भी खत्म किया उसने और मजदूरों सा जीवन जीना आरंभ किया और भूखे रहने की आदत डाल ली और खुद को बीमार करता मौत की कगार पर पहुंचा दिया। मार्क्स ने जिस डिक्लास थ्योरी की बात की है उसे उसने आजीवन खुद पर लागू किया। इसी जिद में उसने खुद को शारीरिक और मानसिक रूप से बीमार कर लिया।पहले प्रेम में असफलता से पैदा विराग ने उसे कैथोलिक पादरी या धर्मोपदेशक बनने की राह पर डाल दिया था। पर मजदूरों को उपदेश देते और उनके जैसी जिन्दगी जीते उसे भान हुआ कि उनका कष्ट अपार है। उसने खान के मैनेजर से प्रार्थना की कि आप कम से कम कुछ ऐसा तो कर ही सकते हैं जिससे खान में दुर्घटनाएं कम हों और मजदूरों की मौतों में कमी आए। पर मैनेजर के जवाब, कि हमारे पास निवेश के लिए एकदम पूंजी नहीं है, ने विन्सेन्ट को भीतर से निराश कर दिया और उसने सोचा कि एक दृढ़निश्चयी कैथोलिक से वह नास्तिक बनता जा रहा है। उसे समझ में नहीं आ रहा था कि ÷इतनी दयनीय निर्धनता में शताब्दी दर शताब्दी रह रहे लोगों के लिए ईश्वर ऐसी दुनिया की रचना कैसे कर सकता है, जिसमें जरा भी दया न हो।'
आखिर जब चर्च के लोग उस प्रदेश में धर्म की प्रगति जानने पहुंचे तो पाया कि वॉन गॉग उनके पवित्रा, उज्ज्वल धर्म को गरीबी और निर्धनता में लथेड़ चुका है। दो सौ मजदूरों के बीच बैठा वह खान में दबकर मर गए सत्तावन मजदूरों के लिए प्रार्थना करने को था कि जांच के लिए पहुंचे चर्च के लोगों के लिए वहां की गंदगी को बर्दाश्त करना कठिन हो गया। वॉन गॉग को झिड़कते हुए उन्होंने कहा-लगता है हम अफ्रीका के जंगल में हैं...किसने सोचा था कि यह आदमी इतना पागल निकलेगा...मैं तो इसे शुरू से ही पागल समझता था...।' अंत में उन्होंने उसे कहा कि तुम हमारे चर्च का अपमान करना चाहते हो, कि अब तुम अपनी नियुक्ति निरस्त समझ सकते हो।दब कर मर गए मजदूरों के लिए हड़ताल करते मजदूरों को आखिर समझाकर काम पर भेजने के बाद वॉन गॉग ने पाया कि बाइबिल अब उनके किसी काम की नहीं थी, कि ईश्वर ने उनकी तरफ पत्थर के कान कर रखे हैं।
इन सब चीजों ने उसे फिर एक बार गहरी हताशा की ओर ढकेल दिया। उसने पाया कि ईश्वर कहीं नहीं था...एक हताश, क्रूर, अंधी अस्त-व्यस्तता थी...इस पागलपन से निकलने के लिए वह फिर अपने पुराने पागलपन की ओर मुड़ा और चित्राकारी शुरू कर दी और बोरीनाज के खदान मजदूरों के चित्रा बनाने लगा। कुछ चित्रा बना लेने के बाद विन्सेन्ट को लगा कि उसे अपने चित्राों के बारे में किसी की राय लेनी चाहिए, और उसे वहां से अस्सी किलोमीटर दूर ब्रुसेल्स में रह रहे चित्राकार रैवरैण्ड पीटरसन की याद आई और उसने उनसे मिलने का इरादा किया। उसके पास टिकट के पैसे नहीं थे और वह पैदल ही निकल पड़ा। उसके पास मात्रा तीन फ्रैंक थे। करीब छत्तीस घंटे की यात्राा के बाद उसके जूते के तल्लों ने जवाब दे दिया और उसके जूते को फाड़ अंगूठे बाहर झांकने लगे। पांवों में छाले पड़ चुके थे। इस हालत में एक रात का विश्राम लेकर भूखा-प्यासा वह फिर निकल पड़ा और बु्रसेल्स पहुंचा। मानव इतिहास में किसी रचनाकार की जिजीविषा का ऐसा उदाहरण और कहां मिलेगा? खाक और धूल में लिथड़ी विन्सेन्ट की सूरत देख रैवरैण्ड की बेटी चीखती भाग खड़ी हुई। आखिर जब रैवरैण्ड ने उसे पहचाना तो बोले-तुम्हें देखना कितना सुखद है, सीधे भीतर चले आओ। विन्सेन्ट कितना खुश हुआ होगा, यह हम सोच सकते हैं। आखिर ईसा के उस कथन के, जो विन्सेन्ट को प्रिय था, कि कोई भी दुख बिना उम्मीद के नहीं आता, निहितार्थों को यहां समझा जा सकता है।
रैवरैण्ड के साथ कुछ दिन बिताने के बाद जब विन्सेन्ट वास्मेस गांव लौटने लगा तो रैवरैण्ड ने उसे अपना पुराना जूता और लौटने के टिकट के पैसे दिये।रैवरैण्ड से मिली सलाह और उत्साहवर्धन के बाद उसने कुछ और चित्रा बनाये। फिर सोचा कि इसे उस समय के चर्चित चित्राकार जूल्स ब्रेतों को दिखाए। पर ब्रेतों वहां से एक सौ सत्तर किलोमीटर दूर रहता था और हमेशा की तरह उसके पास पैसे नहीं थे। थोड़ी दूर वह ट्रेन से गया और फिर पांच दिन-रात पैदल चलकर जब कूरियेरेस में ब्रेतों के स्टूडियो तक पहुंचा तो उसकी भव्यता देख उसकी हिम्मत नहीं पड़ी भीतर जाने की और वह वापिस चल पड़ा-भूखा, प्यासा, पैदल। भूख लगने पर वह अपने चित्राों को देकर बदले में पावरोटी मांग कर खाता, सप्ताहों की पैदल दिन-रात की यात्राा के बाद घर पहुंचा। इस यात्राा में वह अपना कई पौंड वजन कम कर चुका था और बुखार की चपेट में आ चुका था। इसी अर्धमृतावस्था में उसका भाई थियो वहां आ पहुंचा और उसने अपने प्यारे भाई को संभाला। थियो ने हमेशा विन्सेन्ट को उसके पागलपन के साथ प्यार किया और न्यूनतम जीवनयापन की उसकी व्यवस्था में उसका अहम योगदान रहा। पहले प्यार की त्राासदी, बाईबिल के अध्ययन और कठोर जीवन शैली के चुनाव ने हमेशा विन्सेन्ट के भीतर एक चिंतक को जाग्रत और विकसित किया। पर भाई की संगत और प्यार में वह भावुक हो जाता था। एक जगह वह थियो से कहता है-÷क्या हमारे अंदर के ख्याल बाहर से दिखाई पड़ सकते हैं? हमारी आत्मा में एक आग जल रही हो सकती है जिसे बगल में बैठकर तापने कोई नहीं आता। आने-जानेवालों को सिर्फ चिमनी से निकलता धुंआ दिखाई पड़ता है...।'विन्सेन्ट को ÷लैंडस्केप से प्रेम था पर उससे भी ज्यादा उसे जीवन से भरपूर उन चीजों से प्रेम था, जिनमें उत्कट यथार्थवाद होता था...।' वह जानता था कि अभ्यास को किताबों के साथ नहीं खरीदा जा सकता और उसका कोई विकल्प नहीं होता इसलिए जीवन भर वह श्रम करता अपनी कला को लगातार धार देता रहा।
उसके चचेरे भाई मॉव का कथन था कि आदमी चित्राों पर या तो बातें कर सकता है या चित्रा ही बना सकता है। ...कि ÷कलाकार को स्वार्थी होना चाहिए। उसे काम करने के हर क्षण की रक्षा करनी चाहिए।' विन्सेन्ट श्रम तो करता रहा पर स्वार्थी नहीं हो सका। उसकी माली हालत को देखकर मां सलाह देतीं कि वह धनी महिलाओं के चित्र क्यों नहीं बनाता तो उसका जवाब होता-÷प्यारी मां, उन सबका जीवन इतना सुविधापूर्ण होता है कि उनके चेहरों पर समय ने कोई भी रोचक चीज नहीं बनाई होती।' मां पूछती कि गरीबों के चित्रा बनाकर क्या फायदा, वे तो उसे खरीदेंगे नहीं। मां की नीली, गहरी साफ आंखों में शांतिपूर्वक देखता विन्सेन्ट बोलता-÷अंततः मैं अपने चित्रा बेच सकूंगा...'। एक पुरानी कहावत हमेशा विन्सेन्ट को याद रही-÷अपने दुख से सौंदर्य की रचना करो।' और दुख से रचे उसके चित्राों की कीमत अंततः मरने के बाद ही जानी जा सकी।अठ्ठाइस साल की उम्र में विन्सेन्ट को फिर प्रेम हुआ के से जो जॉन की मां थी। पर उसके मृत पति वॉस से उसे नफरत थी जिसे के भुला नहीं पा रही थी। उस दौरान मिशेले को पढ़ते हुए एक पंक्ति उसे जंच गई-÷यह जरूरी है कि एक स्त्राी आप के ऊपर बयार की तरह बह सके ताकि आप पुरुष बन सकें।' उसे लगा कि उर्सुला से मिली यातना को के ही दूर कर सकेगी पर के वॉस को भुला न सकी और दूसरा प्रेम भी विन्सेन्ट के लिए एक त्राासदी ही साबित हुआ। इससे पार पाने के लिए वह फिर द हेग में अपने कजिन मॉव के पास चला गया। फिर वही भूख और चित्राकारी की दीवानगी का दौर। ऐसे में उसे मिली क्रिस्टीन जो लॉन्ड्री में कपडे+ धोती थी और उससे पेट नहीं भरता तो पेशा करती थी। विन्सेन्ट को उसका साथ भा गया और उसके साथ वह रहने लगा। क्रिस्टीन ने विन्सेन्ट के जीवन में प्रेम की कमी को अंशतः पूरा किया। वह उससे मॉडल के रूप में भी काम लेता था। इसके अलावा मजदूरों और बूढ़ी स्त्रिायों को वह थोड़े पैसे के लिए मॉडल बनने का आग्रह कर अपने झोपड़ीनुमा स्टूडियो में ले आता था।वह सोचता, काश, वह अपने काम से अपनी रोटी भर कमा सके। उसे और कुछ नहीं चाहिए था। और वह कभी ठीक से अपनी रोटी भी नहीं कमा सका और आज उसकी कृतियां अरबों-खरबों कीमत की हैं-क्या यह उसी भूख की कीमत है ! भूख से कीमती कुछ भी नहीं शायद। विन्सेन्ट जानता था भूख अर्जित करने की कला। और, आज पूरी दुनिया का पेट भर दिया उसने। और यह दुनिया कभी उसका पेट नहीं भर पाएगी। उसका कर्जदार रहेगी यह दुनिया, जब तक रहेगी।ऐसा नहीं था कि विन्सेन्ट यूं ही ऐसा था। उसके आस-पास की दुनिया और उसके सलाहकार भी ऐसे ही थे। उस समय के राष्ट्रीय ख्याति के चित्राकार वाइसेंनब्रूख विन्सेन्ट को समझाते हुए कहते-÷...साठ साल के हर कलाकार को भूख से मरना चाहिए। तब शायद वह कैनवस पर कुछ अच्छे चित्रा बना सकेगा।...हुंह! तुम चालीस से ऊपर नहीं हो और बढ़िया काम कर रहे हो।' ॥अगर भूख और दर्द किसी आदमी को मार सकते हैं तो वह जीने के काबिल नहीं। इस धरती के कलाकार वही लोग होते हैं, जिन्हें ईश्वर या शैतान तब तक नहीं मार सकता जब तक वे उन सारी बातों को नहीं कह देते, जिन्हें वे कहना चाहते हैं।'
पर अभाव ने घर में कलह को जन्म देना शुरू कर दिया था। क्रिस्टीन और विन्सेन्ट झगड़ने लगे थे। एक दूसरे को समझते हुए वे एक साथ नहीं बारी-बारी गुस्सा होते। और अपनी भड़ास निकालते।कभी-कभी विन्सेन्ट को निराशा होती कि उसके समकालीन डी बॉक के चित्राों पर लोग पैसा लुटाते हैं और उसे काली डबलरोटी और कॉफी तक नसीब नहीं होती पर फिर वह अपने को संतोष देता-मैें सच्चाई और मेहनत की जिंदगी जीता हूं और यह ऐसी सड़क नहीं जहां किसी की मौत हो जाए। साफ है कि वह भविष्य की बाबत कह रहा था और वह सच्चाई थी, और विन्सेन्ट के बाद विन्सेन्ट की तरह भला कौन जिन्दा रहेगा ! उसके बनाये सूर्यमुखी सूर्य की तरह आज पूरी दुनिया में खिल रहे हैं उद्भासित होते अपने अनंत रंगदृश्यों के साथ।क्रिस्टीन के साथ रहने के चलते विन्सेन्ट को द हेग के सारे कलाकारों ने नीचा दिखाना शुरू किया। उसके चित्राकार भाई मॉव ने एक दिन कहा कि तुम दुष्ट चरित्रा के आदमी हो, तो विन्सेन्ट ने खुद को कलाकार बताया। मॉव ने मजाक उड़ाते हुए कहा-आज तक तुम्हारा एक चित्रा नहीं बिका और तुम कलाकार हो। विन्सेन्ट ने भोलेपन से पूछा-क्या कलाकार का मतलब बेचना होता है? मैं समझता था कि बिना कुछ पाए खोज में लगे रहना कलाकार का काम है। इसी तरह एक दिन डी वॉक ने कहा-हर कोई जान गया है कि तुमने एक रखैल रख छोड़ी है। क्या तुम्हें कोई और मॉडल नहीं मिली। विन्सेन्ट ने आपत्ति की कि यह मेरी पत्नी है। यह विवाद बढ़ता गया और उसकी रोटी पर भी आफत आने लगी। जिस माहौल से वह आई थी उसमें शराब और सिगरेट की आदतें बुरी तरह उसे जकड़े थीं। वह बीमार रहने लगी थी। उसके इलाज की व्यवस्था करता विन्सेन्ट सोचता-÷बेचारी ने अच्छाई कभी देखी ही नहीं...वह खुद अच्छी कैसे हो सकती है?' आखिर इस हद तक मानवीय होने पर दुनियावी समाज किसी को पागल ही तो समझता है, और एक दिन थक-हारकर व्यक्ति समाज के पागलपन को स्वीकृति देता हुआ अपने तथाकथित पागलपन को बचाए रखता है। आखिर वही तो उसकी पूंजी होती है। भविष्य में उसे पागल कहता समाज ही तो उसकी अरबों कीमत लगाता है, इस बात को विन्सेन्ट जैसा हर कलाकार जानता होता है।
क्रिस्टीन से शादी को लेकर एक दिन तेरेस्टीग ने भी उसकी फजीहत करते हुए कहा-÷दिमागी तौर पर बीमार आदमी ही ऐसी बातें कर सकता है।' पर विन्सेन्ट सोचता है-÷आदमी का व्यवहार, मौश्ये, काफी कुछ ड्राइंग की तरह होता है। आंख का कोण बदलते ही सारा दृश्य बदल जाता है...यह बदलाव विषय पर नहीं बल्कि देखनेवाले पर निर्भर करता है।' त्रासदी यह थी कि ये सारी बातें क्रिस्टीन के सामने संभ्रांत भाषा में होती थीं, थोड़ा बहुत क्रिस्टीन इसे समझती भी थी और दर्द से भर उठती थी। उसके मित्रा वाइसेनव्रूख ने एक दिन मजाक में कहा-÷...मैं चाहूंगा तुम्हारा चित्रा बनाना। मैं उसे ÷होली-फैमिली' कहूंगा!' इतना सुनकर विन्सेन्ट गाली बकता उसे मारने दौड़ा...।महत्त्वपूर्ण बात यह थी कि उसका भाई थियो, जो चित्राों का व्यापार करता था और हमेशा विन्सेन्ट की चिन्ता करता था, भी कम पागल नहीं था। उस दौर में विन्सेन्ट को उसके मित्रा चित्राकार यह कहकर डराते थे कि उसके भाई से शिकायत करेंगे वे उसके आचरण की और उसे थियो पैसे भेजना बंद कर देगा। उधर थियो था कि उसे भी भाई का दर्शन भाने लगा था। एक दिन उसने विन्सेन्ट को पत्रा लिखा कि उसने एक बीमार और आत्महत्या पर उतारू स्त्राी को अपने साथ जगह दी है और उससे शादी करना चाहता है। अभाव में क्रिस्टीन के साथ कठिन होते जीवन को देखते हुए उसने सलाह दी कि-वह इंतजार करे...उसके लिए जो संभव हो करे और प्रेम को पनपने दे, हड़बड़ी में शादी ना करे। उसकी आर्थिक स्थिति को देखते क्रिस्टीन ही शादी पर आपत्ति करने लगी थी। आखिर वह अपने गांव अपनी मां के पास लौट गया, शांति की खोज में। उसे स्टेशन छोड़ने क्रिस्टीन भी आई थी।गांव में वह पीठ पर ईजल टांगे खेतों में चित्रा बनाता घूमता रहता। इसी बीच उसके पड़ोस की एक स्त्राी मारगॉट उसके निकट आई। वह हिस्टीरिया की मरीज थी और बचपन से ही मन ही मन विन्सेन्ट को चाहती थी। एक दिन उसने मारगॉट को बताया कि प्यार करना तो आसान होता है मारगॉट ने कहा-हां, मुश्किल होता है बदले में प्यार पाना। मारगॉट ने उसे बताया कि वह सोचती थी कि बिना प्यार किए वह चालीस की नहीं होगी और उनचालीसवें साल में आखिर उसे विन्सेन्ट मिल गया। इस प्रेम ने उसके जीवन में सूखते सोते को जीवित कर दिया। मारगॉट की निगाहों में डूबा वह खेतों में घूमता चित्रा बनाता और समझाता-÷जिंदगी भी मारगॉट, एक अनंत खाली और हतोत्साहित कर देनेवाली निगाह से हमें घूरती है, जैसे यह कैनवस करता है।...लेकिन ऊर्जा और विश्वास से भरा आदमी उस खालीपन से भयभीत नहीं होता, बल्कि वह...रचना करता है और अंत में कैनवस खाली नहीं रहता बल्कि जीवन के पैटर्न से भरपूर हो जाता है।'क्रिस्टीन को बचा ना पाने के दर्द को समझते हुए मारगॉट उसे समझाती कि इसमें उसका क्या कसूर, क्या वह बोरीनाज के खदान मजदूरों को बचा पाया था। पूरी सभ्यता के खिलाफ एक आदमी क्या कर सकता है। मारगॉट की बात सही थी पर विन्सेन्ट तो वही आदमी था, पूरी सभ्यता के खिलाफ संघर्षरत, उसका रुख मोड़ देने को आतुर, वह भी प्रेम से, विश्वास की ताकत से। आखिर यह पागलपन ही तो था।
मारगॉट से प्यार के वक्त वह इकतीस का था। फिर उसकी पांच बहनें अविवाहित थीं। दोनों के घरवाले विवाह को तैयार नहीं थे। सबसे ज्यादा आपत्ति मारगॉट की बहनें कर रही थीं। विन्सेन्ट के इस तीसरे प्यार की त्राासदी ने उसके कैनवस के रंगों को और प्रभावी बनाया। उसे वाइसेनब्रूख का जीवन-दर्शन सही लगता-÷मैं कभी भी यातना को छिपाने का प्रयास नहीं करता, क्योंकि अक्सर यातना ही कलाकार की रचना को सबसे मुखर बनाती है।' इस यातना से कब पीछा छूटना था विन्सेन्ट का और अब वह नये रूप में आनेवाली थी। मारगॉट प्रसंग के चलते विन्सेन्ट ने अपना गांव ब्रेबेन्ट छोड़ा और नुएनेन में एक किसान परिवार के साथ मित्राता की। वहां उसे एक किसान की लड़की सत्रह साल की स्टीन मिली, जिसमें ÷हंसने की नैसर्गिक प्रतिभा थी।' वह उसके पास मॉडल के रूप में काम करने आती थी। गुस्साने पर वह विन्सेन्ट के चित्राों पर काफी फेंक देती या आग में झोंक देती। इसी किसान परिवार का आलू खाते चित्रा बनाया था विन्सेन्ट ने जो ÷द पोटैटो इटर्स' नाम से ख्यात हुआ। फिर स्टीन को लेकर भी स्थानीय पादरी ने आपत्तियां शुरू कीं। आजिज आकर वह अपने चित्राों के साथ पेरिस आ गया। अपने प्यारे भाई थियो के निकट।विन्सेन्ट को वही चित्रा पसंद थे जो कि वैसे बनाई गए हों जैसे कि वो नजर आ रहे थे। चाहे वो बदसूरत ही हों। वैसे चित्रा उसे जीवन पर धारदार वक्तव्य जैसे नजर आते रहे। उसकी नजर में वही सौेंदर्य था। विन्सेन्ट सोचता-चित्राों में नैतिकता थोपना या कोरी भावुकता में उन्हें चित्रिात करना उन्हे बदसूरत बना देना है।पेरिस में चित्राकार लात्रोक को यही समझा रहा था विन्सेन्ट। चित्राों के व्यापारी उसके भाई को पेरिस के सभी चित्राकार जानते थे और विन्सेन्ट को वहां अच्छी मंडली मिल गई। पाल गोगां, जॉर्जेस, स्योरो, लॉत्रोक आदि। प्रेम में लगातार मिली विफलता, भूख और अथक श्रम ने विन्सेन्ट को त्रास्त कर दिया था। अब एक उन्माद में वह खुद को झोंकता रहता था काम में। जीवन में मिली यातनाओं को रूपाकार देता वह पागल की तरह भिड़ा रहता था। अतीत से जूझता वह हिस्टीरिया के मरीज सा हो गया था। उसे दौरे भी पड़ने लगे थे। एक बार उसके चित्राों को देखते हुए पाल गोगां ने कहा-÷क्या तुम्हें दौरे पड़ते हैं, विन्सेन्ट।...तुम्हारे चित्राों को देखकर लगता है कि जैसे... वे कैनवस से फटकर बाहर आ जाएंगे...ऐसी उत्तेजना छा जाती है कि मैं उस पर काबू नहीं कर पाता।...वे हफ्‌ते भर में मुझे पागल कर देंगे।' गोगां ने कितना सच कहा था, विन्सेन्ट के बाद पूरी दुनिया उसके चित्राों के पीछे पागल है।
हड्डियों में घुसती पेरिस की ठंड से आजिज वहां के चित्राकार अक्सर सूरज की चर्चा करते। विन्सेन्ट ने भी एक दिन अपने भाई थियो से सूरज की रोशनी में दिन बिताने के लिए अफ्रीका जाने की जिद की। थियो ने कहा कि वह तो दूर है। अंततः उसने एक पुरानी रोमन बस्ती आर्लेस जाना तय किया। आर्लेस की धूप कुछ ज्यादा ही तेज थी। तिस पर विन्सेन्ट बिना हैट के सारा दिन पीठ पर ईजल टांगे यहां-वहां चित्रा बनाता दिन बिताता। वहां के लोग उसे सनकी पागल कहते।
विन्सेन्ट सोचता-शायद मैं पागल हूं, पर मैं क्या कर सकता हूं। घर, पत्नी, बच्चों और परिवार के बिना यातना से भरा जो उसका जीवन था उसका हल उसे इस पागलपन में सूझता था। एक रचनात्मक ऊर्जा में बदल रहा था वह इस यातना को। यह सूरज की रोशनी और उसकी आग में खुद को डुबो देने का पागलपन था। भूखों मरने का पागलपन था। वह सोचता-बना हुआ कैनवस खाली कैनवस से अच्छा होता है और वह लगातार कैनवसों पर काम करता रहता। गरीब कामगार लोगों के बीच काम करते उसे लगता कि ये कितने पवित्रा लोग हैं, अनंत काल तक ÷निर्धन बने रहने की प्रतिभा' से पूर्ण। अर्लेस में ही एक पेशेवर लड़की रैचेल से विन्सेन्ट की भेंट होने लगी थी। पांच फ्रैंक में वह विन्सेन्ट का साथ देने को तैयार हो जाती थी। पर विन्सेन्ट के पास जब पांच फ्रैंक भी नहीं रहते तो वह मजाक में कहती तब तुम बदले में अपने कान दे देना। और एक दिन जब विन्सेन्ट के पास पांच फ्रैंक भी नहीं थे तो यातना से भन्नाया विन्सेन्ट शीशे के सामने गया और चाकू से अपना दायां कान काट उसे रूमाल में लपेट रैचेल को देने चल दिया। रूमाल में कटे कान देख वह बेहोश हो गिर पड़ी। उधर घर पहुंच कर वह खुद बेहोश हो गया। सुबह उसे अस्पताल में भर्ती किया गया और किसी तरह बचाया गया। डॉक्टर ने बताया कि ऐसा सनस्ट्रोक के कारण हुआ।सामान्य होते ही वह फिर वैसे ही बिना हैट लगाये तेज धूप में पागलों सा ईजल लिए मारा-मारा फिरने लगा। डाक्टर रे ने एक दिन उसे समझने और समझाने की कोशिश करते हुए कहा-÷...कोई भी कलाकार सामान्य नहीं होता। सामान्य लोग कला की रचना नहीं कर सकते। वे सोते हैं, खाते हैं, सामान्य धंधे करते हैं और मर जाते हैं। तुम जीवन और प्रकृति को लेकर ज्यादा संवेदनशील हो ...पर यदि तुमने ख्याल नहीं किया तो तुम्हारी यह अतिसंवेदनशीलता तुम्हें तबाह कर देगी...।' अब उस इलाके के बच्चे उसके पीछे सारा दिन पड़े रहते, उसे पागल कह चिढ़ाते, उससे उसका दूसरा कान मांगते हुए। एक दिन तंग आकर उसने खिड़की से सारा सामान बच्चों पर फेंक मारा और खुद बेहोश हो गिर पड़ा। फिर तो उसे खतरनाक पागल घोषित कर गिरफ्‌तार कर लिया गया। अब डाक्टर की सलाह से उसे विस्तृत मैदानोंवाले एक पागलखाने में भर्ती किया गया। वहां डाक्टर पेरॉन उसकी देख-रेख के लिए थे। डाक्टर ने उसे धार्मिक गतिविधियों में भाग न लेने की छूट दिला दी और उसे कई बार नहाने की सलाह दी।आस-पास के पागलों को देख विन्सेन्ट परेशान हो जाता तो डाक्टर उसे समझाते-÷...इन्हें अपने बंद संसारों में जीने दो...तुम्हें याद नहीं ड्राइडन ने क्या कहा था? अवश्य ही पागल होने में भी आनंद है, जिसे केवल पागल ही जान सकता है...'। मजदूर और किसान हमेशा से विन्सेन्ट को पसंद थे। वह खुद को किसानों से नीचा समझता था। वह उनसे बोला करता-आप खेतों में हल चलाते हैं, मैं कैनवस पर। दुनिया कभी उसे ठीक से समझ नहीं पाई। जब वह पागलखाने में था तब फ्रांस की एक पत्रिका में जी अल्बर्ट ऑरेयर ने उसके चित्राों के बारे में लिखा-÷विन्सेन्ट वॉन गॉग हॉल्स की परंपरा का कलाकार है, उसका यथार्थवाद अपने स्वस्थ डच पूर्वजों के कार्य से कहीं आगे के सत्य को उद्घाटित करता है। उसके चित्राों की विशेषता है आकृति का सचेत अध्ययन, प्रत्येक वस्तु के मूल तत्त्व की खोज और प्रकृति और सत्य के प्रति उसका बाल सुलभ प्रेम। क्या यह सच्चा कलाकार और महान आत्मा दोबारा से जनता द्वारा स्वीकार किए जाने के अनुभव को पा सकेगा? मैं नहीं समझता। वह काफी साधारण है और साथ ही हमारे समकालीन बुर्जुआ समाज के समझने के लिए काफी जटिल भी, उसे उसके साथी कलाकारों के अलावा कभी भी कोई नहीं समझ पाएगा।
अंत में विन्सेन्ट को एक होमियोपैथिक डाक्टर गैशे मिले जो दिमागी बीमारियों के ही नहीं, चित्राकारों के भी विशेषज्ञ थे। विन्सेन्ट ने उनके अनगिनत चित्रा बनाये जो दुनिया की सबसे महंगी तस्वीरों में शुमार हुए।विन्सेन्ट के अंतिम दिनों के हालात देख मुक्तिबोध, निराला के अंतिम दिन याद आते हैं। दरअसल ये वो कलाकार हैं जो गालिब की तरह दुनिया की हकीकत समझते हैं पर उससे दिल बहलाने की जगह उस हकीकत का पर्दाफाश करना चाहते हैं। और पागल घोषित कर दिये जाते हैं क्यों कि दुनिया के बाकी तमाशाईयों की तरह ये अपने पीछे कोई कुनबा, गिरोह या अनुयायियों की फौज खड़ी कर अपने इलहाम को निर्वाण घोषित करने की बेहयाई नहीं कर पाते। उससे बेहतर वे अपने दर्द और अकेलेपन में डूब मरना मानते हैं। आखिर उनके मत को भी दुनिया समझती है और किसी भी मत के माननेवालों से ज्यादा बड़ी तादात होती है उनकी, पर वह एक घेरा नहीं बनाती, उसका लाभ उठाने को, क्योंकि स्वतंत्राता के विचार का सम्मान करना वे उससे सीख चुके होते हैं।
दोनों भाईयों को लेने डाक्टर गैशे खुद स्टेशन पहुंचे थे। भाई थियो ने अकेले में जब आशंका जाहिर की। विन्सेन्ट की दिमागी हालत की बाबत तो गैशे ने समझाया-÷हां, वो सनकी है...सारे कलाकार सनकी होते हैं...किसने कहा था, ÷कि हर आत्मा के भीतर थोड़ा-बहुत पागलपन मिला होता है। शायद एरिस्टोटल ने।' एक दिन गैशे उसके बनाए सूरजमुखी को देखते हुए बोला-÷अगर मैं ऐसा एक भी चित्रा बना पाता तो मैं समझता कि मैंने अपने जीवन के साथ न्याय किया है, विन्सेन्ट! मैंने पूरी जिन्दगी लोगों के दर्द का इलाज करने में काटी...वे सब अंत में मर गए...क्या फर्क पड़ा इस सबसे? ये सूरजमुखी तुम्हारे, ये लोगों के दिलों का इलाज करेंगे...ये लोगों के पास खुशियां लाएंगे...सदियों तक...।' एक दिन विन्सेन्ट ने डाक्टर गैशे से बातचीत के दौरान पूछा कि आखिर मिर्गी के उन मरीजों का क्या होता है डाक्टर, जिनका दौरा आना नहीं रुकता। गैशे ने कहा कि वे पूरी तरह पागल हो जाते हैं। यह बात विन्सेन्ट के दिमाग में घर कर गई और उसने सोचा कि वह एक पागल की मौत नहीं मरेगा।एक दिन उसने मकई के खेत में काम करते हुए कौओं का चित्रा बनाया और शीर्षक दिया ÷क्रोज अबव ए कार्नफिल्ड'। फिर इसी तरह एक दिन खेतों में खडे+ सूर्य को निहारते हुए उसने अपनी कनपटी पर गोली मार ली। घायल अवस्था में वह एक दिन जिन्दा रहा। गोली उसके मस्तिष्क में फंसी रही। उस दौरान थियो उसे बता रहा था कि वह अपनी पहली प्रर्दशनी विन्सेन्ट के चित्राों की लगाएगा। पर उसे देखने के लिए विन्सेन्ट जिन्दा नहीं रहा। उसकी मृत्यु के छह माह बाद थियो भी मर गया। गालिब की तरह ख्यालों से मन बहलाने का शौक नहीं था विन्सेन्ट को, उसके पास मन बहलाने का एक ही तरीका था काम करना और करते जाना। श्रम की इस निरंतरता ने उसकी कला को अनंत बना दिया, उसकी मृत्यु अनंत हो गई।(इरविंग स्टोन लिखित उपन्यास लस्ट फॉर लाइफ महान चित्राकार विन्सेन्ट वॉन गॉग के जीवन पर आधारित एक महत्त्वपूर्ण कृति है जिसका अनुवाद अशोक पांडे ने किया है। संवाद प्रकाशन, मेरठ से आई इस किताब को पढ़ना वॉन गॉग के जीवन से गुजरने के समान है।)

बुधवार, 5 दिसंबर 2018

स्त्रियां पिकासो की - कुमार मुकुल

सिद्ध मनोविज्ञानी कार्ल युंग ने अपने एक लेख में पिकासो और उसकी कला को स्क्जिोफ्रेनिक कहा था। पिकासो के जीवन में और उसके चित्रों में आई दर्जन भर से ज्यादा स्त्रियों के साथ उसके व्यवहार को अगर देखा जाए तो युंग की बात सही लगती है। पर कलाकार यही तो करता है कि अपनी कमियों को एक चेहरा दे देता है जिससे वह खुद उसे पहचान पाता है उससे लड़ता है और इस तरह खुद को बचा लेता है। शायद पिकासो ने भी ऐसा ही किया।
उसके जीवन में छह घोषित प्रेमिकाएं थीं जिनमें से दो से उसने विवाह किया था। उसके लंबे जीवन में अक्सर एक साथ दो या तीन प्रेमिकाएं रहती थीं। यहां तक कि वह उनके आने जाने के लिए कई दरवाजे रखता था और किसे किस दरवाजे से आना है यह भी तय करता था। इसके लिए एक मित्र को वह हमेशा मुस्तैद रखता था।
उसके जीवन में आने वाली स्त्रियों में फ्रांसुआज, ओलिविए, ओल्गा, मारी तेरेज, डोरा मार, जैकलिन प्रमुख थीं। बेल फर्नांद, मादलेन, स्टाइन, नुश, इव्वा, युजेनिया आदि उसकी अन्य सहचरियां थीं। यह सब असामान्य नहीं था। नब्बे साल का लंबा जीवन जिया था पिकासो ने। और वह चित्रों के लिए मॉडलों का प्रयोग नहीं करता था। जीवन में आई स्त्रियों को ही वह मॉडल के रूप में प्रयोग करता था, या यूं कहें कि मॉडल के रूप में आई स्त्रियों के साथ वह टिककर रहने लगता था। चाहे वह वेश्या हो या किसी की पत्नी या उसके नाम से प्रभावित हो उसे देखने को उसके आस-पास मंडरती लड़कियां।
कुल मिलाकर अपनी प्रेमिकाओं के साथ उसका व्यवहार न्यायसंगत नहीं था। वह उनसे प्रेम नहीं करता था। और किसी स्त्री द्वारा छोड़ जाना उसे बर्दाशत नहीं होता था उसे वह किसी भी तरह अपने से बांèो रखना चाहता था। चित्रों में भी वह अधिकांश तौर पर उन्हें विकृत तौर पर चित्रित करता था। यूं कई सहज, सुंदर चित्र भी बनाए उसने। फर्ंनाद पिकासो की पहली जीवन सहचरी थी। वह पिकासो के जीवन का दरिद्रता का दौर था। सबमें उसने उसका साथ दिया। माधुरी पुरंदरे लिखती हैं - पाब्लो बड़ा शक्की था। कला और स्त्री दोनों के बारे में उसकी जिद विजेता होने की थी। मेरी स्त्री मुझे छोड़कर चली न जाए यह डर उसे हमेशा छेदता रहता था। फर्नांद को तो वह अकेले घर से बाहर नहीं ही जाने देता था, बाहर जाते समय उसको कमरे में तालाबंद कर जाता था। ये और ऐसी तमाम हरकतों के मूल में पिकासो के युवा काल की एक घटना के उसके मन पर पडे़ प्रभाव को देखा जा सकता है। वह थी उसके एक मित्रा काजागमास द्वारा प्यार में की गयी आत्महत्या। काजागमास ने नोंकझोंक में अपनी प्रेमिका जर्मेन पर गोली चला दी थी और उसे मरा समझ कर खुद को गोली मार लिया था। इसका उस पर गहरा असर पड़ा। उसने इसे कला में ढाल दिया। उससे संबंधित कई चित्र बनाये उसने। और जैसे खुद को चेतावनी दी कि इस तरह की मौत नहीं मरनी। फिर पिकासो की पहली प्रेमिका फनाद उसे छोड़कर किसी दूसरे चित्रकार के साथ घर छोड़कर चली गयी थी। इस तरह उसका शक्की व्यवहार और फिर उससे पैदा हुई इस तरह की परिणतियों ने उसे स्त्री के मामले में कठोर बना दिया। पिकासो नियमित वेश्याघरों को जाता था और वहां के जीवन का भी उस पर असर पड़ा। वहां उसने मात्र शारीरिक प्रेम को पाया और पैसे के व्यापार को। वह सोचता कि निष्कलुष प्रेम कैसे टिक सकता है। फिर चौदह साल की उम्र में ही जिस तरह उसने काम भावना प्रधान जीवन आरंभ किया था वह अंत तक चलता रहा। इस तरह प्रेम हमेशा उसे एक विभ्रम में डालता था। वह उसका उपयोग कला में खुद को निखारने में करता था। उसकी सृजन शक्ति का आधार वही था पर अपने इस आधार पर ही वह बराबर चोट करता था। उसके जीवन में आई हर स्त्राी ने उसकी कला को एक नया मुकाम दिया और सबातेज के हिसाब से उसके कला के हर कालखंड से जुड़ी स्त्रियों का नाम उसके काम के साथ जोड़ा जाना चाहिए। विध्‍वंस और सृजन जैसे एक साथ उसकी कला में चलते रहते थे। जिनसे वह प्रेम करता उन्हें ही रूलाता और फिर उस रुदन को भी चित्रिात करता। पिकासो के अनुसार चित्रकला विध्‍वंस का कुलजमा योग होती है। एक मनमौजीपन पिकासो में हमेशा रहा। मनोवैज्ञानिक मेडेल के अनुसार उसमें अमानवीय सा कुछ नहीं है उसने स्वध्‍याय तो काफी किया पर दिशाहीन। यह दिशाहीनता हमेशा उसके बात-व्यवहार में देखी जा सकती है। वह हमेशा अपने साथ एक रिवाल्वर रखता था। और आरंभ के दिनों में रात में जब तब फायर कर लोगों को चौंकाता था।
उसके जीवन में आयी स्त्रियों का पता लोगों को उसके चित्रों से लगता था। फिर उसकी नायिका उसके जीवन में अवतरित होती थी। जैसे ही किसी नयी नायिका का प्रवेश होता पुरानी उसके कैनवस से गायब होने लगती और जीवन से भी वह किनारे कर दी जाती। पिकासो की बनायी अिधकांश नंगी स्त्रियां कुरूप और राक्षसी-सी हैं। कभी उसने स्टाइन को कहा भी था कि प्रत्येक कला कुरूपता की घुट्टी पीकर ही जन्मती है। पिकासो की मित्र स्टाइन पता लगा पाती कि उसके कैनवस की नयी नायिका कौन है तब तक इव्वा का उसके जीवन में पदार्पण हो चुका था। इव्वा के साथ उसका जीवन सुंदर और सामान्य रहा। उसके आने से पिकासो बहुत खुश हुआ उसने रहने की जगह बदली और प्रेम से इव्वा के साथ रहने लगा। हर महत्‍वपूर्ण घटना के बाद पिकासो रहने की जगह बदल लेता था। बाद में इव्वा बीमारी से मर गई और पिकासो बहुत दुखी हुआ।विकृत व्यवहार के बाद भी स्त्रियां और सफलताएं हमेशा उसके साथ रहीं। हालांकि सफलता को वह खतरनाक मानता था पर अपनी अनदेखी उससे कभी बर्दास्त नहीं हुई। इव्वा के बाद उसके कैनवास पर आने वाली स्त्री थी युजेनिया। युजेनिया पिकासो की पुरानी मित्र स्टाइन को पिकासो से दूर करने में सफल हुई। इस दौरान पाकरेत और इरेन भी पिकासो की छाया के पीछे मडराती रहीं। पर अब पिकासो के जीवन में पहली ऐसी नायिका का प्रवेश होने वाला था जिसे उसकी पहली पत्नी का दर्जा मिलना था। वह थी ओल्गा। वह एक रूसी वैले में नर्तकी थी। वैले के लिए काम करते उससे प्रगाढ़ता हुई थी पिकासो की। पर इस बार उसके मित्र दियाघिलेव ने उसे चेतावनी दे दी थी कि रूसी लड़की के साथ विवाह करना पड़ता है। ओल्गा से उसने विवाह किया और फरवरी 1921 में उसे एक पुत्रा हुआ पावलो। अब मातृत्व उसके चित्र का विषय हो चुका था। पिकासो का कहना था कि जैसे लोग आत्मकथा लिखते हैं वैसे ही मैं चित्र बनाता हूं।बाद में ओल्गा के साथ पाब्लो का जीवन कष्टकर होता गया। अब उसके चित्रों में पहले सुंदरता का पर्याय बनी ओल्गा अब विकृत चेहरों के साथ आने लगी। एक कवि ब्रतों ने उसके बारे में कहा भी था - कि किसी चित्रकार ने स्त्री से इतना प्रेम नहीं किया होगा और उसकी इतनी अवहेलना भी नहीं की होगी। पाल एलुआर के अनुसार - वह असामान्य उत्कट प्रेम करता है और जिस बात से प्रेम करता है, उसी की हत्या भी कर देता है। पिकासो का खुद के बारे में कथन भी था - मेरे कहने पर यकीन मत करते जाना।मजेदार बात यह है कि पिकासो की मां की राय भी पिकासो के बारे में कुछ अच्छी नहीं थी। जब ओल्गा से उसका विवाह होने वाला था तो पिकासो की मां ने ओल्गा से कहा था कि - मेरे बेटे के साथ कोई भी स्त्री सुखी हो सकती है इस पर मुझे यकीन नहीं। वह सिर्फ अपने लिए है दूसरे के लिए नहीं।Þ
पिकासो से प्रेम करने वाली अिधकांश स्त्रियां धनी, अभिजात घराने से थीं वे उसे बहुत कुछ देने को तत्पर रहती थीं पर पिकासो केवल उस स्त्री को चुनता था। जब ओल्गा के साथ पिकासो की कलह होने लगी तो उसने मारी तेरेज को ढूंढ़ निकाला। मारी उसे बाजार में मिली थी और पिकासो को जंच गई थी उसने सीधे उसके कंधे पर हाथ रख कहा - तुम्हारा चेहरा खूबसूरत है, मुझे तुम्हारा चित्र बनाना अच्छा लगेगा। फिर छह महीने तक पिकासो उसके पीछे पड़ा रहा और अंत में मारी उसकी हो गई। पिकासो ने ओल्गा को तलाक देना चाहा पर वह तैयार नहीं हुई। उससे छिपाकर पिकासो मारी के साथ रहता रहा। मारी के साथ वह सबसे ज्यादा रहा पर ज्यादातर छिपा कर। जब पिकासो ने मारी के सामने उसका चित्र बनाने का प्रस्ताव सड़क पर पहली बार रखा था तब भी वह पिकासो के बारे में कुछ नहीं जानती थी, बाद में भी मारी ने उसके चित्रों के बारे में कहा - मुझे पिकासो के चित्रों में कुछ खास मालूम नहीं पड़ता। 1935 में मारी से पिकासो को एक पुत्र हुआ जिसका नाम पिकासो ने माया रखा। मारी ओल्गा से तलाक का इंतजार करती रही पर अंत तक वह नहीं हुआ।
मारी के बाद पिकासो के जीवन में फ्रांसुआज जिले का प्रवेश हुआ । उसकी प्रेमिकाओं में मात्र उसी ने पिकासो के खिलाफ आगे मोर्चा खोला और अंत तक लड़ती रही। जिले ने आहत हो उसके बारे में लिखा था - जिस प्रकार शिकारी अपने शिकार का सिर दीवानखाने में टांग देता है, वैसे ही पिकासो अपनी स्त्रिायों के सिर रख देता है। हां वे धड़ से पूरी तरह अलग नहीं हो पाते। उनमें थोड़ी जान देने का इंतजाम वह कर देता है।यूं अपने चित्रों में वह स्त्राी के खिलाफ होने वाले अत्याचारों पर भी जमकर कूची चलाता। 1933 के बाद उसके चित्राों में स्त्रियों पर जुल्म ढाते राक्षसी चाल चलने वाले सैनिक दिखाई पड़ने लगे। इस संदर्भ में पिकासो के कथन को ही देखा जाना चाहिए, वह कहता था - ßचित्राकला मुझसे शक्तिशाली है, वह जो चाहती है मुझसे करा लेती है। मैं कुछ बोलता नहीं पूरा, रंग देता हूं। मैं उस स्थिति तक पहुंचना चाहता हूं जहां कोई यह जानने का प्रयास नहीं करेगा कि मैंने अपना चित्र कैसे बनाया। इसकी क्या जरूरत है। मैं चाहता हूं कि अपने चित्रों को भावनाओं से मुक्त कर सकूं।Þ साफ है कि वह अपनी रचना प्रक्रिया को बाहर लाने से सप्रयास बचता था। इसके लिए ही वह परस्पर विरोधाभासी बयानेां का सहारा लेता था।पिकासो बहुआयामी प्रतिभा का था । चित्र बनाने के अलावे कविता, नाटक आदि भी लिखता। इससे उसकी मित्र स्टाइन नाराज होती कि वह उसके क्षेत्र में दखल दे रहा है। इस पर चिढ़ कर पिकासो कहता - ßतुम हमेशा मेरे बारे में कहती हो कि मैं एक असामान्य व्यक्ति हूं। फिर असामान्य मनुष्य जो चाहता है, वह कर सकता है।Þ इस पर स्टाइन चीखती - ßतुम असामान्य हो यही तुम्हारी सीमा है मुझसे यह मत कहलवाना कि वह काव्य हैÞ
यूं पिकासो का विश्वास कलाओं के परस्पर सामंजस्य में था। वह सोचता कि चित्र लिखा जाए और कविता उकेरी जाए। पिकासो की कविता के बारे में ब्रेतों ने कहा था - ßयह उतनी ही दृश्यात्मक है, जितना काव्यात्मक उसका चित्र।Þ आगे उन कविताओं ने उसे महान कवि पाल एलुआर का चित्र बनाया।
मारी तेरेज के बाद पिकासो के जीवन में आने वाली स्त्राी थी डोरा मार। वह मारी के विपरीत पिकासो की आंखों में आंखें डाल बाते कर पाती थी। डोरा पिकासो को एक कैफे में मिली थी और पहली ही मुलाकात में टेबल पर पडे़ चाकुओं को फेंकने का खेल करते अपने हाथों से खून निकाल लिया था उसने। और यह लाल रंग पिकासो की आंखों में बैठा तो फिर वह डोरा का हो गया। डोरा वामपंथी विचारों की थी और वामपंथी विचारों के कवि एलुवार की मित्र भी थी। डोरा और एलुआर के प्रभाव में ही पिकासो का खिंचाव वाम धारा की ओर हुआ था और बाद में लंबे समय तक पिकासो वामपंथी दल का सदस्य रहा था।
अपनी प्रेमिकाओं को उल्लू बनाने के उसके अपने नुस्खे थे। जैसे अपने प्रसिद्ध चित्र गुएिर्नका को दिखाते उसने मारी तेरेज को कहा कि चलो यह चित्र तेरा है। अगले ही क्षण ऐसे तात्कालिक बयानों से वह पलट जाता। यहां तक कि ओल्गा से वह तलाक इसलिए नहीं चाहता था कि इसके चलते उसे अपने चित्रों का भी बंटवारा करना पड़ेगा। पेरिस में लंबा समय बिताने वाला पिकासो स्पेन का था और स्त्रियों के प्रति उसके व्यवहार को लोग स्पेन के पारंपरिक स्त्री विरोधी आचरण से जोड़ कर देखते थे। उसकी ख्याति से खिंची औरतें उसकी ओर भागती चली आतीं और वह उन्हें अपने चारों ओर घुमाता रहता। इस तरह साठ साल की उम्र में पिकासो बीस साल के जोश से काम करता ओर वैसी ही बुभुक्षा को कायम किए रहता। उसकी प्रसिद्धी ऐसी थी कि लोग पेरिस में एफिल टावर के साथ पिकासो को देखने आते। पिकासो के चित्रों में स्त्रिायां अिधकतर बंद कमरों में दिखती हैं, भयानक पागलों जैसी कैदी स्त्रियां। यहां याद कीजिए पिकासो की पहली प्रेमिका से उसका व्यवहार, जिसे वह घर में ताला बंद कर बाहर जाता था। अथाह पैसा होने के बाद भी पिकासो कंजूस था। आने वाली लड़कियों के चित्र बना कर वह उन्हें दे देता। एक बार एक लड़की की नग्न तस्वीर बना उसने उसे भेंट किया। अब लड़की उस चित्र का क्या करती। उसे उसकी कीमत पता थी सो उसने उसे छुपा कर रख दिया। उसकी शादी हुई फिर तलाक हुआ तब उसने उस चित्र को बेचना चाहा तो उस पर पिकासो के हस्ताक्षर नहीं थे उसने पिकासो से उस पर हस्ताक्षर कराने चाहे तो उसने उसे अपना चित्र मानने से इनकार कर दिया।इधर उसकी उपेक्षा से डोरामार भी मानसिक तौर पर अवसाद ग्रस्त रहने लगी। उम्र के छियासठवें साल में पिकासो को फ्रांसुआज से एक पुत्र की प्राप्ति हुई। उसकी कनूनी पत्नी ओल्गा अब भी हर जगह उसका पीछा कर रही थी। फ्रंसुआज उससे चालीस साल छोटी थी। पिकासो की अगली स्त्री जैकलीन थी जो तलाकशुदा थी। वह फ्रांसुआज से कुछ छोटी ही थी। ओल्गा के अलावे जिस स्त्री की शांत, सौम्य तस्वीरें पिकासो ने बनाई है उनमें जैकलीन भी है। आगे उपेक्षा से त्रास्त फ्रांसुआज ने एक किताब लिखी - लाइफ विद पिकासो। यह वेस्टसेलर रही। इसमें पिकासो की पोलपट्टी खोलकर रख दी गयी थी। पिकासो ने इस पर केस भी किया पर पर मुकदमा हार गया। इसके बाद पिकासो ने फ्रांसुआज की संतानों के लिए अपने घर के दरवाजे बंद कर दिए।
उम्र के नब्बेवें साल में पिकासो ने फिर बहुत से चित्र बनाए स्त्रियों के जिसमें उसकी काम कुंठा उभर कर सामने आई। जैकलीन ने इन चित्रों को बाहर दिखाने से मना कर दिया था सो वे बंद रहे। अब जाकर वह मौत के बारे में सोचने लगा था हर दिन वह सोचता कि चलो एक दिन और मिल गया। आखिर आठ अप्रैल 1973 को पिकासो की मौत हो गयी। उसकी कब्र पर उसी का बनाया एक शिल्प लगाया गया। उसकी मृत्यु पर बहुत से अखबारों ने उसे एक क्रूर ,भावनाशून्य, कामांध व्यक्ति के रूप में याद किया। दिसंबर 1973 में उसकी 1909 की एक कृति द सीटिंग वूमन ने मूल्य के सारे रिकार्ड तोड़ दिए। मूल्य के सारे रिकार्ड पिकासो के प्रिय चित्रकार वॉन गॉग ने भी तोडे़ थे पर जीते जी नहीं, और उसके प्रतिमान पिकासो के उलट थे।
पुस्तक : पिकासो,
लेखिका : माधुरी पुरंदरे

सिद्धार्थ जोशी ने कहा… धन्‍यवाद, शायद इतना कहना पर्याप्‍त होता... मैंने पहली बार आपका ब्‍लॉग देखा है। इसमें मुझे प्रभावित किया। इसे मैं अपने फेवरेट में डाल रहा हूं। यकीन मानिए आपका हर लेख में नियमित रूप से पढूंगा। यह ब्‍लॉगिंग का एक अलग आयाम है। आपकी मेहनत और प्रस्‍तुतिकरण श्रेष्‍ठ है।

रविवार, 25 नवंबर 2018

कथा - लगभग खुशी

4 फरवरी 2016
क्या आज का मेरा दिन खुशी में बीता है?

दुकानदार से छुटटा पैसों की जगह माचिस की बजाए मिले तीन चॉकलेट मुंह में डालते हुए मैंने सोचा कि लगभग खुशी ही है यह। लगभग जयहिंद की तर्ज पर। हालांकि काफी बाइट से दिखते चॉकलेट का स्वाद वैसा नहीं था जैसा होना चाहिए था। अगर पसंद आता तो मैं तीनों खा जा सकता था बावजूद इसके के पिता को 48 के आसपास डायबिटीज हुई थी। पर मैं तो ठीक-ठाक 50 के पार पहुंच गया हूं।

हां हुजूर, बिल्कुल ठीक-ठाक। 25 वाले लड़के पंजा लडाकर देख सकते हैं। हालांकि जब से इस शहर में नई नौकरी ज्वाइन की है चीनी की जगह गुड़ की चाय पी रहा और अब तो शायद चीनी वाली पसंद ही ना आए।

उस शाम कुछ कुछ परेशान और उदास रहने वाली लड़की ने कैसे बिखरे पड़े कमरे में जाते हुए मुझसे बैठने को कहते रसोई की तरफ मुड़ कर पूछा था - क्या पिएंगे आप, चाय या रम।
मैंने कहा- चाय।
उसने कहा - ठीक है, नींबू की चाय पिलाती हूं। मां ऐसे ही बनाती थी।
सोचते हुए कि भला कैसी लगेगी नीबू गुड की चाय मैंने कहा- ठीक है।

... मुझे रास्ता देने को कहने की बजाय चौकी पर पांव देकर बच्चों की तरह उछलकर खुद दूसरी तरफ चली गई थी वह।
अपेक्षाकृत उसके भारी शरीर को देखते हुए उसका इस तरह कूद कर जाना विस्‍मय पैदा करने वाला था।
कितनी खुश थी वह।
उसके बार बार के तकाजे के बावजूद मैं कभी उसके घर जा नहीं पाया था जबकि वह कई बार मेरे पुराने घर पर आ चुकी थी।

आने पर वह घंटो तरह तरह के सवाल करती, फिर कुछ किताबें- पत्रिका लेकर चली जाती।

आधी रात को कभी कभी नशे में वह कहती, आई लव यू तरुण जी। कभी उसे संभालने के लिहाज से मैं भी कह देता- लव यू टू।
इस पर वह हंसते हुए कहती- मैंने आपसे भी कहलवा दिया ना, लव यू ।

पर होश में कभी उसने ऐसा कुछ नहीं कहा सुना जिससे कोई समस्या पैदा हो। करियर की दौड और अपने अस्तित्‍व को बचाए रखने की जददोजहद में जाने कितनी लडकियां कितने कितने समय तक अकेलेपन की विडंबना से कैसे कैसे जूझती रहती हैं।

लगभग अकेला जीवन जीने वालों के लिए खुशी भी हमेशा लगभग ही होती है। 
इस हिसाब से आज का दिन रोजाना की तरह खाली नहीं था। सुबह हमेशा की तरह मोबाइल की वेकअप ट्यून को बंद करने के साथ हुई थी। फिर बिछावन पर उलट सुलट होते 9:00 बज गए थे।

... हर दूसरे दिन किए जाने वाले दो काम एक साथ हो गए थे। दाढ़ी बनाने के साथ नहाना है। जाड़े के नाम पर किसी को टाला नहीं जा सकता था। दूध का बर्तन आग पर चढ़ाकर ब्रश लेकर कुल्ला करने गया। बाथरुम में कोई था तो पेशाब दबाकर मुंह धो लिया। फिर चाय का पानी चढ़ा बाथरूम गया। फिर सोचने लगा कि आज की चाय में क्या डालना है। गुड़ के अलावे इलायची, लौंग, दालचीनी, तेजपत्ता।
अंत में लौंग डाल दिया, बेलना-चौकी से कुचलकर।

चाय में दूध अलग से मिलाना था। साले, रहता है शेयर वाले बाथरूम युक्त कमरे में और आदतें फाइव स्टार वाली। डॉक्टर साहब और कविवर की संगत का नतीजा है। कविवर तो बाकी कवियों की तरह दूध भी नहीं लेते थे।
अखबार पढ़ते चाय पी झटपट तैयार हो बाहर निकला तो गली में मिलने वाले सिक्‍कड से बंधे कुत्ते को देख सोचा कि रास्ता बदल दूं, फिर चल पड़ा आंखें बचा कर। चुपचाप निकल गया। वह भूंका नहीं। राहत मिली। लगता है अब पहचान गया है, शुरू में तो महीनों आते जाते यह कभी नहीं भूंका पर एक दिन अचानक निगाह मिली तो भौंकते हुए झपट पड़ा। पर बंधा था चेन से सो मैं बच निकला।

आगे कुछ दिन को मैंने रास्ता बदल दिया था, क्या पता भारी-भरकम सा लगता है, पतली सी चेन का क्या भरोसा। पता नहीं कुछ कुत्ते ससुरे नजर मिलने पर भौंकने क्यों लगते हैं। हैदराबाद में भी सड़क का एक सीधा-साधा सा कुत्‍ता नजर मिलने पर इसी तरह भौंकने लगा था।

ऑफिस से लौटते महानगर की मुख्य सड़क पर रहने वाले परिवारों के दो नन्हे बच्चे किस तरह हाथ फैलाए पीछे दौड़ पड़े थे। कितने खुश थे वह।
पर मेरी लगभग खुशी के लिए संकट की तरह आए थे वह। तेज चलता हुआ मैं उनसे आगे निकल गया था।
आगे बढ़ता सोच रहा था कि उनकी तस्वीर Facebook पर जमकर लाइक बटोर सकती है।
हमारी सेल्फी टाइप आकांक्षाओं ने जुकेरबर्ग को कितना बड़ा दानी बना दिया है। सोशल मीडिया के नाम पर एनटायर Facebook लोली।
अपनी लगभग खुशी की पूंछ बचाता मैं वहां से निकला तो याद करने लगा कि आज दूध के अलावा और क्या-क्या लेना है।
मूंगफली, खजूर... एक जरूरी चीज और थी, जो याद नहीं आ रही थी।
सोचा, पास वाला दुकानदार बहुत ठगता है।
कैसे उसने 70 रूपये चने की दाल 140 में दी थी।
अगले दिन बहुत जिरह करने पर ₹10 लौटाते बोला - हमने 120 की खरीदी है। जबकि 70 की दाल अगली गली से उसे दिखाने को खरीद लाया था मैं।...


शुक्रवार, 23 नवंबर 2018

दम तोड़ती जातिवादी राजनीति - कुमार मुकुल

करीब बीस साल पहले लिखा गया आलेख


जाति और धर्म के काठ की हांड़ी राजनीति के चूल्हे पर एक-एक बार चढ़ चुकी है और अब अपने स्वाभाविक विकृत अंत की ओर बढ़ रही है। बिहार और उत्तर प्रदेश के राजनीतिक घटनाक्रमों को देख कर आप इसे अच्छी तरह समझ सकते हैं। तिलक, तराजू व तलवार को चार जूते मारने का नारा देने वाली बसपा अब ब्राह्मण सम्मेलन करा रही है। मुलायम की म्यान में ठाकुरों की तलवार है ही। बिहार में देखें तो सबसे बड़ी जाति यादवों के नुमाइंदे लालू प्रसाद की कुर्सी कब की जा चुकी। नेताओं का जनाधार खंडित हो चुका है।
अलबत्ता मीडिया ने पिछले दशकों में जातीय आधार वाले नेताओं को जनाधार वाले नेता के रूप में प्रचारित किया और सही जनाधार वाले नेताओं को असफल राजनेता बताया। पर जनाधार वाले इन नेताओं की हालत हर जगह आज क्या है, वह सामने है।
लालू प्रसाद की भी जनाधार की हेकड़ी जा नहीं रही थी, जबकि सच्चाई यही है कि संकुचित जातीय आधार ने उन्हें काफी आगे नहीं बढने दिया। हार के कारणों का विश्लेषण करते हुए लालू प्रसाद ने कहा
​ भी था कि चुनाव हम अपनी गलतियों से हारे हैं, अपने लोगों ने ही हराने का काम किया है।
पर सवाल है कि हार का कारण पता चल जाने पर भी लालू फिर से अपना जातिगत आधार कहां वापिस ला पाए। जिस जातिवादी ढांचे को उन्होंने अपना जनाधार समझ रखा था, उसकी हकीकत का अंदाजा उन्हें लग चुका है। पर क्या वे आगे इससे अलग कुछ कर पाये?

दरअसल, जिस जातिवादी राजनीति को इन अकर्मण्य नेताओं ने राजमुकुट समझ रखा था, जल्दी ही उसकी हकीकत सामने आ गयी। अगर
​ भा​
जपा धर्म की बैशाखी की राजनीति नहीं करती तो जातिवादी राजनीति और पहले जमीन पर आ जाती। सच्चाई यही है कि राजनीति ने, जैसा कि सहज था, बड़ी तेजी से जाति को नष्ट किया है। राजनीति की अपनी जाति है। उसके अपने तौर-तरीके हैं। यादि कीजिये कि लालू प्रसाद जब राजनीति में आये थे, तब चर्चा उसके भाई महावीर राय की होती थी, जिन्होंने चपरासी क्वार्टर से लालू को पढ़ाकर इस लायक बनाया था, जहां वे उस समय थे। पर आगे लालू ने राजनीति में किसे आगे बढ़ाया। अपने सालों को, ऐसा क्यों हुआ? क्योंकि किसी का भाई उसके साले की तरह मक्खनबाजी नहीं कर सकता, और राजनीति में मक्खनबाजी अहम होती है, जाति या गोतियारी नहीं।
जाति बस आपको राजनीति की सीढ़ी तक पहुंचा सकती है। फिर आप राजनीति के घर में जा सकते हैं, जाति को छूटते जाना है, क्योंकि जाति के घर में आपकी मुरगी दाल बराबर रहेगी और राजनीति पर देशहित - जनहित का मुलम्मा चढ़ा होता है। झूठा ही सही आपको एक सार्वजनिक चेहरा बनाना होता है। लालू ने कई बार ऐसी कोशिशें कीं, पर घरेलू माया-मोह उनसे छूटा नहीं। नतीजा, उनके तमाम गंभीर कदम मसखरेपन में तब्दील होते चले गये। वह चरवाहा विद्यालय का मामला हो या मिट्टी के चुक्कड़ों (कुल्हड़ों) को प्लेटफार्म पर पुन: बहाल करने का मामला। जब मामला अपने साले-बहनोई भाई को टिकट देने-दिलाने तक जाता हो तो भला ऐसे नारे कहां तक आपकी जन छवि बना पायेंगे।
जाति और राजनीति के हिसाब-किताब को देखें तो यह साफ हो जाता है कि पिछला दलित-पिछड़ों का उभार कोई लालू-नीतीश जैसे नेताओं का करिश्मा नहीं था, बल्कि वह जाति और राजनीति के रिश्तों की सहज उपज था। इन नेताओं ने उसी उभार की फसल काटी । जैसे जाति में पैदा होने के लिए कुछ करना नहीं होता है। वैसे ही जाति की राजनीति के लिए कोई योग्यता नहीं होती, बस अपनी जाति को जनाधार मान झंडा उठा लेने की जरूरत होती है।
आजादी पूर्व की जनसंख्या रपटों को देखें तो बिहार की जातिवादी राजनीति की पोल खुल जाती है। इस सदी के आरंभ में शिक्षा का प्रतिशत सर्वाधिक कायस्थों में था फिर ब्राह्मण, राजपूत, अहीर और अंत में दलित थे। राजनीति में जातियों को उनके शैक्षिक आधार पर जगह मिली है, संख्या बल पर नहीं। मजेदार तथ्य यह है कि जितनी बड़ी जाति होगी, उसका राजनीतिक कार्यकाल उतना ही छोटा होगा, क्योंकि राजनीतिक पदों की बंदरबांट और अन्य जातियों की संतुष्टि के लिए जरूरी पदों पर लोगों को लाने के काम में बड़ी जाति (संख्या में) एक बड़ी बाधा की तरह होती है।
इसीलिए बिहार में ही नहीं, देश भर में कायस्थों का राजनीति पर सबसे ज्यादा समय तक कब्जा रहा। क्योंकि वे सबसे ज्यादा शिक्षित थे और उनकी संख्या सबसे कम थी। इसलिए आपसी महत्वाकांक्षा की लड़ाई कम थी। जाति के ही दबाव में नेहरू की इच्छा के विरुद्ध राजेन्द्र प्रसाद को दूसरी बार राष्टÑपति चुना गया। कायस्थ चूंकि आजादी के पहले से राजनीति पर काबिज थे, इसलिए आजादी के बाद दशकों तक उनका दबदबा रहा। फिर ब्राह्मण-भूमिहार बिहार और देश की राजनीति पर काबिज रहे। फिर राजपूतों का छोटा सा काल आया, अंत में राजनीति पिछड़ों, फिर दलितों के कब्जे में आयी। पर संख्या की मारामारी ने पिछड़ों-दलित नेताओं को राजनीति के शिखरों पर टिकने नहीं दिया।
लालू प्रसाद की जाति आधारित राजनीति भी पांच वर्ष पूरा करते-करते ढह गयी थी। आप देखेंगे कि यह चर्चा होती है कि लालू प्रसाद थोड़ी अक्ल से काम लेते, थोड़ी ईमानदारी बरती होती, तो आसानी से प्रधानमंत्री बन जाते। पर यहां जाति उनकी सीमा बन जाती है। जाति के समीकरणों से यह देश नहीं चलाया जा सकता। अब आप हैं कि साले-बहनोइयों से ही फुर्सत नहीं। उधर, पूरी जाति सुरसा की तरह मुंह बाये अपने हनुमान को निगलने को व्याकुल होती चली जाती है। नतीजा लालू प्रसाद को हारने के बाद यह एहसास होता है कि जाति-गोतियारी के मनबढुओं की मारामारी ने उनकी सीटें घटा दीं।
पर इसका कोई उपाय भी है क्या? आप बाजा बजाते चलते हैं कि आपने दलित-पिछड़ों को सम्मान से जीने का हक दिलाया, पर छूछा सम्मान लेकर वे कितने दिन तक आपके पीछे चलेंगे। अगर मस्का मार कर ही जनाधार बन जाता है, जातिवादी डंडा चलाकर, तो तमाम छुटभैये भी बाजीगरी पर उतरेंगे ही। क्योंकि आपने जाति का भावनात्मक शोषण करने के सिवा क्या वास्तव में इसके विकास के लिए उन्होंने कुछ किया? चरवाहा विद्यालय जैसी अल्प लागत की शिक्षा परियोजना तक को तो संभाल नहीं सके। राज्य और देश संभालना तो दूर की बात है?
बड़ी जाति को इन नेताओं ने अपने जनाधार के रूप में प्रचारित कराया और खुद आश्वस्त हो गये। यह आश्वस्ति ही राजनीति को सीमित करती है। राजनीति को सतत क्रियाशीलता की जरूरत होती है। जाति और धर्म की रूढ़ियां उसकी क्रियाशीलता को बाधित करती हैं, इसलिए राजनीति इनका उपयोग कर इन्हें दोबारा मौका नहीं देती।
राजनीति के केन्द्र में हमेशा एक लोक लुभावन व्यक्ति आयेगा। पर पूरी जाति उस केन्द्र तक पहुंचने के लिए अपने भीतर संघर्ष करेगी। इसे वीपी सिंह के साथ हुए राजनीतिक उत्थान-पतन को देखकर समझा जा सकता है। देवीलाल, रामविलास पासवान, अजीत सिंह, मुलायम सिंह, लालू, नीतीश- सब एक साथ राजनीति में उठे हुए मोहरे आपस में ही टकरा गये और अकेले व बेकार होते चले गये। ये सब तथाकथित जनाधार वाले नेता थे। सबकी महत्वाकांक्षा प्रधानमंत्री पद की थी। पर वे इस पद के पास भी नहीं फटक सके। क्योंकि ये अपने विशाल जातीय वोट बैंक को लेकर आश्वस्त रहे।

गुरुवार, 22 नवंबर 2018

स्त्री को लेकर प्रबुद्ध समाज का नजरिया

Thursday, 22 March 2012 


लगा
एक पूरी नदी उछल कर मुझे डुबो देगी
पर मुझे डर न था
मारे जाने की सदियों की धमकियों के बीच
मन ठहरा था आज     -  वर्तिका नंदा
स्त्री विमर्श के इस युग में जहां देह की मुक्ति से लेकर उनकी आर्थिक मुक्ति तक की बातें होती रहती हैं और स्त्री काफी हद तक बदली भी है। पर व्यावहारिक स्तर पर आज भी स्त्री को लेकर समाज का नजरिया बदला नहीं है। यहां तक कि तथाकथित शिक्षित और पत्रकार लेखक कहे जाने वाले लोगों में भी चीजें एक भाषिक छल के भीतर अपने पुराने रूप में वर्तमान हैं।
उदाहरण के तौर पर नयी पीढी के एक नवतुरिया पत्रकार ऐसे तो चूतिया शब्द, जिसका पत्रकारिता जगत में बडे पैमाने पर व्यवहार होता है, के प्रयोग पर रोष भरी शब्दावली में आपत्ति व्यक्त करते हैं, पर जब अपने ही एक साथी के स्त्री मित्र को लेकर नकारात्मक राय जाहिर करनी होती है तो वे बेबाकी से कह डालते हैं कि वह तो एकदम पाजी है, औरतों के पीछे कुत्ते की तरह भागता है। यहां देखें कि चूतिया गाली और औरतों के पीछे कुत्ते की तरह भागने में क्या अंतर है।
जैसे ही आप अपनी हाजिरजवाबी में किसी को औरतों के पीछे कुत्ते की तरह भागने वाला कहते हैं तो अपनी नासमझी में स्त्री जमात को भी न केवल कुतिया कह डालते हैं बल्कि उसे बेवकूफ और मूर्ख की सनातनी उपाधि से नवाज डालते हैं। अगर आप स्त्री को विकसित और बराबरी का मानते हैं तो क्या उसमें यह विवेक नहीं कि वह अपने पीछे किसे आने दे रही है, इसे समझ सके।
इसी तरह एक कथाकर महोदय एक बार अपने साथियों को अपनी कहानी का कच्चा ड्राफ्ट सुना रहे थे। वहां एक मित्र सपत्नीक उपस्थित थे। कहानी सांप्रदायिकता के खिलाफ उचित ढंग से मोर्चा खोल रही थी। कहानी पाठ के बाद मित्रों की राय मिल जाने के बाद उन्होंने मित्र की पत्नी से भी राय पूछी, उन्होंने कहानी के इस पहलू पर नाराजगी जताते हुए अपना सांप्रदायिक नजरिया जाहिर किया। 
इस पर मित्र हंसते हुए बस 'क्या भाभी, क्या भाभी' कहते रहे, बजाय उस विषय पर अपना नजरिया मजबूती से रखने के वे वहां किसी भी बहस से बच गए, क्योंकि भाभी जी को नाराज करना उन्हें उचित नहीं लगा, भविष्य के अपने स्वागत का ख्याल आ गया होगा। यही कथाकार महोदय पुरुषों से किसी विषय पर मतभेद होने पर मारपीट पर उतारू हो जाते हैं। दरअसल, उनका यह चरमपंथी रवैया ही उन्हें स्त्रियों के मामलें में दूसरे चरम पर ले जाकर चुप्पी या चापलूसी का हथियार थमा देता है।
आज का पुरुष स्त्री का प्रियपात्र बने रहने के साथ ही सामाजिकता के दबाव से भी बचकर निकल जाना चाहता है, नतीजा न तो वह स्त्री का विश्वास प्राप्त कर पाता है न नया समाज बना पाता है। नयी-नयी अफसरी में आयी एक लडकी का तबादला कुछ दूर हो गया. तब कुछ दिन उसने नयी जगह पर घर लेने की बजाय कुछ दिन अपनी कार से आफिस जाना तय किया। उनके एक सीनियर अधिकारी का भी तबादला उसी जगह उसी जगह हुआ था। 
लड़की ने अधिकारी महोदय को सहज ढंग से कहा कि 'सर आप मेरे ही साथ आफिस चला कीजिए जब तक किराये का कमरा आदि नहीं लेते हैं।' अधिकारी खुशी-खुशी गाड़ी  में बैठ गये. रास्ते भर वे समाज में स्त्री के प्रति गलत नजरिये पर रोशनी भी डालते रहे, फिर जब आफिस नजदीक आया तो बोले - 'ऐसा है, मुझे यहीं उतार दीजिए।' लडकी की समझ में बात नहीं आयी. सोचा कोई काम होगा, पर अधिकारी महोदय वहां से पैदल आफिस आ गये। लौटते में फिर लड़की ने उन्हें रास्ते में साथ बिठा लिया, पर घर आने के कुछ पहले ही वे फिर गाड़ी से उतर गये और पैदल घर गये। लड़की  को बहुत झटका लगा उनके इस व्यवहार से। यह एक आम रवैया है।
समाज को बदलने निकले लोग भी अपनी पत्नियों को कूपमंडूक बना रहने देते हैं, इस डर से कि उनका परिवार न टूटे, कि कल को उनकी अर्धांगिनी उन पर ही उंगली न उठाने लगे। पर एक युवा लडकी के साथ की अभिलाषा भी पाले रखते हैं। साथियों की अभिलाषा तमाम लडकियां भी पालती है और बनाती भी हैं, पर उन्हें क्या-क्या झेलना पड़ता है। और परिवार बचाने की जुगत में कैसा परिवार बचाते हैं वे। 
एक वामपंथी क्रांतिकारी पुरुष का बेटा जब नौकरी करने लगा तो उनकी पत्नी ने उनकी क्रांतिकारिता से पल्ला झाड़ा और भविष्य में बेटे आदि की भलाई के लिए एक पंडित से ग्रह दशा दिखा कर पति महोदय को कहा कि उन्हें एक महीना घर से बाहर रहना पड़ेगा क्योंकि राहु के खतरे से बचने का यही उपाय है। अब पति महोदय कभी बेटी के यहां रहते हैं, कभी अपने किसी मित्र के यहां।
समाज बदलेगा तो पिछले पारिवारिक ढांचे टूटेंगे ही और नये बनेंगे भी। संबंध भी नये बनेंगे और पिछले टूटेंगे। कुछ लोग रोना रोते हैं कि महानगरीय ढांचे में पुराने पारिवारिक संबंध नहीं रहे, पर ऐसा नहीं है।
पुराने संबंधों की जगह तमाम नये संबंध सामने आए हैं। पहले परिवार में साली, भाभी आदि तमाम संबंध रहते थे जो लडके-लड़कियों को शिक्षित करते थे और उनकी मदद करते थे। उनमें एक रागात्मक संबंध भी होता था। आज महानगरों में लडके-लडकियों के ऐसे तमाम रागात्मक संबंध हैं, जिन्हें आप पहचान नहीं पाते और उनमें पुराने आदिम संबंध तलाशते हुए सब नष्ट होने की बात करते हैं।
कोई भी लड़की जब महानगर में नौकरी करती है तो उसे भी कई साथियों की जरूरत पड़ती  है। उनकी अपनी संख्या पुरुषों के मुकाबले बहुत कम रहती है इसलिए वे मात्र लड़कियों से संबंध बनाकर अपना काम नहीं चला सकतीं। अब जो पुराने किस्म के लोग हैं और पुराने किस्म के प्रेमी भी, वे इसे समझ नहीं पाते। एक ओर स्नेह भरे सारे संबंधों को प्रेम की कोटि में रख उनके लिए मुश्किलें पैदा करते हैं, दूसरी ओर उन्हीं में से किसी एक से प्रेम भी करना चाहते हैं।
ऐसे में लड़की जब अपने कई मित्रों के साथ स्नेह भरा संबंध बनाती है तो वह उसकी जरूरतों की उपज होता है। उसके पास यहां जीजा, भाभी जैसे पारंपरिक संबंध नहीं होते, तो वह नये संबंध बनाती है। एक पत्रकार महोदय के आफिस में ऐसी ही एक लड़की काम करती थी जो मेरे शहर के पड़ोस से आती थी। अब पत्रकार महोदय रोज उसकी एक कहानी लेकर आते कि आज लड़की ने बस में उनका हाथ पकड़े रखा कुछ देर, तो आज अपने मेल का पासवर्ड दे दिया. लड़की ने विश्वास कर या विश्वास पैदा करने के लिए यह किया आदि । 
पर पत्रकार महोदय का रोना कई तरह का था कि भैया उसके मेल में कई प्रेमियों के मेल होते हैं। कि एक लडका अपनी गाडी से उसे सुबह छोडने आता है दूसरा शाम में ले जाता है। फिर शहीदी मुद्रा में यह भी बताते हैं कि वे पक्के प्रेमी हैं उसका साथ देते रहते हैं, बावजूद इसके।
वे नहीं समझ पाते कि यह एक महानगरीय नौकरीपेशा लडकी की जीवनशैली है जो पारंपरिक कसौटी पर खरी नहीं उतर सकती। उसके कई रागारत्मक संबंध होंगे। फिर जरूरत और अकेलेपन के दबाव के अनुसार वह भी अपना चुनाव रखेगी सामने। तब उन्हें अपने इन्हीं स्नेहिल बंधुओं में से चुनना होगा। तब कुछ का दिल टूटेगा ही। अगर उन्होंने उसे दिल से ले लिया है तो।
आगे पत्रकार महोदय ने कोशिश की कि पारिवारिक मित्र होने के चलते मैं लडकी के घर में उनके विवाह की बात चलाऊ। वे अक्सर रोते आते कि भाभी कुछ कीजिए। यह कितनी हास्यास्पद बात है कि एक युवा जो महानगर में पत्रकारिता कर रहा है अपने साथ काम करने वाली लडकी से हुए अपने तथाकथित प्रेम को विवाह में बदलने के लिए पारंपरिक सामंती तरीका अपनाते हुए पारिवारिक दबाव बनाने की कोशिश करता है। जबकि वह एक आधुनिक-शिक्षित लड़की है जो उस पर इतना विश्वास करती है, पर वह उसे हासिल करने की सामंती वृति में अपने विवेक को ताखे पर रख देता है।   
वह लडकी एक वाम शिक्षित पृष्ठभूमि के परिवार से आती है जहां अपवादस्वरूप ऐसा माहौल पिता की तरफ से मिलता है कि उनकी चारों लड़कियां पढ़-लिखकर अपने लिए लड़का  चुनती हैं। वैसे परिवार में एक वैज्ञनिक चेतना वाला पत्रकार अपनी मित्र पर विश्वास करने की बजाय पिछले रास्ते से घुसने की असफल कोशिश करता है। यह हमारे समाज की विडंबनाएं हैं।

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Sha
Comments 

Ajai Kumar misra 2012-03
 
Kumar Mukul Ji ka yah lekh vartman mahanagari sabhyata aur sankriti ka ek aina hai. Hum kitane pragatisheel soch wale banane ki koshish karate hon lekin hamare ander ek chhudra manasikata bhi chhipi hai, ek taraf yah bhashan diya jata hai ki purushon aur auraton mein hamein anter nahin karana chahiye wahin doosari taraf jab hum apane kisi parichit ko kisi ladaki ya aurat ke saath jate huye ya baat karate hue dekhate hain to wahan hamari mansikata badal jati hai.
 r. chetan kranti 2012-03
 
चरित्र की इस फांक की जड़ में विचारों और सरोकारों का सिर्फ कारोबारी उपयोगितावाद तक सीमित हो जाना है. हम लोग विचार को ओढकर निकलते हैं जिस तरह धुले हुए कपडे जिनको दफ्तर का काम निबटाकर वापस उतार दिया जाता है शाम को. औरत के बदलाव के साथ कदम मिलाकर न चल पाने की अक्षमता तो इसका कारण है ही.
राजीव 2012-03
मेरा अनुमान है इस घटना के सभी जीवित पात्र दिल्ली में हैं और बिहार की राजधानी पटना से वास्ता रखते हैं. लगता है चोट कमोबेश सभी पर लगी है जो इस कहानी के पात्र या श्रोता जो भी हैं. ऐसे विमर्शों में चटखारे लेने का चलन है. लेकिन मुकुल ने नाम लिए बगैर चर्चा का अच्छा सस्पेंस बनाये किया है. जो मुद्दे इस लेख में गिनाये गये हैं उसके पात्र हम सब हैं.

धर्मेन्द्र 2012-03-22 16:08
शीर्षक लगाना चाहिए था 'वामपंथ के सांस्कृतिक सांढ़'.बहुत अच्छा मुकुल भाई. इस तरह की बहसों से वामपंथियों में एक बार चर्चा का माहौल गर्म हों जाता है और वह गर्मी भी महसूस करते हैं अन्यथा वह जम्हाई ही लेते रहते हैं. वैसे वो कौन हैं जो जिनकी शादी अभी नहीं हुई है, कहिये तो मैं उनका जुगाड़ लगा दूँ.

Nisha Rani 2012-03-22
mukul ji achha likha hai aapne khaskar patrkaar mahoday ke baare me. hamare aaspas aise vichitra jeevon ki bharmaar hai. roj aise logon ko ladkiyan jhelne ko mazboor hain.
Quote
एक शुभेच्छु 2012-03-22 
वाह क्या लिखा है कुमार मुकुल ने, मजा आ गया. पर पूरी इमानदारी नही बरती है लिखने मे. महोदय अगर अपने कुछ अन्य वामपंथी मित्रो को नाम सहित उद्घातित करते तो...... ...........

मंगलवार, 20 नवंबर 2018

हिंसा और अहिंसा, ईसा, बुद्ध, गांधी और गोडसे - कुमार मुकुल

 हिंसा और अहिंसा क्या है
जीवन से बढ़ हिंसा क्या है - केदारनाथ अग्रवाल


उपरोक्‍त पंक्तियां स्‍पष्‍ट करती हैं कि हिंसा और अहिंसा अपने आप में कुछ नहीं हैं। उनके परिपेक्ष्‍य ही उनकी सकारात्‍मकता या नकारात्‍मकता को दर्शाते हैं। भूखा व्‍यक्त्‍िा अगर हिंसा करता है तो उसे उसी तरह नहीं लिया जा सकता जैसे इस तरह की हिंसा करने वाले को आंख मूंद तपाक से सजा देने वाले हिंसा करते हैं। क्‍योंकि भूख अगर विवेक पर हावी हो जाती है तो इसके लिए हम भूखे को दोष नहीं दे सकते। मतलब एक न्‍यूनतम सापेक्ष व्‍यवस्‍था में ही हिंसा और अहिंसा पर विचार किया जा सकता है। ईसा, बुद्ध और गांधी तीन अहिंसा के अग्रदूत दिखते हैं हमें। देखा जाए तो तीनों की अहिंसा तीन तरह की है। तीनों को अपने अपने तरह से अहिंसाचरण की कीमत भी चुकानी पडती है।

इसमें सर्वाधिक निरापद ईसा की अहिंसा है। जो अपनी जान देकर फिर अहिंसा के लिए राह बनाती है इसीलिए उस राह पर सर्वाधिक लोग चलते हैं और दुनिया में अहिंसा को एक विचार की तरह स्‍थापित करते हैं। ईसा की अहिंसा करूणा से पुष्‍ट अहिंसा है।

पर बुद्ध की अहिंसा ज्ञान से पोषित है। यूं इसके मूल में भी करूणा है पर वह ईसा की तरह अपनी शहादत दे बनाई गयी अहिंसा की राह नहीं है। उनकी अहिंसा की सीमा त‍ब दिखाई देती है जब उनकी अहिंसा खुद उनका शिकार कर डालती है। एक चर्मकार के यहां दान में मिला मांस खाने से उनकी मृत्‍यु होती है। साध्‍य नहीं साधन भी पवित्र होने चाहिए यह याद दिलाती है बुद्ध की मृत्‍यु।

गांधी की अहिंसा इन दोनों की अहिंसा से जुदा है। वह करूणा या ज्ञान से ज्‍यादा हिंसक परिस्थितियों से उपजी अहिंसा है जिसे गांधी हथियार की तरह प्रयोग करते है और उसे उस रूप में मान्‍यता भी मिलती है जब माउंटबेटन कहता है कि सेना की पूरी एक डिवीजन से ज्‍यादा है इस निहत्‍थे आदमी की ताकत है और जब पंजाब में सेना दंगों को काबू नहीं कर पाती तब अकेले गांधी कलकत्‍ता में हिंसा को काबू कर दिखाते हैं।

देखा जाए तो हिंसा और अहिंसा का संबंध जटिल मानसिक स्थितियों से है। और इससे निजात मानसिक स्‍तर पर मुकाबला कर ही पाया जा सकता है। इस जटिल गुत्‍थी को सुलझाने की दिशा में जो सबसे बडी खोज मानव इतिहास में मुझे दिखती है वह खेल भावना का विकास है। जिसमें मानव के भीतर की उर्जा का सकारात्‍मक इस्‍तेमाल हो पाता है। युवको के भीतर सबसे ज्‍यादा उर्जा होती है और उन्‍हें ही नियंत्रित करने की सर्वाधिक जरूरत होती है और देखें तो खेल का संबंध युवकोचित उत्‍साह और उर्जा से सर्वाधिक है। खेल का मतलब खेल भावना से है। मतलब बडे से बडे मुददे को हमें खेल खेल में निपटाने की कला आनी चाहिए। यह कला खेल के दौरान ही आती है। मतलब हमें जो चाहिए उसे ताकत का सीधा प्रयोग ना कर उसे कलात्‍मक ढंग से प्रयोग कर हासिल करने से है। इसमें एक ओर हमारी ताकत खर्च हो जाती है और जीत के रूप में हमारा लक्ष्‍य भी हमें मिल जाता है और नहीं भी मिला तो हम अपनी उर्जा खर्च कर चुके होते हैं और तत्‍काल उसके लिए लड पाने की स्थिति में नहीं रह जाते और तय करते हैं कि अगले खेल में इसका हिसाब कर लिया जाएगा।

मुझे लगता है कि हिंसा को रोकना है तो हमें हथियारों पर खर्च की जगह खेलों को बढावा देने पर सर्वाधि‍क ध्‍यान देना चाहिए। यहां खेल का मतलब बाजार नियंत्रित खेल से नहीं है। विवेकानंद जब फुटबाल खेलने को गीता पढने से पहले प्राथमिकता देते हैं तो उनका भी यही उद्देश्‍य दिखता है। स्‍वभावत: वे युवक हृदय सम्राट हैं।

बाल श्रम को खत्‍म कर उनके खेलने की व्‍यवस्‍था कर हम भविष्‍य की हिंसा को नयी उपजाउ जमीन दे सकते हैं। पर अगर हम युवकों की हिंसा की ताकत को हथियार की हिंसा से रोकना चाहेंगे तो किसी भी मुल्‍क की बरबादी के सिवा इसके कोई और परिणाम नहीं हो सकते।

मंदिर लेन कविता में लीलाधर जगूडी की युवकों को लेकर पंक्तियां हैं -

मेरे साथ बीस-बाईस ऐसे लडके हैं
जिन्‍होंने उभी कुछ नहीं देखा
न अपनी मूंछें ना दाढी
सिर्फ अन्‍याय देखा है
... समय से टीके लगवाने के बाद भी समाज बीमार है।


यह उन लडकों की व्‍यथा है जो अपराधी हैं और हुए जा रहे हैं। इस फौज को आप ताकत या हिंसा से नियंत्रित करना चाहेंगे तो खुद अनयिंत्रित हो जाएंगे।

कोई भी कायंतरण हिंसा के बगैर नहीं हो सकता। अपने गर्भ के घेरे को तोडकर रक्‍त बहाते हुए ही किसी का जन्‍म होता है। और हर मां अपने भीतर की हिंसा को रचनात्‍मक भविष्‍य में बदलने के लिए दर्द और तडप को सहती हुई उसे आकार देती है। हिंसा को इस तरह रचनात्‍मक तौर पर एक सुंदर भविष्‍य की ओर ढकेलना हमें माताओं से सीखना होगा प्रकृति से सीखना होगा। हर हिंसा अपने अस्तित्‍व को आकार देने की बेचैनी से ही उपजती है उसे पहचान कर सही जगह नश्‍तर लगाना होगा। वरना हमारा समाज मुर्दों का टीला बन जाएगा।

यूं हिंसा या अहिंसा किसी के पक्ष में ताकत के साथ और कटटरता के साथ खडे होना नासमझी है। अहिंसा को चरम पर पहुंचाना हिंसा की जमीन तैयार करना ही है। यह गांधी के साथ भी हुआ। अहिंसा की ताकत से हमने अंग्रेजों का मुकाबला किया और जिसके सामने अंग्रेज वायसराय भी सर झुकाते नजर आए वह आजाद हिंदोस्‍तान के जातीय दंगों के सामने असफल होती गयी। यहां स्‍पष्‍ट है कि जब तक हम फिरकों में ना बंटकर दुश्‍मन से लडते रहे हम अहिंसा को ताकत बनाने में सफल हुए पर आजादी के बाद जैसे ही हम जाति और धर्म के नाम पर बंटे अहिंसा असफल होती गयी।

अहिंसा के अग्रदूत गांधी भी आखिरकार हिंसा के शिकार हुए। देखा जाए तो गांधी हिंसा के नहीं अपनी अहिंसा के ही शिकार हुए। गांधी को गांधी ने मारा। क्‍येांकि पटेल और माउंटबेटन की लगातार मांग के बाद भी गांधी ने प्रार्थना सभा में हथियार लेकर आने की पुलिसिया जांच की मांग को नहीं माना। जबकि अधकचरे हिंदूवादी उसी सभा में उन्‍हें मारने को एक असफल बम विस्‍फोट कर चुके थे। तब गांधी ने कहा था कि अगर अहिंसा को लेकर जीवन भर के मेरे प्रयोसों का यही परिणाम है कि कोई हमें मारना चाहता है तो मैं जीना नहीं चाहता और मैं प्रार्थना सभा में किसी पु‍लिसिया जांच की इजाजत नहीं दे सकता। इस इतने बडे देश में अहिंसा के नायक को मारने के लिए कहीं कोई पागल पैदा हो जाए तो इसे जानने और रोकने का कोई तरीका नहीं हो सकता। पर इसे गांधी ने जिस तरह से अपने सिद्धांतों की जीत हार से जोड लिया वह गलत था। नतीजा अहिंसा के अग्रदूत का हिंसा का शिकार होना है। इसमें गोडसे की कोई बहादुरी नहीं थी ना पुलिस की असफलता। यह गांधी की सदिच्‍छापूर्ण जिद का परिणाम था कि वे एक देश को मनुष्‍यता और अहिंसा के माध्‍यम से चलाना चाहते थे। और उनकी मौत को हम हिंसा की जीत भी नहीं कह सकते। यह एक विडम्‍बना थी जो हमें किसी भी विचार को रूढि बनाने के खिलाफ सचेत करती है कि ऐसा करते हुए हम मानवीय स्‍वभाव के प्रत्‍यक्ष-अप्रत्‍यक्ष कारकों को नजरअंदाज नहीं कर सकते। अहिंसा या हिंसा के एक डंडे से हमेशा पूरी दुनिया को नहीं हांका जा सकता। बल्कि दुनियावी परिस्थितियों के मददेनजर हमें मनुष्‍यता के हित में हिंसा या अहिंसा के इस्‍तेमाल की जरूरत के हिसाब से काम करना चाहिए।

सोमवार, 19 नवंबर 2018

आलोचना के संदिग्ध संसार में एक वैकल्पिक स्वर : प्रकाश

इधर के वर्षों में हिंदी आलोचना का वरिष्ठ संसार बड़ी तेजी से संदिग्ध और गैरजिम्मेदारन होता गया है। आलोचना की पहली, दूसरी...परंपरा के तमाम उत्तराधिकारी, जिनकी अपनी-अपनी विरासतों पर निर्लज्ज दावेदारी है, आलोचना के मान- मूल्यों और उसकी मर्यादा से क्रमश: स्खलित होते चले गए हैं। खासकर काव्य-आलोचना पर यह नैतिक संकट ज्यादा गहराया है। हमारी वरिष्ठ आलोचना बगैर किसी अन्वेषण-विश्लेषण के ऐसे किसी भी नए कवि को कबीर, प्रसाद, पंत की छवि में नि:संकोच फिट कर देती है, जिनकी न तो भाषा को बरतने का बुनियादी सलीका आता है और न ही वे काव्य-कर्म के मर्म से समग्रत: परिचित होते हैं। हमारी युवा कविता के अधिकांश कवि ‘रेडिमेड’ हैं और दुर्भाग्य से हमारी वरिष्ठ आलोचना भी ‘रेडिमेड’ तरीके से उनका मूल्यांकन करती है।
    ऐसे परिदृश्य में कुमार मुकुल के पहले ही आलोचना-कृति को पढ़कर प्रीतिकर आश्चर्य हुआ। मुकुल मूलत: कवि हैं। एक कवि के रूप में अपने वरिष्ठ और समकालीन कवियों को पढ़ते हुए विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में उन्होंने जो टिप्पणियां, आलेख और काव्य-कृतियों की समीक्षाएं लिखीं, उनको संकलित कर एक स्वतंत्र आलोचना-कृति के रूप में प्रकाशित किया गया हैं अंधेरे में कविता के ‘रंग’ नाम से।
    पुस्तक चार खंडों में विभाजित हैं- ‘कविता का नीलम आकाश’, ‘जख्मों के कई नाम’, ‘उजाड़ का वैभव’ और ‘जहां मिल सके आत्मसंभवा’। पुस्तक की शुरुआत में एक भूमिका है, जो लेखक की सृजनात्मक भाव-भूमि को समझने के लिए अत्यंत उपयोगी है। आखिरकार पूरी पुस्तक में काव्य-आलोचना ही क्यों? ‘भूमिका’ में वर्णित लेखक का बचपन से कविता, और वह भी संघर्षशील, प्रतिवादी स्वर की कविताओं की ओर झुकाव यह स्वष्ट कर देता है कि लेखक मूलत: असहमति का कवि है और जब यह कवि आलोचना के क्षेत्र में उतरता है तो कविता को ही अपना क्षेत्र बनाता है, और उसमें भी असहमति की कविताएं उसको प्रिय है।
इस पुस्तक में भी लेखक ने सविता सिंह, अनामिका, विजय कुमार, आलोक धन्वा, लीलाधर जगूड़ी, विष्णु खरे, अरुण कमल, केदारनाथ सिंह, केदारनाथ अग्रवाल, वीरेन डंगवाल, विजेंद्र, रघुवीर सहाय और राजकमल चौधरी की कविताओं का मूल्यांकन किया गया है। सविता सिंह की कविताओं की मूल भावभूमि की खोज करते हुए आलोचक उन्हें पितृसत्तात्मक समाज के विरूद्ध मातृसत्तात्मक समाज-व्यवस्था का सशक्त प्रवक्ता सिद्ध करता है। वहीं अनामिका कविताएं उसे ‘औसत भारतीय स्त्री जीवन की डबडबाई अभिव्यक्ति’ मालूम पड़ती है। विजय कुमार के कविता-संग्रह ‘रात-पाली’ की विवेचना करते हुए उन कविताओं में आलोचक को जीवन के वे तमाम छोटे-छोटे ब्यौरे मिलते हैं, जो एक भयंकर नाउम्मीदी, भय और आशंका में कांप रहे हैं।
आलोक धन्वा के संग्रह ‘दुनिया रोज बनती है’ की सुप्रसिद्ध कविताओं ‘सफेद रात’, ‘ब्रूनों की बेटियां’, ‘जनता का आदमी’, ‘भीगी हुई लड़कियां’ आदि की बड़ी मार्मिक पड़ताल पुस्तक में है। वीरेन डंगवाल की कविता पर टिप्पणी के बहाने आलोचक जारी समय की कविता पर भी सार्थक बात कहता है- ‘‘ विष्णु खरे के बाद जिस तरह हिंदी कविता में मानी-बेमानी डिटेल्स बढ़ते जा रहे हैं और कविता के कलेवर में मार तमाम तरह की गदंह पच्चीसियां जारी हैं, वीरेन की संक्षिप्त कलेवर की कविताएं ‘कटु विरक्त’ बीज की तरह हैं।’’ फिर अरुण कमल की ‘नए इलाके’ की खोज है, जो आलोचक ‘असल पुराने इलाके की ही खोज’ लगती है। इसी तरह आलोचक विजेंद्र की ‘लोकजन की ओर उन्मुख’ कविताओं, ‘रघुवीर सहाय की स्त्री की अवधारणा’, ‘केदारनाथ अग्रवाल की श्रम-संस्कृति की प्रतिपादक कविताओं’ और केदारनाथ सिंह और राजकमल की कविता के विविध आयामों की सूक्ष्म पड़ताल करता है।
    पुस्तक का दूसरा खंड अलग से रखने का विशेष औचित्य नहीं था। इस खंड में भी नए-पुराने अनेक कवियों के काव्य-संकलनों की अलग-अलग आलोचना है। यह आलोचना ‘पुस्तक समीक्षा’ की शैली में है। जैसे मिथिलेश श्रीवास्तव के पहले काव्य-संग्रह ‘किसी उम्मीद की तरह’, के संग्रह ‘एक दिन लौटेगी लड़की’, विष्णु नागर के संग्रह ‘हंसने की तरह रोना, राजेश जोशी के संग्रह ‘चांद की वर्तनी’ और ज्ञानेन्द्रपति के संग्रह ‘गंगातट’ की समीक्षाएं इस खंड में शामिल हैं। इनके अलावा सुदीप बनर्जी, लीलाधर मंडलोई, मदन कश्यप की कविताओं पर स्वतंत्र-सी मालूम होती विवेचना है।
    पुस्तक के तीसरे खंड ‘उजाड़ का वैभव’ में कुछेक वरिष्ठ कवियों जैसे विष्णु खरे, कुमार अंबुज के अलावा अपेक्षाकृत नए कवियों निलय उपाध्याय, प्रेम रंजन अनिमेष, पंकज चतुर्वेदी, निर्मला पुतुल, वर्तिका नंदा, पंकज कुमार चौधरी, आर-चेतन क्रांति, रुंजय कुंदन और तजेंदर सिंह लूथरा की कविताओं का सह्दयता से किया गया आब्जर्वेशन है।
    आखिरी खंड में सिर्फ दो आलेख हैं। इसमें पहले आलेख में है हमारे अस्थिर समय में भटकाव की शिकार हिंदी कविता की वस्तुस्थिति का आकलन और उसके कारणों की शिनाख्त की गई है। आखिरी आलेख कुमारेंद्र पारसनाथ सिंह की एक महत्वपूर्ण कविता ‘सूर्यग्रहण’ पर केंद्रित है। मुक्तिबोध की कविता ‘अंधेरे में’ की पृष्ठभूमि में कुमारेंद्र की कविता ‘अंधेरे में’ के वर्षों बाद रची गई और मुकुल जी इस कविता को अंधेरे में की पुनर्रचना मानते हैं। यह सिद्ध करने   की उन्होंने पर्याप्त कोशिश की है।
    कुमार मुकुल की यह कृति समकालीन हिंदी कविता को समझने की मुख्यधारा की दृष्टि के बरक्स एक वैकल्पिक दृष्टि प्रदान करती है। यह दृष्टि गिरोहबंदी और तमाम किस्म के पूर्वग्रहों से मुक्त और पारदर्शी है। लेखक की विवेचना पद्धति और चुनाव भी विश्वसनीय है। हमारे समय के घोर अंधेरे में सच्ची कविता अब भी है जहां-तहां चमक रही है। उसके विविध रंगों को कुमार मुकुल की इस पुस्तक ने सफलतापूर्वक उभारकर हमारे सामने रखा है। समकालीन हिंदी कविता की विविधआयामी छटा का दिग्दर्शन करने की इच्छा रखने वाले पाठकों के लिए यह बेहद महत्वपूर्ण पुस्तक है।

रविवार, 18 नवंबर 2018

‘सामाजिक परिवर्तन में बाधक हिन्दुत्व’ दलित चिंतक एच एल दुसाध

  ‘सामाजिक परिवर्तन में बाधक हिन्दुत्व’ दलित चिंतक एच एल दुसाध का दुसाध प्रकाशन से आया हजार पृष्ठों का ग्रंथ है। श्री दुसाध पत्रकारिता को समर्पित अकेले ऐसे व्यक्तित्व हैं जिन्होंने राजनीति, साहित्य, फिल्म, क्रिकेट, दूरदर्शन, धर्म, भू-मंडलीकरण, शिक्षा और अर्थनीति जैसे तमाम विषयों की दलित नजरिये से विवेचना की है। यह विवेचना सभ्यता और संस्कृति के सवालों को दलित संदर्भ में पुनर्परिभाषित करने का तर्कसम्मत प्रयास है। दुसाध के दलित चिंतन की आधुनिक कसौटी सहज ही वर्ण व जाति के अस्वीकर के साथ धर्म को खारिज करती है। दुसाध की आधुनिकता यहां लोहिया की तरह नेहरू की आधुनिकता से टकराती है और गांधी को दलित संदर्भ में ज्यादा प्रासंगिक पाती है जिन्होंने 1932-33 में आजादी के आंदोलन क ो विराम देकर कांग्रेसियों को दलितोद्धार जैसे रचनात्मक कार्यों में लगने को कहा था और जिससे नेहरू चिढ़ गए थे, जिसकी चर्चा उन्होंने अपनी आत्मकथा में की थी।
अब अगर गांधी का दलितोद्धार नेहरू को चिढ़ाता है तो नायपाल को भी गांधी अपढ़ और कुछ भी सोचने के अयोग्य लगते हैं। नायपाल के  अलावा अमर्त्य सेन, क्रिकेटर कालीचरण, रोहन कनाई आदि भारतीय मूल के लोगों के  प्रति श्रद्धा पर दुसाध अपनी दलित जमात से भी सवाल करते हैं कि - अगर हिन्दुओं को भारतीय मूल के प्रति श्रद्धा में वतन खिलाफी नहीं दिखती है तो भारतीय मुसलमानों के इमरान खान, वसीम अकरम, मो. अली आदि के प्रति दिवानगी में देशद्रोहिता की बू क्यों आती है?
रामविलास शर्मा के अतिरिक्त परंपरा प्रेम पर नामवर सिंह आदि ने भी उंगली उठाई है। दुसाध का भी उनसे सवाल है कि उस परंपरा में दलित की जगह कहां है? दलितों पर अंग्रेजी राज के स्वागत का इलजाम लगाने वालों के संदर्भ में दुसाध का  कथन है कि - अंग्रेजों का दोष यही था कि वे इस देश में बहुत देर से आये और बहुत जल्दी चले गए। पुस्तक की भूमिका में दुसाध के कथनों पर तार्किक सहमतियां प्रस्तुत करने वाले वीर भारत तलवार यहां भारतेन्दु समेत 19 वीं सदी के हिन्दी लेखकों - पत्रकारों द्वारा किए गए अंग्रेजों के गुणगान की वजह पूछते सवाल करते हैं कि फिर अपने लिए शिक्षा के दरवाजे खोलने वाले और मनुवादी कानूनों को खत्म कर समान नागरिक कानून बनाने वाले अंग्रेजों को दलित - शूद्र अपना हितैषी क्यों न मानते? श्री तलवार भूमिका में सवाल उठाते हैं कि - जो द्विज समाज करोड़ों दलितों-शुद्रों को स्वाधीन करने को तैयार नहीं था, उसे अंग्रेजों से स्वीधनता मांगने का क्या हक था?
तमाम समसामयिक सवालों पर दुसाध का अपना स्वतंत्र नजरिया है, दलित ही दलित लेखन कर सकता है जैसे मुद्दे पर अलग ढंग से  सोचते हुए दुसाध पूछते हैं कि सवर्ण लेखक दलित साहित्य क्यों नहीं लिखते?
चंद्रभाान प्रसाद द्वारा पेश डाइवर्सिटी के सिद्धांत की वकालत करते दुसाध फिल्म, मीडिया व अन्य तमाम क्षेत्रों में दलितों की उपस्थिति दर्ज कराना जरूरी समझते हैं। वे फुले, पेरियार, आंबेडकर की परंपरा में कांशीराम को रखते कहते हैं कि कांशीराम ने अधिकार चेतना से शून्य शिक्षित दलितों में सत्ता हासिल करने की अकांक्षा पैदा की।
पुस्तक में सैकड़ों मुद्दों पर दुसाध अपने स्वतंत्र, आधुनिक नजरिये से विचार करते हैं, जो हमें आत्मालोचना का सबक देते हैं। कुछ मुद्दों पर आत्मलोचना की जरूरत उन्हें भी है। यह सवाल तो है कि दलित कोई सामूहिक नेतृत्व विकसित करने की बजाय क्यों संघ गिरोह से अवसरवादी राजनीति गठबंधन कर खुद को आगे बढ़ाने की कोशिश करते हैं। हालांकि इन गठबंधनों ने यू. पी. में ही ब्राह्मण बचाओ टाइप खुदरा आंदोलन खड़े कर दिए हैं और परशुराम जैसे हिंसक प्रतीक को अपनाने की मजबूरी ब्राह्मणों में पैदा कर दी है। यहां ब्राह्मणों की दयनीयता दिखती है, अवसरवाद के खेल में सांस्कृतिक तौर पर वे पहली बार मात खा रहे हैं पर अवसरवाद के आसान ब्राहमणवादी तौर-तरीकों से दलितों को भी बाहर निकलना होगा। कुल मिलाकर सामाजिक संदर्भ में हिन्दुत्व की नकारात्मक भूमिका को पुस्तक सफलतापूर्वक स्थापित करती है।

शुक्रवार, 16 नवंबर 2018

वेदों में क्‍या है (1) - कुमार मुकुल


वेदों की आधारभूमी

स्पष्ट है कि खेतिहर समाज के लिए वर्षा प्राथमिक जरूरत है, इसी तरह बादलों से वर्षा कराने वाले इंद्र की पूजा भी स्वाभाविक है।

वेद आदिग्रंथ है। इसमें मांसाहारी समाज से विकसित हो, नए-नए बन रहे खेतिहर समाज के अनुभवों को ऋषियों ने अपनी ऋचाओं में अभिव्यक्त किया है। इन दोनों समाजों के बीच का टकराव वेद की आधारभूमि है। मांसाहार पर टिके पुराने वनों के रक्षक मानुष समाज को नए खेतिहर समाज ने राक्षस की संज्ञा दी। खेतिहर समाज के ऋषि अहिंसा को अपनी ऋचाओं में प्राथमिकता देते दिखते हैं। इस विकास यात्रा में जो व्यक्ति या वस्तु उन्हें सहायक दिखते हैं। वे उसे देवता मान पूजा करते हैं। इन देवताओं में अग्नि-इंद्र से लेकर सोम, ओदन (भात) और मधु आदि सैकड़ों चीजें शामिल हैं। इन वेदों में आपको पूजा-प्रेम-घृणा-क्रूरता सभी भावों की अभिव्यक्तियां दिखती है।

चारों वेदों में ऋग्वेद को पहला और महत्‍वपूर्ण माना गया है। ऋग्वेद का आरम्भ मधुच्छन्दा ऋषि के अग्निदेव की अभ्यर्थना में लिखे गए श्लोकों से होती है। अग्नि को ही आरम्भ के लिए क्यों चुना गया इसका कारण इस श्लोक से हम समझ सकते हैं। इस ऋचा के अन्तिम श्लोक में लिखा गया है-हे अग्नि! पिता जैसे पुत्र के पास स्वयं ही पहुंच जाता है। वैसे ही तू हमको सुगमता से प्राप्त हो जाती है।

मतलब, विकास के क्रम में खेतिहर समाज को जो चीजें सहज उपलब्ध होती गईं और लाभकारी बनीं उन्हें देव पुकारा गयाअग्नि की विकास क्रम में महत्‍वपूर्ण जगह है। अग्नि की खोज ने खेतिहर समाज को मांसाहारी समाजों से आगे कर दिया। फिर यह अग्नि धीरे-धीरे सहज उपलब्ध होने लगी इसलिए इसकी अभ्यर्थना से ही ऋग्वेद का आरम्भ किया गया। वेदों में राक्षसों को अग्नि से डरने वाला बताया गया है। इससे भी जाहिर है कि अग्नि से राक्षसों का परिचय ठीक से नहीं था। विकास की कड़ी में वे पिछड़े रहे थे और खेतिहर समाज के कामों में भयवश अवरोध उत्पन्न करते थे।

गुरुवार, 15 नवंबर 2018

दास्‍तोएवस्‍की के प्रेम - कुमार मुकुल

उपन्‍यास जगत की महान हस्‍ती और अपराध और दंड जैसी सार्वकालिक कृति के सर्जक दास्‍वोएवस्‍की के जीवन को हम देखें तो वह भी अपराध और दंड के जटिल संजाल में गुत्‍थम-गुत्‍था दिखेगा। रूप सिंह चंदेल की पुस्‍तक दास्‍तोएवस्‍की के प्रेम को पढते हुए यह साफ हो जाता है कि जीवनानुभव की जमीन पर ही महान रचनाओं का सृजन होता है। कि दास्‍तोएवस्‍की की मनोवैज्ञानिक अंतर्दृष्टि और दार्शनिक गहनता के श्रोत उनकी जीवन सलिला में ही हैं। 
पुस्‍तक के प्राक्‍कथन में ही रूपसिंह क‍हते हैं - ... उनका कोई भी कार्य शायद ही इतना चौंकानेवाला हो,जितना उनका स्‍वयं की जीवन... विशेष रूप से वेश्‍याओं,आदर्शवादी विवाहिता महिलाओं,आकर्षक और स्‍वतंत्र उन्‍मुक्‍त औरतों और कामुक युवतियों के साथ बिताया गया उनका जीवन था, यही नहीं जुआ उनकी विशेष कमजोरी थी। पुस्‍तक में रूपसिंह ने उन परिस्थितियों को विश्‍लेषित करने का प्रयास किया है जिसकी उपज थे दास्‍तोएवस्‍की। उनकी तीन प्रेमकथाओं की चर्चा रही है, अपने प्रेम में वे बहुत क्रूर हो जाते थे,पाशविकता की हद तक। एक तरह का सनकीपन हमेशा उनके साथ रहा। और क्‍यों ना हो किशोर वय में वे अपने अपने भाई के साथ पागल हो जाने की योजना पर विचार करते थे। उनके जीवन में जो अस्‍तव्‍यस्‍तता रही उसकी जड़ें उनके पालन पोषण के तरीकों से जुड़ी दिखती हैं। दास्‍तोएवस्‍की कभी भी अपने पिता के बारे में बातें करना पसंद नहीं करते थे। उनके चिकित्‍सक पिता कठोर अनुशासन पसंद और शंकालु स्‍वभाव के थे और अपनी पत्‍नी को बराबर प्र‍ताडि़त किया करते थे। पत्‍नी की मृत्‍यु के बाद उनके पिता ने नौकरी छोड़ दी और नौकरानी के साथ गांव जाकर रहने लगे,जहां ग्रामीणों व रिश्‍तेदारों ने उनकी हत्‍या कर दी। प्रेम व्‍यवहार में पाशविकता की जड़ें हम उपरोक्‍त घटनाओं में तलाश सकते हैं। उनकी तीसरी पत्‍नी, जो उनके यहां टंकन के कार्य के लिए आई थीं और जिनके सामने उन्‍होंने प्रेम निवेदन किया तो वह भौंचक रह गयी थी पर आगे जिसे दास्‍तोएवस्‍की से प्रेम हो गया था, ने उन्‍हें संभाला। उनका नाम अन्‍ना था। दास्‍तोएवस्‍की ने जुआ में उसकी भी सारी चीजें गंवा दी थीं पर अन्‍न ने हिम्‍मत नहीं हारी। वह शायद भविष्‍य के इस लेखक को पहचान चुकी थीं और उसने जीवन भर और उसके बाद भी उनके मान-सम्‍मान की रक्षा में खुद को झोंक दिया। दास्‍तोएवस्‍की को उनकी लंपटता से मुक्‍त करने का श्रेय अन्‍ना को ही जाता है। 
अन्‍ना ज‍ब दास्‍तोएवस्‍की के प्रेम में पड़ीं तो वे उसके पिता से भी ज्‍यादा उम्र के थे, पर अन्‍न का कहना था - लेकिन वे जवान थे,वह मेरे समय के युवकों से अधिक दिलचस्‍प और जीवंत थे ...। शादी के वक्‍त अन्‍न बीस की और दास्‍वोएवस्‍की पैंतालीस साल के थे। और मिरगी के वे पुराने मरीज थे। पर शायद अन्‍ना की पहचान सही थी, जिसने विश्‍व के इस महान रचनाकार को अपने स्‍नेह से संवारा। वह मानती थी कि - प्रेम करने में रूप-रंग,स्‍वास्‍थ्‍य और गरीबी बाधक नहीं होते। दास्‍तोएवस्‍की की पहली पत्‍नी मारिया को उनसे प्रेम था या नहीं इस पर भी कई लोग शंका करते हैं, उनका मानना है कि वह उनपर दया करती थी व सहानुभूति दिखाती थी पर दास्‍तोएवस्‍की उसके दीवाने थे। पहले परिचय में उनतीस वर्षीय मारिया इसाएव की पत्‍नी थी। इसाएव बीमार और शराबी था। दास्‍तोएवस्‍की उसके घर बराबर जाते थे। इसाएव उन्‍हें सम्‍मान से देखता था और दास्‍तोएवस्‍की उसके बेटे को पढाते थे। इसी दौरान उनकी मारिया से घंटों बातें होती थीं। आगे बीमारी और शराब की आदतों से इसाएव का असामयिक निधन हो गया। तब मारिया को पाने की व्‍याकुलता दास्‍तोएवस्‍की में चरम पर थी। पर मारिया उस समय एक अन्‍य स्‍वस्‍थ ग्रामीण युवक को चाहती थी। जिससे उसे एक पुत्र भी हुआ। बाद में दास्‍तोएवस्‍की की आर्थिक स्थिति सुधरी तो मारिया ने उनसे विवाह कर लिया। आगे मारिया भी बीमार रहने लगी और मर गयी। मारिया के रहते ही दास्‍तोएवस्‍की को अपोलिनेरिया से प्रेम हो गया थ। पर यह भी असफल रहा। इसका श्रेय दास्‍तोएवस्‍की की यौन कुंठा को ही जाता है। प्रेम संबंधेां में वे यौन उन्‍मादी व परपीड़क सा व्‍यवहार करते थे व अपोलिनेरिया की अपनी महत्‍वाकांक्षाएं थीं। 
पुस्‍तक को पढकर दास्‍तोएवस्‍की के जीवन के कई सकारात्‍मक पहलू भी समने आते हैं, जैसे कि वह रूस के पहले ऐसे लेखक थे जिन्‍होंने लेखन को जीवन का आधार बनाया था। वे लेखक के रूप में एक मजदूर की तरह निरंतर श्रम करते थे। यही कारण था कि उन्‍हें तुर्गनेव व तोस्‍तोय जैसे अभिजात वर्ग के लेखकों और नौकरशाह लेखकों से ईर्ष्‍या थी। तो अगर जुआ में धन उडाने की बीमारी उनमें थी तो लेखक के रूप में जी तोड़ मिहनत की सामर्थ्‍य भी। यह आश्‍चर्यजनका था कि युवावस्‍था में क्रांतिकारी गतिविधियों के कारण सश्रम कारावास भुगतने वाले दास्‍तोएवस्‍की की झुकाव धीरे-धीरे वामपंथ से दक्षिणपंथ की ओर होने लगा था और अंत में वे दक्षिणपंथी रह गए थे। जब रूस के राज्‍यतंत्रवादी लोग उग्र सुधारवादी व निरिश्‍वरवादी हो रहे थे दास्‍तोएवस्‍की राज्‍यतंत्रवादी व ईश्‍वर में आस्‍था रखने वाले होते जा रहे थे। यह पुस्‍तक दास्‍तोएवस्‍की के जीवन को एक फिल्‍म की पटकथा की तरह सामने रख पाती है यह इसकी खूबी है।