बुधवार, 17 अगस्त 2016

सच-झूठ-ईश्‍वर - लघुकथा

दोनों नंगे ही पैदा होते हैं। तो क्‍या सच व झूठ आवरणों के नाम हैं।
पैदा होते हैं तो दोनों मर भी जाते हैं। मतलब सच-झूठ दोनों ही अमर नहीं हैं।
दोनों को जन्‍मते और मरते ईश्‍वर देखता है। तो क्‍या उसकी भूमिका दर्शक से ज्‍यादा है।
  ...... खलील जिब्रान को पढते हुए।

शुक्रवार, 18 दिसंबर 2015

जटायु - गिद्ध या चील

केरल में 100 करोड की लागत से जटायु नेचर पार्क में जो मूर्ति कलाकार ने बनायी है 70 फीट उंची वह देखने में साफ-साफ एक चील लग रही है जबकि जटायु गिद्ध था। चील की गर्दन छोटी होती है और गिद्ध की लंबी।


गुरुवार, 19 नवंबर 2015

अब राइट टू एम्प्लॉयमेंट पास होना चाहिए

सोसल साइट पर देश भर के युवा अपना डी पी बदल रहे हैं। इसपर लिखा है यूथ फॉर राइट टू एम्प्लॉयमेंट। ये बेरोज़गार युवा हैं, इन्हें रोज़गार चाहिए। अगर यह आंदोलन बढ़ा तो मोदी जी के लिए कठिनायी हो सकती है।



      इनका कहना है कि भारत के राजनीतिक दल बेरोजगारों के प्रति अमानवीय हद तक गैरजिम्मेदार हैं। वाम दलों की नीतियाँ सिर्फ़ कागजी हैं, कांग्रेस की- अपना अमानवीय चेहरा छिपाने की, भाजपा का इसे भुनाने की। वे इस समस्या के प्रति एकदम गंभीर नहीं हैं। इस देश में हर दिन शताधिक युवा जीवन हार रहे हैं और आत्महत्या कर रहे हैं। दक्षिण से उत्तर भारत तक कम ही राज्य होंगे जिसमें दस लाख से कम पद रिक्त हों। अगर केंद्र और राज्य की सारी रिक्तियों को जोड़ दिया जाय तो भारत की बेरोज़गारी का तात्कालिक समाधान हो सकता है। पर जान-बूझकर इसे रोका जाता है ताकि हमेशा मुद्दा बना रहे! उत्तर प्रदेश में पुलिस की 60 प्रतिशत पद रिक्त हैं। देश स्तर पर 25 प्रतिशत पद रिक्त हैं! उत्तम प्रदेश में तीन लाख शिक्षकों के पद रिक्त हैं। तमाम राज्यों में इससे भी बुरा हाल है। चपरासी के तीन सौ पदों के लिए 23 लाख अप्लीकेशन आते हैं, SSC के सात हजार पदों के लिए 80 लाख आवेदन पड़ते हैं, राज्य सरकारों की गैर-ज़िम्मेदारी के चलते सहायक शिक्षकों को न्यायालय रद्द कर देती है और शताधिक लोग आत्महत्या कर लेते हैं। आए दिन देश में नौकरी माँग रहे लोग पीटे जाते हैं। पढ़ा-लिखा बेटा अपने पैरों पर खड़ा हो जाए- इसकी राह देखते-देखते माँ-बाप दुनिया से चले जाते हैं। आत्महीनता से ग्रस्त युवा गलत रास्ते पर लग जाते हैं। उनका इस देश और समाज से, इसके मूल्यों से विश्वास उठने लगता है। अगर इसपर तत्काल ध्यान न दिया गया तो याद देश बिखर जाएगा।
सरकार को चाहिए, कि वी पी सिंह ने जिस रोज़गार के अधिकार को लागू करने की शपथ ली थी, जिसे उनकी कमेटी ने तत्काल लागू करने की बात कही थी, उसे कम से कम तीस सालों बाद ही सही पर अब ज़रूर लागू कर देना चाहिए। राइट टू एम्प्लॉयमेंट को आसानी से लागू किया जा सकता है। और अगर सरकार राइट टू एम्प्लॉयमेंट नहीं पास कर सकती तो आत्महत्या के अधिकार को पास कर दे!
रोज़गार के अधिकार को आसानी से लागू किया जा सकता है। तमाम कमेटियों की रिपोर्ट और विद्वानों ने इसके तरीके बताए हैं। इसके लिए बस ज़रूरी इतना ही है कि अंबानी-अडानी का घर भरने वाली, ग्रोथ ओरियंटेड नीतियों के बजाए रोज़गार ओरियंटेड नीतियाँ बनायी जाएँ और पहले से रिक्त पदों को भरा जाए।
अबतक हमारे देश के पास ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है कि यह ठीक-ठीक पता लगाया जाए कि किस सेक्टर में कितने लोग लगे हुए हैं और कितने लोगों को रोज़गार मिला और कितनों की चली गयी। इसमें कोई कठिनाई नहीं है। हर व्यक्ति के पास वोटर आई डी है। एक ऑन लाइन व्यवस्था की जा सकती है जिससे हर दिन कितने लोगों को किस क्षेत्र में रोज़गार मिल रहा है और कितने लोग बेरोज़गार हो गये हैं, इसका पता लगाया जा सकता है और तत्संबंधी नीतियाँ बनाई जा सकती हैं। पर सरकारें इसके लिए गंभीर तो हों, उनकी सदेच्छा तो हो।
सरकार को आज और अभी से सोचना चाहिए जिससे हर दिन बेकारी के चलते आत्महत्या कर रहे युवाओं को बचाया जा सके ।                           

शनिवार, 24 अक्तूबर 2015

रामराज, अतीत से मुक्‍त‍ि, पॉपुलर का महत्व, सफल व्यक्त‍ि, जिंदगी का मकसद

राम रथी विरथि लव- कूशा
देखहिं सीता भयउ कलेशा।

जो रामराज 12 साल के वनवास में सीता को गंवाने और पाने के बाद मिला और जिसमे फिर वे सीता को गंवा बैठे। जिसमे भाई लक्ष्मण को राजनिकाला के कारण सरयू मे डूबना पड़ा और उस दुख में फिर राम को भी डूबना पड़ा। जिसमे उनकी रावण जयी सेना को उनके ही बेटों के हाथ पिटना पडा और इस दुख मे सीता को खाई मे कूदना पड़ा। उस रामराज मे क्या राम दुबारा जन्म लेना चाहते ...
अतीत से मुक्‍त‍ि 
कुछ लोगों को तो पाकिस्‍तान भेज दिया जाएगा। पर राक्षस तो वे सभी हैं जो मांस-मदिरा का सेवन करते हैं। इसे राक्षसी भोजन कहा जाता है। फिर जो कुछ महान राक्षस हैं वे ब्राह्मण हैं जैसे रावण और वृत्र आदि इनकी हत्‍या के कारण राम और इन्‍द्र पर ब्रह्महत्‍या का पाप लगा था। तो इन तमाम राक्षसों के लिए क्‍यों न एक राक्षस राज्‍य बनाया जाए। सबसे बडा देवता इन्‍द्र बलात्‍कारी था पर वह राक्षस क्‍यों नहीं कहलाया। अगर हम वेद पुराण आदि को आधार बनाएंगे तो इतने झगडे हमारे आपस में निकल आएंगे कि फिर से गुलामी हमारे कदम चूमेगी। पिछला विकास का इतिहास अतीत से मुक्‍त‍ि का है। अतीत मुक्‍त अमेरिका सबसे आगे है। रूस चीन अतीत को दफना कर ही आगे बढे है। अब हमें चुनना है कि हम अतीत के नाम पर फिर से गुलामी का आह्वान करेंगे या आजादी की राह चलेंगे।

पॉपुलर का महत्व तो है ही। गुलशन नंदा , चेतन भगत से लेकर कुमार विश्वास तक, ये सब एक नया पाठक वर्ग तैयार करते हैं, हां एक समय के बाद उनकी जगह नये नये पापुलर लोग लेते जाते हैं। आज नंदा की जगह भगत हैं। जब तक आम जन में शि‍क्षा का स्तर उठता नहीं है, किताब पढने की संस्कृति, जो अब नेट पर पढने की संस्कृति में बदल रही है, विकसित नहीं होती, इन पॉपुलरों की जरूरत रहेगी।

सफल व्यक्त‍ि होता है, कुछ संदर्भों में, परिस्थ‍ितियों में, जीवन सफल या विफल नहीं होता, वह बस जीवन होता है ...अपने बहुआयामी विस्तारों के साथ ...

जिंदगी का मकसद ढूंढने की जरूरत नहीं ... 
जिंदगी जो कुछ भी  रोज ब रोज  हमारे सामने लाती है ... 
उससे दो चार होना ... उसे सही लफ्जों में बयां करना ... अपने आप में  मकसद बनता जाता है...
आप उसे बयां करने से बचने की कोशिश करें तब आपका जीवन  खुद उसे  बयां करने लगता है ...


शुक्रवार, 23 अक्तूबर 2015

वेद पुराण उपनिषद आरण्‍यक तैत्तिरीय ब्राह्मण शंकराचार्य

ऋग्वेद - जिन्हें पुरुष कहते हैं वे वस्तुत: स्त्री हैं-----
स्त्रिय: सतीस्तां उ मे पुंस आहु: पश्यदक्षण्वान्न बिचेतदन्ध:।
प्रकृति की रचना में प्रत्येक पुरुष के भीतर स्त्री और प्रत्येक स्त्री के भीतर पुरुष की सत्ता है। ऋग्वेद में अस्यवामीय सूक्त में कहा है—जिन्हें पुरुष कहते हैं वे वस्तुत: स्त्री हैं; जिसके आँख हैं वह इस रहस्य को देखता है; अंधा इसे नहीं समझता।

आरण्‍यक ---
अन्‍नं हि‍ भूतानां ज्‍येष्‍ठम - अन्‍न ही सभी भूतों में श्रेष्‍ठ है। अन्‍न ही बह्म है। तप यानि खेती के कर्म से ब्रह्म यानि अन्‍न को जानिए।
यजुर्वेद ---
परम चैतन्‍य की कोई प्रतिमा-मूतिै नहीं है - न तस्‍य प्रतिमा अस्ति‍।
इयमुपरि मति: - यह बुद्धि ही सर्वोपरि है।

तैत्तिरीय ब्राह्मण -----
मनुष्‍य ने ही अमृत खोजा - अजीजनन्‍नमृतं मर्त्‍यास:। 
जो दिख रहा वही सत्‍य है - चक्षुर्वे सत्‍यम।
विद्वान खुद में होम करते हैं, दूसरे यानि अग्नि में नहीं - आत्‍मन्‍येव जुह्वति, न परस्मिन।

आदिगुरु शंकराचार्य – मैं सदैव समता में स्थित हूँ-----
अहम् निर्विकल्पो निराकार रूपो
विभुव्याप्य सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणाम |
सदा मे समत्वं न मुक्ति: न बंध:
चिदानंद रूप: शिवोहम शिवोहम ||6||
मैं समस्त संदेहों से परे, बिना किसी आकार वाला, सर्वगत, सर्वव्यापक, सभी इन्द्रियों को व्याप्त करके स्थित हूँ, मैं सदैव समता में स्थित हूँ, न मुझमें मुक्ति है और न बंधन, मैं चैतन्य रूप हूँ, आनंद हूँ, शिव हूँ।

ऋग्‍वेद - सोमपान पर कांड - 10, सूक्‍त - 119, मंत्र - 9,11 में रोचक बातें हैं -----
मैं पृथिवी को जहां चाहूं, उठाकर रख सकता हूं, क्‍योंकि मैं अनेक बार सोमपान कर चुका हूं।
मेरा एक पक्ष स्‍वर्ग में स्‍थापित है तो दूसरा पृथिवी पर। क्‍योंकि मैं अनेक बार सोमपान कर चुका हूं।

ऋग्‍वेद - ----------------------
कभी दीन हीन न होने वाली पृथिवी ही स्‍वर्ग है, अंतरिक्ष है - अदितिद्योंरदितिरन्‍तरिक्षम।
भद्र स्‍त्री जनसमूह से पुरुष को मित्र के रूप में चुनती है - भद्रा वधूर्मवति यत सुपेशा:, स्‍वयं सा मित्रं वुनते जनेच‍ित।
यह मेरा हाथ ही भगवान है - अयं मे हस्‍तो भगवानयं।
हम धन के स्‍वामी हों दास नहीं - वयं स्‍याम पतयो रयीणाम।

अनेक धर्म और भाषा वाले मनुष्‍यों को धरती एक समान धारण करती है - जनं बिभ्रती बहुधा विवाचसं नानाधर्माणां पृथिवी यथौकसम़।
पितरों की राह पर न चल - मानु गा: पितृन।
चावल और जौ स्‍वर्ग के पुत्र हैं, अमर होने के औषध - ब्रीहिर्यवश्‍च भेषजौ दिवस्‍पुत्रावमर्त्‍यो।
मन्‍युरिन्‍द्रो - उत्‍साह ही इन्‍द्र है - अथर्ववेद।।।
मैं अन्‍न देवता ब्रम्‍ह से भी पूर्व जन्‍मा हूं - सामवेद।।।
अभय ही स्‍वर्ग है - स्‍वर्गो वै लोकोअभयम
विद्वान ही देव हैं - विद्वां सो हि देवा: - शतपथ ब्राह्मण।।।
अन्‍न ही विराट है - अन्‍नं वै विराट - एैतरेय ब्राह्मण।।।
निरे भौतिकवादी अंधकार में पहुंचते हैं, अध्‍यात्‍मवादी उससे भी गहरे अंधकार में पहुंचते हैं - इशावास्‍येनिषद।।।



मंगलवार, 13 अक्तूबर 2015

जितेंद्र श्रीवास्तव की कविता- सोनचिरई : लोक-संपत्ति पर डकैती

आशीष मिश्र 



कविता में लोकतत्त्व और ख़ासकर नब्बे के बाद की कविता में इसके स्वरूप पर बातचीत करना चाहता हूँ। प्रश्न पूछना चाहता हूँ, कि सवर्ण मर्दों को ही यह लोक इतना क्यों याद आता है? जानना चाहता हूँ, कि इन कविताओं में लोक का क्रांतिकारी सार कितना है और कितना यह बाजार का उत्पाद है? चाहता हूँ, आप खोजें कि ये कविताएं अधिकांशतः इतनी 'लिरिकल' क्यों हैं? परंतु यहाँ एक विशिष्ट कविता तक सीमित रहूँगा। इसके साथ सर्जनात्मकता और लेखकीय नैतिकता पर भी कुछ बात करना जरूरी होगा, तो इस विषय पर भी थोड़ी बात होगी। यह कविता जितेंद्र श्रीवास्तव की प्रतिनिधि कविता है और इसका शीर्षक है- ‘सोनचिरई’। यह कविता एक बहुत ही लोकप्रिय सोहर का उल्था है। सोहर का खड़ी बोली में तर्जुमा है। जो लोग यह कह रहे हैं कि यह चोरी है, वे गलत कह रहे हैं! यह चोरी नहीं अनुवाद है। यह चोरी नहीं धूर्तता है, यह अनैतिकता है कि आप अनुवाद को मौलिक कविता कह दें। तो चोरी के बजाए धूर्तता कहना ज़्यादा सटीक और क़द के अनुकूल होगा। इसकी नाटकीयता, कहन और कथा सब वही है- जस का तस! फिर भी कविता सोहर की संवेदनात्मक गहराई को नहीं छू पाती तो इसलिए कि लोकगीतों को अनूदित किया ही नहीं जा सकता। लोक-भाषा जैसी गहराई खड़ी बोली में संभव ही नहीं है। अतः तमाम फिनसिंग के बावजूद सोनचिराई सोहर के आसपास भी नहीं पहुँच पाती।
लोकगीत और लोककथा में अंतर होता है। लोककथा में दीर्घ कथावस्तु रहती है पर लोकगीत में कथानक का अभाव होता है। लोकगीत किसी भाव-विशेष पर ही केन्द्रित होते हैं। कहीं - कहीं कथानक रहता भी है तो गौड़ रूप में ही, वहाँ भी कोई भाव ही प्रधान होता है। यहाँ घटनाएँ नहीं नित्यप्रति के दुख-सुख, याचनाएँ, प्रार्थनाएँ होती हैं। जो लोग यह कहते हैं कि कथा को नए तरीक़े से लिखा जाना चाहिए, वे सही कहते हैं। आख़िर रामकथा एक ही है और वह अनेक महान रचनाओं का रीढ़ है। पर ऐसे लोगों को 'लोकगीत' और 'लोककथा' में अंतर समझना चाहिए। लोकगीत में गीत और कथा को अलग नहीं किया जा सकता। लोक गीतों में जिसे वे कथा समझते हैं वह भाव को अभिव्यक्त करने का ख़ास शिल्प है। यह कथा नहीं है जिस पर दूसरा भवन खड़ा किया जा सके। सोहर में उसकी ख़ास तरह की नाटकीयता और उसके मूल में मौजूद दुख को अलग ही नहीं किया जा सकता। यह लोक कथाओ में संभव होता है, वहाँ भाषा की भी कोई ख़ास दिक़्क़त नहीं होती, उसे अनूदित किया जा सकता है, शिल्प भी बदला जा सकता है। परंतु यही लोकगीतों में नहीं हो सकता। तुलसीदास पर यह आरोप कभी नहीं है, कि उन्होने कथा चुराया, उनपर यह आरोप लगाया जाता है, कि परशुराम-लक्ष्मण संवाद कहीं से लिया है, उनपर आरोप है कि उनकी बहुत सी उपदेशात्मक चौपाइयाँ अनुवाद हैं। और यह सही है, इससे इंकार नहीं किया जा सकता पर यह इतने बड़े प्रबंध में मामूली हिस्सा है। और प्रबंध से जुड़कर नई अर्थछवियों से दीप्त हो उठा है। पूरा प्रबंध ही सोनचिरई की तरह अनुवाद नहीं है। तुलसीदास उन हिस्सों के लिए नहीं याद किए जाते हैं जो अनूदित हैं, वे उन प्रसंगों के कारण याद किए जाते हैं जिनकी कल्पना उन्होने स्वयं की। सोनचिरई का अपनी पूर्णता में अनुवाद है। इस बात को दोनों कविताओं के एक एक बन्द को आमने सामने रखकर देखा जा सकता है।
(सोहर)
घरा मे से निकरी तिरियवा जंगल बीच रोवे
बहिनी केहू यहि जंगल मे होतै हमै खाई लेतै
हमहि मरि जाइत हो
जंगल से निकरी बघिनिया त दुख सुख पूछेई हो
बहिनी कवन संकट तोहरे जियरा बिरहि बहु रोवहु हो
सासू कहे बहु बाझिन ननद निर्बंसिन हो
बहिनी, जेकरा के प्राणपियारी उहो कहे बाझिनी हो
जाऊ न रानी घर अपने तोहे हम न खाबै हो
रानी तोहरी मसुइया खबई हमहु बाझिन होबै हो
(कविता)
उसे जंगल मिला
जंगल मे बाघिन मिली
उसने अपना दुख बाघिन को सुनाया
और निवेदन किया कि वह उसे खा ले
बाघिन ने कहा
वहीं लौट जाओ जहां से आई हो ।
मै तुझे न खाऊँगी
वरना मै भी बांझ हो जाऊँगी ।
(दोनों कविताओं के सारे बन्द इसी तरह आमने-सामने रखकर देखा जा सकता है। और कविताओं को पाने के लिए मेरी पिछली पोस्ट देख सकते हैं )
सोना को बाँझ कहकर घर से निकाल दिया गया तो वह जंगल में गयी। जंगल की बाघिन उससे दुख-सुख पूछती है और उसे खाने से इन्कार कर देती है। बाघिन कहती है कि सोना रानी अगर मैं तुम्हें खाऊँगी तो मैं भी बाझिन हो जाऊँगी। सोना वहाँ से उठकर भीट पर गयी। भीट के राजा से कही कि हमें डस लो और मैं मर जाऊँ। जिनको जरा भी अनुभव है वे जानते होंगे कि लोक में भीट का मालिक नाग को माना जाता है। और भीट पर पानी नहीं पहुँचता अतः वहाँ पुराने साँप रहते हैं। सोहर में यह लोक अनुभव भी है जिसे जितेन्द्र श्रीवास्तव ने बहुत सपाट ढंग से कह दिया है। वे इस एक शब्द के पीछे मौजूद शताब्दियों के ज्ञान और लोक-अनुभव को नहीं समझ सकते। फिर भीट से नागिन निकली, नागिन ने सोना से दुख-सुख पूछा और डसने से इन्कार कर दिया। सोना वहाँ से मायके पहुँची, माँ ने भी चौखट के भीतर लेने से मना कर दिया। फिर धरती से प्रार्थना की तो धरती ने कहा कि अगर मैं तुम्हें जगह दूँगी तो ऊसर हो जाऊँगी। हार कर सोना गंगा के किनारे पहुँची, शायद गंगा उसे अपने में समा ले, वह मर जाए और इस दुखद जीवन से मुक्त हो जाए। गंगा का इंतिज़ार करती रही। गंगा ने सोना से उसका दुख-सुख सुना और उसे नव महीने बाद होरिला होने का आशीष दिया। वह पुत्रवती हुई। यह निपूतेपन का कलंक इतना व्यापक और गंभीर है कि प्रकृति, जीव जन्तु सब कलंकित होने से डरे हुए हैं।
हिन्दू धर्म में संतानोत्पत्ति एक पुण्य कार्य है। यह प्रत्येक दंपति के लौकिक और पारलौकिक उद्धार के लिए आवश्यक है। निस्संतान व्यक्ति का कभी उद्धार ही नहीं हो सकता। ‘अपुत्रस्य गतिर्नास्ति’। एक सोहर में निपूते राजा दसरथ को हेलिन (मेहतरानी) देखने से मना कर देती है! यहाँ संतान का अर्थ पुत्र से है, बेटी नहीं। बेटी से भी उद्धार नहीं होगा, उद्धार के लिए बेटा ही चाहिए। इसलिए हिन्दू समाज में बंध्या स्त्री और निरवंशी पुरुष की अवहेलना की गयी है। वंश पुत्री से नहीं चल सकता। सोहर इसी पुत्र जन्म की घटना के चरो तरफ घूमता है। यही केन्द्र में है। सोहर स्त्रियों द्वारा गया जाता है और इसके निर्माण में भी स्त्रियों का ही प्रयास निहित है। और एक बहनापा इसके गायन और भाव-व्यंजना में मिलता है। कारण कि संतानोत्पत्ति ऐसा अनुभव है जिसे पुरुष महसूस ही नहीं करता अतः जो जनप्रिय और अच्छे सोहर हैं उनमें संवाद स्त्रियों में होता है।
नारी-जीवन की चरम सार्थकता मातृत्व पद-प्राप्ति में ही निहित है। जब तक कोई स्त्री माँ नहीं बनती उसका जीवन अपूर्ण है। सभी संस्कृतियों में स्त्री-पुरुष के इस कृत्य को ग्लोरीफ़ाई किया जाता है पर भारत में इसे धार्मिक क्रिया-कलाप का रूप प्रदान किया गया है। स्त्री मूलतः प्रजननार्थ है। मनुस्मृति में लिखा है-“प्रजननार्थ महाभागाः पूजार्हा गृह दीप्तयः।” इसीलिए वह जहाँ जाती है, भगाई जाती है। इस सोहर को पढ़ते हुए एक बात पर ध्यान जाना चाहिए कि सोना अपना दुख सुनाने सिर्फ़ स्त्रियों के पास जाती है, किसी मर्द के पास नहीं जाती। वह स्त्रियों से ही सहारे की आशा करती है। वह बाघिन, नागिन, माँ, धरती और गंगा के पास जाती है। वह जानती है कि वह पुरुष के ही दण्ड की शिकार है, कोई पुरुष उसे क्यों सुनेगा और कैसे समझ पाएगा। स्त्री जानती है कि उसका दुख सिर्फ़ स्त्री ही समझ सकती है, वही उसपर सदय हो सकती है। पर स्त्रियाँ भी उसी पुंसवाद की गिरफ़्त में हैं, सबकी एक सी स्थिति है। वे जानती हैं कि उन्हें इसी समाज में रहना है।
सोहर में सिर्फ़ स्त्रियाँ हैं, कोई पुरुष नहीं है। यह एक बहनापा को रचता है। सोहर इस तरह की विधा है जिसमें यह बहनापा सबसे गहरा है और जहाँ स्त्रियाँ ही संवाद रत हैं। सोहर में सोना गंगा ही के आशीष से पुत्रवती होती है। गंगा स्त्री है, स्त्री ही उसके दुख को समझती है। यहाँ स्त्री के उद्धार के लिए किसी पुरुष की ज़रूरत नहीं है। पुरुष ही पतित करने वाला तो पुरुष ही उद्धार कैसे करेगा। यह सोहर अपने समय के सापेक्ष बहुत ही क्रान्तिकारी है। सोहर में हिन्दू धर्म के संतानोत्पत्ति संबंधी विचारों का भी निरूपण मिलेगा। सामान्य जनसमुदाय के भीतर धार्मिक विश्वासों की जड़ें मज़बूत होती हैं। पुत्रोतपत्ति के लिए स्त्रियाँ अनेक देवी-देवताओं की प्रार्थना-उपासना का उपक्रम करती हैं और इनमें आराध्य के रूप में सबसे ज़्यादा गंगा का चित्रण है। हृदय की सच्ची आराधना से ख़ुश होकर आराध्य नवमहीने बाद पुत्रवती होने का आशीष देता है।
तत्कालीन समय में पुत्र ही वंश का वाहक हो सकता था। यह भावनात्मक दबाव और ज़िम्मेदारी स्त्री के जीवन-सार में बदल जाता है। इसी तरह का एक दूसरा सोहर है- “बढ़ई गढ़ि लायो काठे कि पुतरिया त रोई सुनावहि हो / गोतनि ललना उधार मोहि देतिव बलमुवां सुनौ सोहर।”
लोक गीतों में ग्रामीण समाजों में परिधि पर छोड़ दिये लोगों का दुख दर्द व्यक्त होता है। छिउनिया तर ठाढ़ उस हिरनी का दुख याद कीजिए। “छापक पेड़ छिउलिया त पतवन धनवन हो / तेहि तर ठाढ़ हिरिनिया त मन अति अनमन हो।” फिर यहाँ से राम कथा पढिए। आप राम कथा को अलहदा ढंग से समझ रहे होंगे। इस सोहर में भी संवाद हिरनी और कौशल्या में है। हिरनी को विश्वास है कि दसरथ भले न समझें पर कौशल्या उसका दुख ज़रूर समझेंगी।
सोहर शताब्दियों पुराना होगा, इसे किसने रचा होगा पता नहीं। सोहर में, एक पुंसवादी समाज में जैसा होता है, पुत्रवती होने को ही स्त्रीत्व मानता है। स्त्री-जीवन की सफलता पुत्रवती होने में है, सोहर भी इसे स्थापित करता है। यह इससे ज़्यादा कुछ स्थापित भी नहीं कर सकता था। आज भी तमाम फूल पत्ती वाली कवयित्रियाँ जिवतिया भूख रही हैं। पर सोहर का क्रान्तिकारी सार इस बहनापा में है। सोहर में सोना का उद्धार कोई पुरुष नहीं करता है। जितेन्द्र श्रीवास्तव की कविता में सोना का उद्धार एक पुरुष करता है। पुरुष ही घरबदर करता है और वही उद्धार! दरअसल जितेन्द्र जी को सोहर में मौजूद बहनापा की समझ नहीं है। वे जहाँ थोड़ा-सा खुद का दिमाग लगाये वहीं कविता कमजोर हो गयी।
सिर्फ यह नहीं कि सोहर की कथा और कहन को नक़ल किया गया है बल्कि पूरा भाव-बोध वही है। सोहर में एक निपूती का दुख और पुत्र के रूप में सौभाग्य की प्राप्ति ही केंद्रीय है। सोहर स्त्री के स्त्रीत्व को पुत्रवती होने में मानता है। जितेन्द्र श्रीवास्तव की कविता सोनचिरई क्या इससे अलग कुछ स्थापित करती है, क्या इसका भाव-बोध इसमें कुछ जोड़ता है? ज़ाहिर है कि ऐसा नहीं है, यह कविता सोहर के भाव-बोध को न तो कहीं से तोड़ती है और न ही उसमें कुछ जोड़ती है! सोहर शताब्दियों पहले लिखा गया होगा अतः सोहर से यह माँग करना भी उचित नहीं है, यह माँग सोहर से नहीं की जाएगी कि पिछली शताब्दियों में दुनिया भर की स्त्रियों ने तमाम तैबूज और धारणाओं को जिस तरह तोड़ा है वह उसे रचे, पर जितेन्द्र श्रीवास्तव से तो यह माँग की जानी चाहिए। जितेन्द्र श्रीवास्तव से यह माँग होनी चाहिए कि वे स्त्री के सार को शताब्दियों पीछे नहीं कील देंगे। परन्तु चोरी करते हुए नैतिक और सर्जनात्मक विवेक कहाँ रह जाता है! जितेन्द्र श्रीवास्तव से यह पूछा जाना चाहिए कि अगर सोना ‘आठ बेटे’(और बेटे ही क्यों हों) न होते तो सोना पूर्ण न होती? क्या होता अगर सोना बिना बच्चों के रहती? पर पुंसवाद इसे स्वीकार नहीं कर सकता कि कोई स्त्री उसके जाल से मुक्त हो जाए। वह बेटे पैदा करे और उसके वंश की गाड़ी खींचे यही उसके जीवन का सार है।
मेरी समझ से यह लोक-संपत्ति पर डकैती है। अभिजन सिर्फ़ श्रम का अधिशेष ही नहीं लूटता, वह उस श्रम की प्रक्रिया में निर्मित श्रेष्ठ सांस्कृतिक तत्त्वों को भी हड़पना चाहता है। और यह कविता, सोनचिरई इसी का श्रेष्ठ उदाहरण है।


(सोहर )
सासू कहे बहू बाझिन ननद निर्बंसिन हो
बहिनी जेकरा प्राणपियारी उहो कहै बाझिन, निकरि जा तू घर से हो
घरा मे से निकरी तिरियवा जंगल बीच रोवे
बहिनी केहू यहि जंगल मे होतै हमै खाई लेतै
हमहि मरि जाइत हो
जंगल से निकरी बघिनिया त दुख सुख पूछेई हो
बहिनी कवन संकट तोहरे जियरा बिरहि बहु रोवहु हो
सासू कहे बहु बाझिन ननद निर्बंसिन हो
बहिनी, जेकरा के प्राणपियारी उहो कहे बाझिनी हो
जाऊ न रानी घर अपने तोहे हम न खाबै हो
रानी तोहरी मसुइया खबई हमहु बाझिन होबै हो
उहवा से उठनी तिरियवा भिटेह बीच रोवई हो
अरे के यह भिटवा के मालिक हमहि डसी लेते
त मरि गड़ी जाइत हो
भिटवा से निकरी नगीनिया त दुख सुख पुछई हो
सासू कहे बहु बाझिन ननद निर्बंसिन हो
बहिनी, जेकरा के प्राणपियारी उहो कहे बाझिनी हो
तुही मोरी रानी से रानी तुही हऊ बाझिनि
रानी जौ हम तोहका डसी लेबइ त
हमहु बाझिन होबइ हो॥
उहवा से उठनी तिरियवा नैहर बीच ठाढ़ भईं
अरे कहाँ हईं माई हमार विरह दुख रोइत हो
घरा मेसे निकरी जे माई त दुख सुख पुछई हो
सोना कवन संकट तोहरे जियरा अकेले चलि आइव॥
सासू कहे बहु बाझिन ननद निर्बंसिन हो
बहिनी, जेकरा के प्राणपियारी उहो कहे बाझिनी हो॥
तूही मोरी सोना बिटियावा तूही हऊ बाझिनि हो
बेटी हमरी दुवरिया जे नघबू त बहुअवा बाझिनी होवई हो
उहवा से उठनी तिरियवा धरती दुख रोवइ मइया
जौ तू फाटी जातू तो तोहमे समाइति हो
धरती से बोलाईं धरती माई
बेटी कौन विरोग तोहरे जियरा बिरह यतना रोवऊ हो
काऊ कही मोरी माई कहत नहीं अवइ हो
माई एकै बलकवा की कारन देसवा निकारी गये
जाऊ न बेटी घर अपने तोहईं हम न लेबई हो
ज तोहई हम लेबई त हमहू बाझिनी होबई हो
उहवा से उठनी तिरियवा गंगा बीचे रोवइ हो
गंगा ......
(यह सोहर मैंने सुनकर नोट किया है। आगे और भी है जिसमें गंगा माई के आशीर्वाद से सोना को बेटे होते हैं। अगर इसमें कोई कमी हो या आपके पास शुद्ध लिखा हो तो साझा करें)
(सोनचिरई/ जीतेन्द्र श्रीवास्तव)

बहुत पुरानी कथा है
एक भरे पूरे घर में
एक लड़की थी सोनचिरई
वह हँसती थी
तो धूप होती थी
फूल खिलते थे
वह चलती थी
तो वसंती हवा चलती थी ।
जिधर निकल जाए
लोगों की पलकें बिछ जाती थी
और जैसा की हर किस्से मे होता है
उसका विवाह भी एक राज कुमार से हुआ ।
राज कुमार उस पर जान लुटाता था ।
उसके होंठ उसकी तारीफ मे खुलते
उसकी जीह्वा उसके प्रेम के सिवा
और सारे स्वाद भूल गई थी ।
उसकी आँखों मे नींद
और दिल मे करार न था
और ऐसे ही दो चार बरस बीत गए
सोनचिरई की गोद न भरी
ननद को भतीजा
सास को कुल का दिया
पति को पुरुषत्व का पुरस्कार न मिला ।
ननद कहने लगी बज़्रवासिनी
सास कहने लगी बांझ
और जो रात दिन समाया रहा उसकी साँसों की तरह
उसने कहा तुम्हारी स्वर्ण देह किस काम की
अच्छा हो तुम यह गृह छोड़ दो
तुम्हारी परछाई ठीक नहीं होगी हमारे कुल के लिए ।
सोनचिरई बहुत रोई
मिन्नतें की
पर किसी ने न सुनी ।
आंसुओं के बीच एक स्त्री
घर के बाद
भटकने लगी ब्रह्मांड मे ।
उसे जंगल मिला
जंगल मे बाघिन मिली
उसने अपना दुख बाघिन को सुनाया
और निवेदन किया कि वह उसे खा ले
बाघिन ने कहा
वहीं लौट जाओ जहां से आई हो ।
मै तुझे न खाऊँगी
वरना मै भी बांझ हो जाऊँगी ।
सोन चिरई क्या करती ...!
वहाँ से साँप की बाँबी के पास पहुंची ।
बाँबी से नागिन निकली नागिन ने उसका दुख सुना
फिर कहा लौट जाओ जहां से आई हो ।
मै तुम्हें काट खाऊँगी तो बांझ हो जाऊँगी ।
सोनचिरई बहुत उदास हुई ।
फिर क्या करती !
गिरते पड़ते माँ के दरवाजे पहुंची ।
माँ ने धधाकर हाल – चाल पूछा
कौन सी विपत्ति मे दुलारी बिटिया ऐसे आई है ।
बेटी ने अपना दुख सुनाया
और चिरौरी की कि थोड़ी सी जगह दे दो माँ रहने के लिए ।
माँ ने कहा विवाह के बाद बेटी को
नैहर मे नहीं रहना चाहिए ।
लोग बाग क्या कहेंगे
वहीं लौट जाओ जहां से आई हो ।
और सुनो बुरा न मानना बेटी
जो तुम्हारी परछाई पड़ेगी तो में बहू भी बांझ हो जाएगी ।
यह कह कर माँ ने दरवाजा बंद कर लिया ।
अब सोन चिरई क्या करती .....!
उसने धरती से निवेदन किया
अब तुम्ही शरण दो माँ दु:ख सहा नहीं जाता ।
इन कदमों से अब चला नहीं जाता ।
जो लोग पलकों पर लिए चलते थे
मुझे उनके ओसारे में इतनी जगह न बची मेरे लिए
अब कहाँ जाऊँ तुम्हारी गोद के सिवा ...!
धरती ने कहा तुम्हारा दुख बड़ा है
लेकिन मैं क्या करूँ जहां से आई हो वहीं लौट जाओ
जो मै तुमको अपनी गोद मे रख लूँगी
तो ऊसर हो जाऊँगी
और मित्रो इसके आगे जो हुआ
वह किसी किस्से मे नहीं है ।
हुआ यह की सब ओर से निराश हो
सोनचिरई बैठ गई एक नदी के किनारे ।
एक दिन गुज़रा
दो दिन गुज़रा
तीसरे दिन तीसरे पहर तक
एक सजीला युवक प्यास से बेहाल नदी तट पर आ मिला ।
उसने सन चिरई को देखा ....!
सोनचिरई को देख
पल भर के लिए वह सब कुछ भूल गया ।
उसने विह्वल हो नरम स्वर में
सोनचिरई के दुख का कारण पूछा
और सब कुछ जान लेने पर
अपने साथ चलने का निवेदन किया ।
सोनचिरई पल छिन हिचकी
फिर उसके साथ साथ हो ली ।
फिर उसके साथ पूरी उम्र जी कर
जब वह मरी तो
आंसुओं से ज़ार ज़ार
उसके आठ बेटों ने उसकी अर्थी को कंधा दिया ।
सोनचिरई आठ बेटों की माँ थी
वह स्त्री थी
और स्त्रियाँ कभी बांझ नहीं होती
वे रचती हैं तभी हम आप होते हैं
तभी दुनिया होती है
रचने का साहस पुरुष में नहीं होता
वे होती हैं तभी पुरुष होते हैं ।

शुक्रवार, 21 अगस्त 2015

“युवा कवि शायक आलोक का एकल काव्य-पाठ”




“मेरी चाय को तुम्हारी फूंक चाहिए सादिया हसन”



मेरी चाय को तुम्हारी फूंक चाहिए सादिया हसन
ये चाय इतनी गर्म कभी न थी
इसकी मिठास इतनी कम कभी न थी.

मैं सूंघता हूँ मुल्क की हवा में लहू की गंध है
कल मेरे कमरे पर आये लड़के ने पूछा मुझसे
कि क्रिया की प्रतिक्रिया में पेट फाड़ अजन्मे शिशु को मार देंगे क्या
बलात्कार के बाद लाशें फूंक जला देंगे क्या
हम दोनों फिर चुप रहे सादिया हसन
हमारी चाय रखी हुई ठंडी हो गई.

हम फूलों तितलियों शहद की बातें करते थे
हम हमारे दो अजनबी शहर की बातें करते थे
हम चाय पर जब भी मिलते थे
बदल लेते थे नजर चुरा हमारे चाय की ग्लास
पहली बार तुम्हारी जूठी चाय पी
तो तुमने हे राम कहा था
मेरा खुदा तुम्हारे हे राम पर मर मिटा था.

पर उस सुबह की चाय पर सबकुछ बदल गया सादिया हसन
एक और बार अपने असली रंग में दिखी
ये कौमें ..नस्लें .. यह मेरा तुम्हारा मादरे वतन
टी वी पर आग थी खून था लाशें थीं
उस दिन खरखराहट थी तुम्हारे फोन में आवाज़ में
तुमने चाय बनाने का बहाना कर फोन रख दिया.

मैं जानता हूँ उस दिन तुमने देर तक उबाली होगी चाय
मैंने कई दिन तक चाय नहीं पी सादिया हसन.

मैं तुम्हारे बदले से डरने लगा
क्रिया की प्रतिक्रिया पर अब क्या दोगी प्रतिक्रिया
इस गुजार में रोज मरने लगा
जब भी कभी हिम्मत से तुम्हें कॉल किया
बताया गया तुम चाय बनाने में व्यस्त हो
मैंने जब भी चाय पी आधी ग्लास तुम्हारे लिए छोड़ दी.

गुजरात ने हम दोनों को बदल दिया था सादिया हसन.

ठंडी हो गई ख़बरों के बीच तुम्हारी चिट्ठी मिली थी-
‘’ गुजरात बहुत दूर है यहाँ से
और वे मुझे मारने आये तो तुम्हारा नाम ले लूँगी
तुम्हें मारने आयें तो मेरे नाम के साथ कलमा पढ़ लेना
और मैं याद करुँगी तुम्हें शाम सुबह की चाय के वक़्त
तुम्हारे राम से डरती रहूंगी ताउम्र
मेरे अल्लाह पर ही मुझे अब कहाँ रहा यकीन ‘’

तुम्हारे निकाह की ख़बरों के बीच
फिर तुम गायब हो गई सादिया हसन
मैंने तुम्हारा नाम उसी लापता लिस्ट में जोड़ दिया
जिस लिस्ट में गुजरात की हजारों लापता सादियाओं समीनाओं के नाम थे
नाम थे दोसाला चार साल बारहसाला अब्दुलों अनवरों के.

हजारों चाय के ग्लास के साथ यह वक़्त गुजर गया.

मैं चाय के साथ अभी अखबार पढ़ रहा हूँ सादिया हसन
खबर है कि गुजरात अब दूर नहीं रहा
वह मुल्क के हर कोने तक पहुँच गया है
मेरे हाथ की चाय गर्म हो गई है
ये चाय इतनी गर्म कभी न थी
इसकी मिठास इतनी कम कभी न थी
सादिया हसन, मेरी चाय को तुम्हारी फूंक चाहिए.
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शायक आलोक अपनी कविताओं का पाठ, हिन्दी कि ज़मीनी रचनाशीलता को परिचित होने और मूल्यांकित कर सकने के लिए, अनौपचारिक मंच देने के उद्देश्य से गठित साहित्यिक संस्था ‘हुत’ की ओर से आयोजित एकल कविता-पाठ कार्यकर्म के दौरान प्रस्तुत कर रहे थे। ‘हुत’ एक मंच भर नहीं यह एक वैकल्पिक समझ है। और एक नितांत अनौपचारिक माहौल में रचने-जनने को महसूसना व समझना चाहते हैं। ‘हुत’ हर उस रचनाकार का दिल से स्वागत करता है जो अपने छांव को छोड़कर सड़क तक आ सके। ‘हुत’ कि तरफ़ से यह आयोजन रविवार, 16 अगस्त, 2015 को शाम 6.00 बजे से एनडीएमसी पार्क, अबुल फ़ज़ल रोड, नियर तिलक ब्रिज रेल्वे स्टेशन, मंडी हाउस, नई दिल्ली में किया गया।
अपने कविता-पाठ में शायक आलोक ने -- ‘उपाय करना कहते किसे हैं’, ‘उनसे कहो कि तुम भ्रमित हो’, ‘मेरी चाय को तुम्हारी फूंक चाहिए सादिया हसन’,  ‘तुम्हारा चुप रहना’, ‘अन्त में यही होगा बहुत से बहुत’, ‘एक पेड़ जो बूढ़ा हो गया है’, ‘विचारधारा को तुमने खून की तरह रखा’, ‘हाँ वह लौट आता है’, ‘किसी कविता में कौआ आ जाय तो’, ‘तस्वीरें’, ‘मुझे पसंद हैं कुकुरमुत्ते’, ‘मेरे जेहन में मुर्दा शान्ति है’, ‘नीलोफर हाकिम’ आदि चौबीस कविताओं का पाठ किया।
शायक आलोक की कविताओं पर बोलते हुए युवा कवि अमृत सागर ने कहा कि इस कवि में हमारा दौर बोलता है। इस कवि के पास उसे देख और रच पाने की क्षमता है, इसलिए मुझे शायक की कविताएं प्रभावित करती हैं। और इनमें बहुत कुछ सीखने के लिए पाता हूँ। उन्होने कुकुरमुत्ते कविता से कई पंक्तियाँ उद्धृत करते हुए इसे बाकायदा सिद्ध किया।
चर्चित युवा कवयित्री रश्मि भारद्वाज ने कहा कि हमारा समय अवसादग्रस्त है । वह प्रतिरोध तो जानता है लेकिन उस प्रतिरोध की दिशा तय नहीं कर पा रहा । पुरानी विचारधाराएँ, मान्यताएँ विखंडित हो चुकी हैं और नए के निर्माण के लिए जिस प्रतिबद्धिता और संकल्प शक्ति की आवश्यकता है, वह बाज़ार की भेंट चढ़ता जा रहा है। आज़ की मध्यमवर्गीय युवा पीढ़ी के सपने मल्टीनेशनल कंपनी में एक आकर्षल सैलरी वाली जॉब, महानगर में तीन कमरों का घर और एक आरामदायक गाड़ी के आस पास भटक रहें और जिनकी सहज पूर्ति के अभाव में एक घोर निराशा और अवसाद उनके जीवन का पर्याय बनता जा रहा है है तो ऐसे में उनसे एक प्रतिबद्ध विचारधारा की अपेक्षा ही बेमानी लगती है। तभी जब युवा कवि शायक आलोक कहते हैं “ पक्ष का निर्माण कवि अपनी कविता की आवश्यकता के हिसाब से करता है’, तो कहीं वह हमारे पूरे समय का प्रतिनधित्व करते नज़र आते हैं जहां विचारधारा अवसरवादिता की भेंट चढ़ती जा रही। शायक आलोक नयी कविता के सशक्त हस्ताक्षर के रूप में अपना नाम दर्ज़ करते हैं क्योंकि वह हमारे समय को बहुत ही कारीगरी से अपनी कविता में बुन रहे। इनकी हालिया कविताओं में कवि की कल्पना और रचनात्मकता को विस्तृत फ़लक मिलता प्रतीत होता है और प्रेम से आगे बढ़कर कवि हाशिए पर पड़े लोगों से जुड़ते नज़र आते हैं। वह अपने देश, काल और विश्व चिंता को कविताओं में अभिव्यक्त करते हैं और वो भी बिलकुल ताज़े, टटके भाषा बिंबो द्वारा जो एकबारगी चौंकाती है और फिर ज़ेहन में एक तीव्र खलबली सी मचा देती है । कविताओं से बहकर जैसे सारा आक्रोश , सारा उदद्वेग, सारी दुश्चिंताएँ हम तक चली आई हो और अपने प्रवाह में हमें भी बहा ले चली हो। ‘तुमने अपनी विचारधारा को खून की तरह रखा , इसे होना चाहिए था पानी की तरह’ या पक्षधरता तय करना जरूरी , ऐसे समय में जब जरूरी है लाल या केसरिया होना ....’ ऐसा कहते हुए कवि उत्तरआधुनिक काल की उस आवाज़ को स्वर देते हैं जो महाकाव्यों के अस्तित्व को चुनौती देता हुआ लोक को सहेजता है, जो हाशिए पर पड़े आम लोगों की बात करता है, जो महान मिथकों, परम्पराओ को ख़ारिज़ कर वर्तमान को देखने , उसकी आवाज़ सुनने की अपील करता है। हमारी पीढ़ी भी शिद्दत से यह महसूस करती है कि अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए इस “संक्रमित समय” में लाल या केसरिया पर्याप्त नहीं जो बदलते हालत और बदलती जरूरतों को परिभाषित पाये। इन कविताओं में कहीं नीत्शे या काफ्का की लेखनी की तरह घोर अवसाद भी नज़र आता है। अपने समय से लड़ता कवि निराश होता है लेकिन उसे अपने अस्तित्व पर भरोसा है, “ मेरे समय के कई मुँह है/ इसने हर मुँह से काटना सीख लिया है....इसे पालने ,पुचकारने की कला सीखनी होगी...” कवि का संवेदनशील हृदय प्रकृति और उसकी छोटी-छोटी नियामतों से भी संवादरत है, “ बचे रहें कंकड़ , चिड़ियों के पैर सलामत रहें” यह कहता हुआ कवि संवेदना के उस स्तर को छूता है जहाँ तक पहुंचे बिना कविता कृत्रिम ही रह जाती है। अपने आस पास की मुर्दा शांति उसे डराती नहीं व्यथित करती है। कवि परिवर्तन का आगाज़ करता है और जब स्थितियाँ उसके नियंत्रण से बाहर हो जाती हैं तो कहीं ये हताश शब्द उपजते हैं , संक्रमित समय में मैंने तमाम लिखे से भरोसा खो दिया है क्योंकि शायद सबसे बड़ा सच यही है कि कविता विचारों की एक ठोस जमीन हमारे पैरों के नीचे दे सकती है लेकिन वह जमीन बनी रहे इसके लिए प्रयत्न हमें स्वयं करना होगा । कविता बस रास्ता सुझा सकती है, हाथ पकड़ कर चला नहीं सकती। शायक आलोक अपना मुहावरा रचते हैं । समय पर तंज़ करने के लिए खुद को ही बार –बार कठघरे में खड़ा करते हैं और इससे कई बार उनके कहे को गलत समझ लिए जाने का ख़तरा बना रहता है। मसलन कवि को कुकुरमुत्ते पसंद हैं जो बिना किसी सहारे, बिना किसी देखभाल के उग आते हैं लेकिन उन्हे अपने आस-पास के हालात से कोई शिकवा नहीं। उसे बदलने के लिए वो कुछ नहीं करते बस अपने अस्तित्व के साथ बने रहते हैं और जीवन की नमी सोखते रहते हैं ।
रवीन्द्र कुमार दास, जो कविता पर बेबाक टिप्पणी के लिए बदनाम हैं, ने कवि को बेहतर और सफल काव्य पाठ के लिए बधाई देते हुए कहा कि शायक आलोक की कविताओं में खूबसूरत काव्य पंक्तियाँ हैं, कतिपय सुन्दर काव्य स्थितियां हैं तथापि कविता के समग्र संगठन पर फिर से काम करने की जरूरत है। मैं कविता पर बात करते हुए कांटेन्ट यानी विषय पर तथा तथ्यों पर बात करना उतना जरूरी नहीं समझता जितना उसके गठन और बनावट पर चर्चा करना जरूरी मानता हूँ। रचना वही जीवित रहती है जो शिल्प में दुरुस्त और मजबूत हो। कुछ काव्य पंक्तियाँ हमें बरबस अपनी ओर आकर्षित करती हैं किन्तु यह पूरा कवि-त्व नहीं है। युवा कवि आदित्य शुक्ल ने कहा कि मुझे शायक के कविताओं की जो सबसे खास बात लगती है वो है उनकी स्पष्टता। वो अपनी विचारधारा, अपने तेवर में बिल्कुल स्पष्ट हैं और सच के पक्ष में खड़े हैं। शायक की चिंताएं वाजिब हैं। उनकी कविताओं में तरह तरह के रंग है। धुर राजनैतिक होने के साथ साथ वो प्रेम की जमीन भी तलाश लेते हैं। अगर उनकी समग्र कविताओं को एक साथ रखकर देखा जाए तो वह पूरा जनजीवन रेखांकित करते हैं। कवि का उद्देश्य परिस्थितियों का रेखांकन करना ही है और यह काम शायक बखूबी करते हैं। हम यह उम्मीद करते हैं कि मानवता को जो संदेश शायक देते हैं उससे हम प्रेरणा लेकर एक संतुलित समाज निर्माण की दिशा में जरूरी कदम उठायेंगे।
आशीष मिश्र ने कहा कि विचार एक मनोरचना, एक मनोव्यवस्था है। अतः कलाओं में विचार अनिवार्य है, आप इससे मुक्त नहीं हो सकते। इस मनोरचना या मनोव्यवस्था का अभाव किसी ‘ईडियट’ में ही हो सकता है। पर कलाओं में विचार एक भावदृष्टि की तरह, एक संवेदनात्मक दिशा की तरह होता है। कला की भावदृष्टि और विचारधारा को एक बना देने का आग्रह बहुत आत्मघाती है। विचार तथ्य, तर्क और और प्रमाण के रस्तों से आगे बढ़ते हुए बहुत नकारी, बहुत एक्सक्लूसिव होता जाता है। वह अपने प्रति-तर्कों और विकल्पों को इनहेल करते चलता है। और अंततः कोई भी विचार सर्वसत्तावाद की तरफ़ जाएगा। अबतक के इतिहास से यही प्रमाणित होता है। कलाएँ विचार के इस दिशा का प्रतिरोध रचती हैं। वे इसकी दुराग्रहों को ढीला करती हैं। कलाएँ इनक्ल्युसिव होती हैं। आप देखेंगे कि इतिहास में विचारधारा कलाओं पर बराबर हमला करती रही है, वह उससे कम ही बर्दाश्त कर पाती है। कलाओं में एक ही साथ स्मृतियाँ और स्वप्न दोनों ही घुलेमिले होते हैं। अतः वह समय और एकायामिता के आग्रह को तोड़ती है।
विचार ढक्कन की तरह अंदर की तरह अंदर की तरफ़ बन्द होते हैं और कलाएँ या कविता बाहर की तरफ़ खुलती हैं। विचार हमेशा आपसे सहमति का आग्रह रखता है। वह जिस दुनिया के विश्लेषण से शुरू होता है उसी  को निर्धारित करने की कोशिश करता है और कई बार एकमात्र निर्धारक बनना चाहता है। कविता आपसे सहमति का आग्रह नहीं करती, वह एक आलोचनात्मक भूमि बनना चाहती है। कविता हर तरह के निरधारणवाद को जगह-जगह से तोड़ती है। इसलिए कविता से विचार नहीं भावदृष्टि का आग्रह होना चाहिए। विचार और विचारधारा जरूरी है पर यह उससे भी जरूरी है कि उसे बराबर सेंसर करने की एक जमीन भी बची रहे। शायक आलोक की कविताएं अपनी गहराई में अपने भीतर घटमान समय को पकड़ते हुए यही आलोचनात्मक भूमि बनने की कोशिश करती हैं। मैंने ‘अपने भीतर के घटमान समय’ कहा है। यह पद सचेत ढंग से चुना है। आप देखेंगे कि इन कविताओं में दुनिया से एक संलाप है। सभी कविताओं में कवि भी एक पक्ष है, एक महत्त्वपूर्ण पक्ष है। बाहर का समय नहीं अंतर्ग्रहीत समय प्रभावी है। यह दिशा रूमानी कविताओं का है पर आप जानते हैं कि शायक रूमानी कवि नहीं हैं। वे विश्लेषित अनुभवों के कवि हैं। कई बार तो बहुत तटस्थता और क्रूरता से यह विश्लेषण करते हैं। यह आपको उनकी तमाम कविताओं में दिखेगा। प्रेम कविताएं अधिकतर रूमानी हो जाती हैं पर एक बार आप शायक की प्रेम कविताएं पढ़ें आपको पता चलेगा कि यह हमारे समय का प्रेम है। यह पिछली पीढ़ी का प्रेम नहीं, हमारी पीढ़ी का प्रेम है। मैं इनकी प्रेम कविताओं से हमेशा प्रभावित होता हूँ।
शायक आलोक से एक शिकायत मुझे है- वह यह कि उनके अनुभवों का भूगोल और इतिहास दोनों ही कुछ सीमित लगता है। यह स्वभविक भी है, अनुभवों का विस्तार धीरे धीरे ही होता है। यह इस पीढ़ी में अधिकांश के यहाँ है पर लोग उसे छिपाने की कोशिश करते हैं। शायक यह नहीं करते, वे अपने जेनुइन अनुभवों को ही रचते हैं। उन्हें इतने सुंदर पाठ के लिए शुक्रिया।
कार्यक्रम का संचालन युवा कवि-कहानीकार-पत्रकार सुशील कुमार ‘मानव’ ने किया।
कार्यक्रम में वरिष्ठ कवि बजरंग बिश्नोई, युवा कवयित्री अनुपम सिंह, युवा कवि आलोक पाण्डेय, अंजनी कुमार तिवारी, देव रंजन, बिपिन दुबे, मधुसुदन सिंह, रुची भल्ला, आकाशदीप, इरेन्द्र बबुअवा, आदि की न सिर्फ उपस्थिति रही, बल्कि इन्होंने अपने विचार भी व्यक्त किया। 

रविवार, 2 अगस्त 2015

रवीन्द्र के. दास के कविता-संग्रह ‘स्त्री-उपनिषद’ के बहाने “स्त्रीवादी सौन्दर्य विमर्श” पर परिचर्चा का आयोजन

’जो सौंदर्य के पक्ष में खड़ा होता है वह असौंदर्य के विरोध में भी खड़ा होता है।‘’—अर्चना वर्मा




हिन्दी की ज़मीनी रचनाशीलता को अनौपचारिक मंच देने के उद्देश्य से गठित साहित्यिक संस्था ‘हुत’ की ओर से आयोजित रवीन्द्र के. दास के कविता-संग्रह ‘स्त्री-उपनिषद’ के बहाने “स्त्रीवादी सौन्दर्य विमर्श” पर परिचर्चा आयोजित की गई। ’हुत’ की तरफ़ से यह आयोजन शुक्रवार, 24 जुलाई, 2015 को शाम 5.00 बजे से गाँधी शान्ति प्रतिष्ठान, 221/223, दीनदयाल उपाध्याय मार्ग, नई दिल्ली-110002 में किया गया।

‘हुत’ की तरफ़ से युवा कवि अरुणाभ सौरभ ने स्वागत करते हुए, ‘हुत’ के उद्देश्य पर प्रकाश डाला। उनहोंने कहा कि ‘हुत’ बगैर किसी दावे के अपनी जमीन पर अपने समय को रचने को समर्पित एक बैनर है--एक कलम का बैनर। उनहोंने कहा कि यह ‘हुत’ का 16वां कार्यक्रम है। हम ‘हुत’ का कार्यक्रम पार्क में ‘स्ट्रीट लाइट’ के नीचे करते हैं। माह में दो बार किसी रचनाकार का रचना-पाठ और उस पर खुली परिचर्चा होती है। आप को बता दें कि यह एक ऐसा मंच है जहाँ कोई पद नहीं। हम किसी भी पद की मुखाल्फ़त करते हैं। हम तमाम सत्ता-प्रतिष्ठानों का विरोध करते हुए कलम को लिए हुए सड़क पर चलने के हिमायती हैं और अपने समय में सोच और महसूस कर सकने की एक जमीन बनाना चाहते हैं। आलोचना की एक जमीन जहाँ से अपने सहगामियों के साथ निर्भ्रांत रूप से अपने समय को देख रखें, पहचान सकें और निर्णय कर सकें कि क्या किया जाना है। अरुणाभ ने ‘हुत’ के संयोजक व युवा कवि इरेन्द्र बबुअवा के प्रति आभार व्यक्त किया, जिनकी मेहनत से ही ‘हुत’ का कोई कार्यक्रम हो पाता है। स्वागत के बाद अरुणाभ सौरभ ने संचालन के लिए युवा आलोचक आशीष मिश्र को बुलाया।
आशीष मिश्र ने पहली बात कही--- यह कार्यक्रम विमोचन या प्रमोशन नहीं है। ‘हुत’ यह नहीं करता। ‘हुत’ खुली बातचीत का मंच है। यहाँ भी है। इस कार्यक्रम में कोई अध्यक्ष नहीं है, यहाँ कोई पद नहीं है। सब परिचर्चाकार हैं। आशीष ने बताया कि साल-डेढ़ साल पहले कथादेश में शालिनी माथुर के एक लेख पर लम्बी बहस हुई। और उसे पढ़ते हुए मुझे लगा कि यह मुद्दा स्त्रीवादी सौंदर्य-बोध का है। जब हम इस विषय पर गंभीर बातचीत की योजना बना रहे थे तो हमें लगा कि संदर्भ के रूप में कुछ ठोस टेक्स्ट भी होना चाहिए। इस टेकस्ट के लिए रवीन्द्र के. दास के स्त्री-उपनिषद से अच्छा कुछ हो ही नहीं सकता था। एक पुरुष जो स्त्रियों को विषय बनाते हुए कविताएँ संकलित करता है और उसका नाम देता है- स्त्री-उपनिषद! एक खुली बातचीत के लिए, वह भी स्त्रीवादी नज़रिये से बातचीत के लिए, यह सघन आत्मविश्वास की बात है।
इसके बाद रवीन्द्र के. दास ने अपनी बीस कविताओं का पाठ किया ताकि उन लोगों को भी एक संदर्भ मिल सके जिन्होंने संग्रह नहीं पढ़ा। पाठ के बाद आशीष ने व्यंग्य किया कि रवीन्द्र जी संस्कृत के अध्यापक हैं, पढे-लिखे आदमी हैं, अतः वे कविता पढ़ते हुए भी कविता की लय के बजाए व्याकरण पर ज़्यादा ध्यान देते हैं! 

युवा आलोचक विभास वर्मा ने कहा कि मैं स्त्रीवादी सौंदर्य-बोध विषय पर बोलने की स्थिति में नहीं हूँ। पर मैं कविताओं के माध्यम से अपनी बात रखने की कोशिश करूँगा, इस प्रक्रिया में ही संभव है सौंदर्य-बोध पर भी कुछ बातें आएँगी। आज का स्त्रीवादी सौंदर्य-बोध पारंपरिक सौन्दर्य की रुचि, आनन्द आदि के स्वरूप को प्रश्नांकित करता है। उसके विचलनों और कमियों पर भी प्रश्न-चिह्न लगाता है। मुझे समस्या होती है जब कोई बात स्त्रियोचित और पुरुषोचित कही जाती है। स्त्री को विषय बनाकर काफी कविताएँ लिखी जा रही हैं। लेकिन जितने पुरुष लिख रहे हैं वे अपने भीतर के स्त्री को रच रहे हैं। अपने मन पर पड़ी स्त्री-संबंधी छवियों को रच रहे हैं पर रवीन्द्र कुमार दास की कविताओं में यह स्त्री एक विषय के रूप में इससे बाहर खड़ी स्त्री है। यह लिखी जा रही कविताओं और रवीन्द्र के. दास की स्त्री-संबंधी कविताओं में ख़ास अंतर है। यहाँ स्त्री-जीवन की विविधता है। उनका सशक्त और सकर्मक रूप भी है। जैसे इनकी कविता ‘हमारे समय की नायिका काम पर जा रही है’, ‘कमाती हुई स्त्री’ आदि। स्त्री सबलीकरण को लेकर भारतीय समाज में तमाम प्रयास किये जा रहे हैं पर कमाने वाली स्त्रियाँ भी आत्मनिर्भर नहीं हो पातीं। अर्थात कमाना और मुक्त हो पाना अलग बातें हैं। पुरुष समाज स्त्रियों को लेकर जो व्यूह रचना करता है, ईश्वर के शरण में जाती हुई स्त्री उसके तरफ़ इशारा करती है। रवीन्द्र की कविताएं एक ख़ास तरह से पढे जाने की माँग करती हैं इसलिए उनके अन्य अर्थों में व्यवधान होता है। अर्थात् संग्रह का नाम ‘स्त्री-उपनिषद’ न होता तो इन कविताओं की अन्य अर्थ-छवियाँ भी हमारे सामने खुलतीं पर यह नाम एक विशेष कोण से पढ़े जाने की आग्रह करता है जिससे यह घटित होता। नदी शीर्षक से तमाम कविताएँ हैं । एक तरह से इसे नदी उपनिषद भी कहें तो गलत न होगा। कविताओं में कवि का नज़रिया शंकालु है। इसके पीछे उनके तर्क हैं। वे कहते हैं कि यह आज़ादी तो है स्त्री और पुरुष के बीच के सम्बन्धों की पर जिस पर सभ्यता खड़ी है उसे क्षत-विक्षत करती है। कवि की शंका रिश्तों के पक्ष में है। यहाँ जितनी शंका आज़ादी पर की गई है उतनी शंका परिवार आदि संस्थाओं पर नहीं है! यह बात विचारणीय है।
हिन्दी की वरिष्ठ लेखिका व सम्पादक अर्चना वर्मा ने कहा कि आशीष मिश्र ने ठीक याद दिलाई ‘कथादेश’ की, उस पुरानी बहश की। उस समय शालिनी माथुर ने अनामिका और पवन करण की कविताओं की जिस तरह समीक्षा की थी उससे हिन्दी जगत दो खेमों में बंट गया था। मुद्दा यह था कि कविता को कविता की तरह पढ़ा जाए या विमर्श की तरह। शालिनी ने पवन करण की ब्रेस्ट कैंसर पर लिखी कविता को पॉर्न कविता कहा था। आज़ का विषय बहुत अच्छा है। साधारणतः तो यह विषय सुनते ही लोग कलावादी आदि कह देते हैं। यह मुश्किल पर ज़रूरी विषय है। इस विषय को केन्द्र में लाकर आशीष ने अच्छा किया। जो सौंदर्य के पक्ष में खड़ा होता है वह असौंदर्य के विरोध में भी खड़ा होता है। सत्यम शिवम सुंदरम। सत्यम शिवम नैतिकता के साथ सुंदरम कला के भीतर की नैतिकता के साथ जुड़ता है। पुरुष के पास बहुत कुछ है जिसे वह बचा कर रखना चाहता है। स्त्री के पास बहुत कुछ है जिसे वह भी बचा कर रखना चाहती है। पर प्रश्न यह है कि दोनों क्या बचाएँ और क्या छोड़ें? स्त्री को परिवार चाहिए लेकिन उसे वैसा परिवार नहीं चाहिए जैसे उसे दिया गया है। जैसा आज है। सौंदर्य की अनुभूति की अभिव्यक्ति में कुछ ऐसी चीजें हैं जिन पर बात करना मना है, जैसे कि यौनिकता, शुद्धता। यदि इस पर वह बोलती है तो अशुद्धता में लिपटा हुआ कहा जा सकता है। वह सभ्यता की इन चुप्पियों को तोड़ती है। अनुभव तो व्यक्तिगत होता है पर संरचना में व्यक्तिगत और सामाजिक का अंतर मिट जाता है। अनुभव कितना ही निजी क्यों न हो, पाठक उसे समेट लेता है। भाषा के संदर्भ में भी एक-दो बात कहना चाहूंगी। हम अपने सांस्कृतिक रूपकों और प्रतीकों की गहराई में नहीं जा रहे हैं। अर्धनारीश्वर और शक्तिरूपा स्त्री के जो पुराने वृतांत है हम उसके गहराई में नहीं जाते हैं, बल्कि पश्चिम से आये एडम और इवा के बिम्ब के रूपक में सोचते हैं। भारत का सांस्कृतिक संदर्भ आदम और इवा का नहीं अर्धनारीश्वर का है, इसे हमें समझना चाहिए। यहाँ स्त्री काँख की एक पसली नहीं है, आधा हिस्सा है। दूसरी बात भाषा में उपमानों को लेकर है। उपमान के द्वारा उपमेय का अवमूल्यन होता है। जब आप भाषा के साथ इस तरह का व्यवहार करते हैं कि यह अच्छी है सुंदर है और इसके आगे कुछ नहीं सोचते तो दिक़्क़त होती है। इस पर ध्यान देना चाहिए। इस बीच इब्बार रब्बी की एक कविता किसी ने फ़ेसबुक पर लगाई. जिसकी समीक्षा एक महिला ने किया और उसने दिखाया कि इस कविता में स्त्री को वस्तु से रूपायित किया गया है। इसमें वही उपनाम वाली बात हटा के तर्क दिया गया है कि उपमेय उपमान को वस्तु में बदलता है। इसी भाषा में सविता सिंह ने शमशेर की कविता की समीक्षा की है। मैंने उनसे भी कहा कि यह ठीक नहीं। अब बात यह उठती है कि आज कविता को कविता की तरह पढ़ा जाए या विमर्श की तरह?
यह कहा जाना गलत है कि स्त्रियों की कोई भाषा नहीं होती। रेख़ती, जिसे पुरुष रेख़ता कहते है स्त्रियों की भाषा है। दो शब्द हैं---स्त्री-भाषा और स्त्री की भाषा। इन दोनों शब्दों में अंतर है। जब आप कहते हैं कि स्त्री की भाषा तो यह कह रहे होते हैं जो वह बोलती है पर जब आप स्त्री-भाषा कह रहे हैं तो इसका मतलब जिसमें वह अपने को अभिव्यक्त करने में सक्षम हो पाती है। दोनों में सूक्ष्म पर महत्त्वपूर्ण अंतर है। स्त्री और पुरुष की भाषा अलग-अलग नहीं है। जब आप कविता-उपन्यास लिखते हैं तो वह स्त्री-भाषा है। और आलोचना की भाषा पुरुष भाषा है। रवीन्द्र के. दास की भाषा स्त्री-भाषा है और अर्चना वर्मा की भाषा पुरुष भाषा है। रचनाकार प्रमोद कुमार ने स्त्री-भाषा और स्त्री की भाषा में सूक्ष्म अंतर बताने के लिए अर्चना जी को धन्यवाद दिया पर इब्बार रब्बी की कविता की आलोचना पर अर्चना जी से असहमति भी जाहिर किया।
युवा कवि शंभु यादव ने बहुत विस्तृत रूप से स्त्रीवाद और सौन्दर्य-बोध पर कई प्रश्न उठाए। उनहोंने रवीन्द्र के. दास की कविता ‘मुखौटा जो चेहरे से चिपक गया है’ की मुखाल्फ़त की और उसकी भाषा को ‘मेल डिस्टोर्टेड’ भाषा कहा। उन्होने बड़े आवेग में बोलते हुए कहा कि रवीन्द्र के. दास की कविताओं में स्त्री उनकी मनोरचना से बाहर की स्त्री नहीं है। अर्थात् उनहोंने विभास वर्मा की बात को उलट दिया। जहाँ विभास वर्मा यह कह रहे थे कि रवीन्द्र जी के यहाँ स्त्री सबजेक्ट के रूप में है वहीं शंभु यादव ने इसे नकार दिया।
सुपरिचित लेखक बली सिंह ने स्त्री और प्रकृति के सम्बन्धों पर कई महत्त्वपूर्ण बातें कहीं। नदी और मनुष्य-- इन दो शब्दों पर बल देते हुए स्पष्ट किया कि नदी यानी प्रकृति स्त्री है तो मनुष्य पुरुष और इस तरह कविताओं को पर्यावरणमूलक स्त्रीवाद [इको-फेमिनिज्म] से जोड़ दिया। उन्होंने रवीन्द्र के. दास की कविताओं में सूक्ष्म व्यंग्य होने की बात कही और कहा कि इनकी कविताएं स्त्री के पुरुष दृष्टि पर सवाल उठाती हैं। अर्चना वर्मा की बातों से आशीष मिश्र और कई लोगों ने अपनी असहमति व्यक्त की पर इसका जवाब न मिल सका। हम आशा करते हैं कि आगे फ़िर इस विषय पर बात होगी।
युवा रचनाकार सुशील कुमार मानस ने कहा रवीन्द्र जी की कवितायें आधुनिक समय में लिखी गई, आज के संदर्भ की कविताएं हैं। इन कविताओं में प्रयुक्त पुराने बिंबों को उनके पारंपरिक अर्थों से मुक्त करके देखना होगा। पारंपरिक स्त्री बिंब सर्वथा स्त्री विरोधी माने जाने वाले गुणों से युक्त हैं, फिर चाहे वो नदी हो, पृथ्वी हो, पंछी हो या और कुछ। जहाँ गतिशीलता व मुक्ति स्त्री विरोधी गुण माने जाते रहे हैं, वहीं नदी सतत् प्रवाहमय एवं पृथ्वी निरंतर गतिशील है। जबकि पुरुष स्वच्छंद व स्वतंत्र माना जाता है परंतु पुरुष बिंब-- पहाड़, समुद्र आदि जड़ता के प्रतीक हैं। पूँजीवाद का बढ़ता दायरा, विकास में विज्ञान का अभूतपूर्व योगदान एवं वैज्ञानिक चेतना का एक दृष्टिकोण बन जाना तथा सूचना एवं तकनीकि की उन्नति ने शब्दों के अर्थ बदल दिये हैं या यूं कहें कि नये अर्थ दे दिये हैं। अर्चना वर्मा जी ने भाषा के संदर्भ में बात कही है, जिससे अक्षरशः सहमत हूँ। पर, मेरा मानना है कि, भाषा का उद्भव स्त्री-पुरुष के साझा उपक्रम का परिणाम है।
सुपरिचित कवि मायामृग ने उपसंहार करते हुए कहा कि परिवार में लोकतांत्रिक संबंधों की ज़रूरत स्‍त्रीवादी सौंदर्य के प्रतिमान अभी विकसित हो रहे हैं। स्‍त्री-भाषा के सवाल पर कहा कि भाषा कभी निरपेक्ष नहीं हेाती विचार और भाषा परस्‍पर आश्रित हैं इसलिए विचार का विकास भाषा के विकास से जुड़ा है। स्‍त्री-विचार अभी हमारे भीतर तक नहीं गया है इसीलिए स्‍त्री-भाषा पर भी विमर्श अभी विकसित होने की प्रक्रिया में ही है। स्‍त्री-कविता के तीन रूप मुख्‍य रूप से देखने में आ रहे हैं--- स्‍त्री के लिए, कविता स्‍त्री के बारे में, कविता स्‍त्री की कविता -- स्‍त्री की कविता कम लिखी जा रही है, अधिकतर स्‍त्री के बारे में या स्‍त्री के लिए नसीहतों की कविता ही दिखती है। दास जी की कविताएं एक पारिवारिक पुरुष की दृष्टि से स्‍त्री-मुक्ति के प्रश्‍न पर विचार करती हैं। छद्म आंदोलनों और उनके अगुआओं पर सवाल भी करती हैं। हालांकि इन कविताओं में भी स्‍त्रीवादी सौंदर्य विमर्श की दृष्टि से अधिक एक पुरुष का नजरिया ही अधिक नजर आता है। इन कविताओं पर और अधिक विस्‍तार से बात किए जाने की जरूरत है। जो पुस्‍तक पाठक और विद्वतजनों के बीच सवाल उठाती है, वह सफल पुस्‍तक कही जानी चाहिए।



प्रस्तुति - ईरेन्द्र बबुअवा
 

गुरुवार, 28 मई 2015

पटना से बनारस - अजय कुमार

हम निकले थे विभूति एक्सप्रेस पकड़ने. स्टेशन पहुंचा तो पंजाब मेल के आने की खबर हो रही थी. टिकट कटाया और भागते-भुगते चार नंबर प्लेटफार्म पहुंच गया. अभी सुस्ताने के लिए नजर कोई जगह ढूंढ ही रही थी कि पंजाब मेल की लाइट दिखी. मन में आया, चलो, सुबह तीन बजे जगना शुभ-शुभ रहा. अच्छे दिन की शुरुआत की तरह. पौने चार के आसपास हम स्टेशन पर थे.
26 मई का दिन बहुत सारे लोगों को बहुत सारी वजहों से याद रह सकता है. पर मेरे लिए बनारस पहुंचना जरूरी था और उसके याद रखने की वजह निजी थी.
हम एस टू में सवार हो गये. पूरा डिब्बा बंगाली परिवारों से भरा था. ज्यादातर लोग जगते हुए भी सो रहे थे. उनके भाव ऐसे थे कि रिजव्रेशन का एक-एक पाई वसूल लेना है. किसी भी सीट पर एक बित्ता जगह नहीं ताकि उसमें कोई अपना आधार एडजस्ट कर सके. बर्थ पर लेटे लोग कनखियों से आने-जाने वाले को देखते. वहां से किसी के सरकने पर शरीर में हलचल होने लगती. किसी के खड़े रहने पर शरीर निढ़ाल. टांगे पूरी तरह पसरी हुई. जब संवाद नहीं तो बैठने का आग्रह कैसे होगा?
लुधियाना जा रहे दो मजदूरों के बीच हमने अपनी जगह बनायी.
आरा स्टेशन पहुंचते तो एक सफेद बालों वाले दादा ने कहा- आमी ट्रॉली देखबे ना? उन्होंने जागती हुई अपनी बीवी को उठाया. ट्राली के बारे में पूछा. महिला ने नीचे झांका. ताला और जंजीर हाथ में आ गया. ट्रॉली गायब थी. ओ रे बाबा.. सब गंडेगोल हो चै. बात पसरते देर न लगी. दादा उदास. उनकी बीवी परेशान. दूसरे परिवारों के लोगों का आना शुरू हो गया. क्या था? कोई कीमती सामान तो नही था? पैसा तो नहीं था. दादा रूआंसे होकर सबको बताते- गर्म कपड़े थे. जम्मू-कश्मीर में पहनने के वास्ते रखे हुए थे. एक एटीएम कार्ड भी था. एटीएम सुनते ही सजेशन आने शुरू हो गये. किसी ने कहा-उसे लॉक कराना जरूरी है. कॉल सेंटर पर फोन करिए. अफरातफरी में फोन लगे ही नहीं. दादा ने कोलकाता फोन किया. अपने किसी परिचित को हादसे की जानकारी दी. गाड़ी बढ़ी तो सहानुभूति भी आने लगी. किसी ने कहा- ज्यादा चिंता करने का जरूरत नहीं. लुधियाना में हमलोग सामान खरीद लेंगे.
उदासी, चिंता के बीच जीआरपी के दो जवानों पर नजर पड़ते ही, दादा चीख पड़े- इहे बेओस्था है आपलोगों का? देखिए तो मेरा ट्रॉली चोरी हो गया? एक जवान बोला- चोरी? आप कैसे कह रहे हैं कि सामान चोरी हो गया? कहां हुआ है चोरी? पटना से गाड़ी खुली तो ट्रॉली गायब थी. दूसरे जवान ने कहा-आप ठीक-ठीक याद कर बताइए कि सामान कहां गयाब हुआ? दादा बोले- पटना के बाद. पहले जवान ने कहा- हो ही नहीं सकता. पटना में हमलोग चढ़े हैं. सामान की चोरी पटना से पहले हुई होगी. आप याद करिए. सामान पर अंतिम बार कब नजर पड़ी थी. दादा ने बताया- पटना से पहले. दूसरे जवान ने कहा- वही तो हम भी कह रहे हैं कि सामान की चोरी पटना से पहले हुई है. पहले ने कहा- देखिए कंप्लेन लिखाना चाहते हैं तो दे दीजिए. लेकिन ठीक-ठीक लिखिएगा कि सामान गायब कहां हुआ? दादा कंफ्यूूज्ड. उनकी बीवी अलग परेशान? वह कहने लगीं- चितरंजन में दो जन आकर यहां नीचे ही सो गया. बोलने लगा-हम स्टाफ के आदमी है. लगता है, उन्हीं लोगों ने यह सब कर दिया. बात चोरी वाली जगह पर टिकी थी. दूसरे बंगाली परिवारों ने जोड़-घटाव शुरू कर दिया. जीआरपी के दोनों जवान चोरी के खोज स्थान की तलाश कर रहे लोगों को छोड़कर चुपचाप निकल गये. कंप्लेन दर्ज कराने की याद कहां रही किसी को?
समय निकल रहा था. असामान्य हालात कुछ सामान्य होने लगे थे. लोग नाश्ता लेने लगे. गरम चाय भी आ रही थी. बीच-बीच में ट्रॉली की याद आते ही दादा चीख पड़ते- इसको क्या पड़ी थी जे सामान को ट्रॉली में रख दिया. महिला सहम जाती.
साढ़े नौ बजे हम मुगलसराय स्टेशन पहुंच गये. अब आधा-पौन घंटे का सफर बाकी था. दूसरे प्लेटफार्म पर सारनाथ आकर लगी. तीसरे पर पीछे से विभूति एक्सप्रेस. चौथे पर टाटा-अमृतसर. ठहराव की समय सीमा खत्म होने के बाद सवाल था कि अब यहां से कौन गाड़ी पहले निकलेगी? पंजाब, सारनाथ, टाटा-अमृतसर या विभूति? सवा दस बजे सारनाथ सरकी. हमारा इरादा डोला. लेकिन पल भर में तय किया कि ऐसा करना ठीक नहीं रहेगा. आगे जाकर यह गाड़ी शंट हो गयी तो? हमने वहीं रहना मुनासिब समझा. यात्रियों की सुविधा के लिए कोई उद्घोषणा नहीं. कौन गाड़ी, पहले खुलेगी, यह पहाड़ जैसा सवाल था. हमारे सामने गाड़ी तीन थी. विकल्प एक. जो पहले खुले उसी में लपक लेना है. बहुत सारे पैसेंजर इसी आधार पर अपनी आगे की यात्र निर्धारित कर रहे थे. करीब ग्यारह बजे पंजाब मेल को सिग्नल मिल गया. काफी सुस्ताने के बाद पंजाब ने जोरदार सिटी बजायी. हम उस पर सवार हो लिये. गाड़ी खुल गयी. लेकिन यह क्या? कुछ दूरी बढ़ने के बाद ही वह रुक गयी. अब बढ़ेगी-अब बढ़ेगी की उम्मीद में थे कि टाटा-अमृतसर दूसरी पटरी पर आकर खड़ी हो गयी.
गाड़ी के टोटे सूख गये थे. हलक सुखाने भर भी मेरे बोलत में पानी नहीं बचा था. इसी बीच छोटे-छोटे बच्चे पानी का करोबार करने पहुंच गये. वे बगल के गांव के थे. पुराने बोतल में चापाकल का पानी. रेट बीस रोपेया. किसी ने मोल-मोलाई कर दस में लिया तो किसी ने 12 में. बनारस जाने वाले एक लोकल पैसेंजर हवाई अपशब्द की बौछार करने लगते. उन्हें ऑफिस पकड़ना था. डिब्बे में कुछ पंखे चल रहे थे. कई लोग नहीं चलते पंखों को देखकर भुनभुना रहे थे. किसी ने बुलेट ट्रेन का जिक्र कर दिया. कई लोग उस पर टूट पड़े.
संयोग अच्छा था. वहां से भी पंजाब मेल ही खुली. आगे सारनाथ शंट पड़ी थी. हमें अपने फैसले पर सुख हुआ. पौने एक के आसपास हम बनारस में थे. स्टेशन से निकले. अहसास हुआ कि उपाय न हुआ तो शरीर पर निजर्लीकरण का खतरा बढ़ेगा. पता नहीं, सिस्टम निर्लजीकरण की ओर तो नहीं बढ़ रहा है? हम लस्सी वाले की ओर बढ़े. बड़े से कुल्हड में लस्सी ली. हलक में उतरते ही जान आयी. हम मोहनसराय वाली बस में बैठ गये.