हमारे कारवॉं को मंजिलों का इंतजार है , ये आंधियों , ये बिजलियों की पीठ पर सवार है , तू आ कदम मिला के चल , चलेंगे एक साथ हम , अगर कहीं है स्‍वर्ग तो उतार ला जमीन पर , तू जिन्‍दा है तो जिन्‍दगी की जीत में यकीन कर - शैलेंद्र


बृहस्पतिवार, 9 मई 2013

सर्जन वह है जिसमें तुम अपना सब कुछ करते हो उत्सर्ग - बरीस पास्‍तरनाक



उचित नहीं है शोहरत पा लेना ।
समारोहित होना प्रशंसा की बात नहीं ।
ज़रूरत नहीं है अपनी रचनाओं को कोषगत कर रखने की
और न ज़रूरत है रखने की उन्हें मेहराबी गर्भगृहों में ।
 
सर्जन वह है जिसमें तुम अपना सब कुछ करते हो उत्सर्ग
शोर व सरापा ठीक नहीं और न छा जाना दूसरों पर ग्रहण बनकर ही
तुम्हारे होने का जब कोई अर्थ नहीं लगता
तब कितनी लज्जाजनक है चर्चा हर व्यक्ति के अधरों पर ।

चेष्टा मत करो झूठे अधिकार वाली ज़िंदगी के लिए
बल्कि अपने कार्य-कलापों को ऐसे ढालो
कि दूर-दूर की सीमाओं तक तुम्हें प्यार मिले
और सुन सको तुम आनेवालों वर्षों में होने वाली अपनी चर्चा ।

जीवन में रिक्तता रखो, रचनाओं में नहीं
और अपने अस्तित्त्व और अपनी होनी के
सम्पूर्ण अध्याय को, सम्पूर्ण खंड को
रेखांकित कर रखने में मत हिचकिचाओ ।

अवकाश ग्रहण कर अनदेखे में
कोशिश करो प्रच्छन्न रखने की अपने विकास को
जैसे तड़के सुबह, शिशिर की कुहेलिका छ्पा कर रखती है
अपने अंक में सपनाते ग्रामांचल को ।

तुम्हारे जीवंत चरण-चिह्नों पर
दूसरे जाएँगे क़दम-ब-क़दम चलकर
किंतु अपनी पराजय से स्वयं तुम
अपनी विजय अलग मत दरसाओ ।

और एक क्षण के लिए कभी भी अपने जज़्बात को
मत छलो और न बहाना ही करो छलने का ।
किंतु ज़िंदा रहो यही असलियत है
जीवंत रहो, जीवंत और तपित रहो अंत तक ।
अँग्रेज़ी भाषा से अनुवाद : अनुरंजन प्रसाद सिंह

बुधवार, 8 मई 2013

लोहिया और रंगीन समाजों की अवरुद्ध क्रांतियाँ - कुमार मुकुल


नवंबर 1958 में मैनकाइंड में छपे अपने आलेख 'राष्ट्रपति नासर का राजनैतिक दर्शन' में लोहिया ने मिस्र की क्रांति के बहाने, क्रांति के विभिन्न आयामों पर विस्तार से विचार किया है। नासर का ख्याल था कि व्यक्तियों और वर्गों के संघर्ष से दूर रहकर जनता के दिलों से ली गई शक्ति के सहारे देश की सेना, जिसके पास पर्याप्त भौतिक संसाधन हों, क्रांति का सूत्रपात कर सकती है।

          यहाँ लोहिया सवाल करते हैं कि क्या सेना को एकमात्र शक्ति मानने वाले नासर सही हैं या पार्टी को एकमात्र ताकत मानने वाले माओ सही हैं या रंगीन जातियों के वे संत व राजनेता सही हैं जो खुद को ऐसे तर्क-वितर्क से परे रखना चाहते हैं। इन सबको लोहिया अस्थायी व गलत समाधान बताते हैं। लोहिया को लगता है कि रंगीन जातियों जब तक अपनी बीमारी को नहीं पहचानती, जो कमोबेश गोरी जातियों की भी बीमारी है, तब तक उनकी क्रांतियाँ ऐसी ही अवरुद्ध होती रहेंगी जैसे राजनैतिक और सामाजिक क्रांतियों के दो पाटों के बीच फंसकर रूसी क्रांति अवरुद्ध हुई या भारतीय क्रांति अवरुद्ध हुई।
          नासर का तर्क है कि राजनैतिक और सामाजिक क्षेत्र में एक साथ क्रांति से मिस्र में अभूतपूर्व बदलाव संभव हुआ। लोहिया यहाँ अमरीका, फ्रांस और चीन का उदाहरण देते हैं जहाँ दोनों क्रांतियाँ एक साथ हुईं, कि मिस्र कोई अनोखा उदाहरण नहीं है? रूसी और भारतीय क्रांति के अवरुद्ध होने को लोहिया क्रांति की स्थायी विफलता नहीं मानते हैं। लोहिया सोचते हैं कि अगर इन क्रांतियों की अस्थायी अवरुद्धता के कारणों का रंगीन समाजों को बोध हो तो मानव-जाति के नए युग का आरंभ हो जाएगा।
          नासिर द्वारा सेना की भूमिका को रेखांकित किए जाने के संदर्भ में लोहिया देखते हैं कि अफ्रीकी-एशियाई देशों में सैनिक या अन्य किस्म की तानाशाहियाँ लोकप्रिय होती जा रही हैं। काहिरा से जकार्ता और पीकिंग तक की कई मिसाले हैं और पाकिस्तान इसकी हालिया मिसाल है। पीकिंग के पार्टी आधारित समाधान और काहिरा के सेना आधारित समाधान में वे परिणाम की भिन्नता पाते हैं पर उनका मानना है कि दोनों की भावना एक है।
          सेना के शासन या अन्य तानाशाहियों के भीतर हो रहे चुनावों की भूमिका पर भी वे विचार करते हैं, ''चुनाव निश्चय ही महत्त्वपूर्ण होते हैं खासकर अगर विचार और संगठन की स्वतंत्रता और आलोचना की योजना का हिस्सा होते हैं।'' पर जिस तरह, स्टालिन के रूस और हिटलर के जर्मनी में चुनावों को वे नियंत्रित देखते हैं, वहां वे उसे प्रायहीन पाते हैं। एशियायी मुल्कों की इस प्रवृत्ति पर भी वे ध्यान दिलाते हैं जब जनता के स्वतंत्र सोचने की क्षमता क्षीण हो जाती है और निर्णय की अपनी जिम्मेदारी वह किसी एक नेता, पार्टी या सेना को सौंप देती है। भारत में इंदिरा गांधी को चुनाव द्वारा सौंपी गई ताकत और आगे, उसके तानाशाही में बदलने की घटनाओं को हम इसके उदाहरण के रूप में देख सकते हैं। लोहिया भविष्य के गर्भ में छिपी इन घटनाओं का आकलन पहले ही कर चुके थे, वे 1958 में ही लिख रहे थे, ''जिन क्षेत्रों में जनता ने अभी निर्णायक जिम्मेदारी किसी नेता, सेना आदि को सौंपने की संवैधानिक व्यवस्था नहीं की है, जैसे भारत में, वहां पर प्रक्रिया चलने लगी है।'' ऐसी स्थिति में सेना की बजाय पार्टी को जनता द्वारा मिली ताकत को वे ज्यादा स्थायी मानते हैं क्योंकि उसका जनता के मन पर एक हद तक विचारधारात्मक प्रभाव पड़ता है। पाक की सैनिक तानाशाहियों और इंदिरा की तानाशाही के काल की तुलना हम यहाँ कर सकते हैं। इन दोनों ही स्थितियों में विवेक की शक्ति का क्षय होता वे साफ देखते हैं।
          भारत में विनोबा भावे जैसे संत राजनेताओं की दल विहीन राजनीति की संकल्पना के खतरों की ओर भी वे ध्यान दिलाते हैं। वे देखते हैं कि विनोबा की ऐसी बहसों से नेहरू आदि को एक आड़ मिलती है। जिसका उपयोग वे पार्टी के मतभेदों, आलोचना आदि को सीमित करने की चालें चलते हैं। यहाँ तक कि तत्कालीन राष्ट्रपति भी इसका लाभ ले वयस्क मताधिकार की उपयोगिता पर संदेह व्यक्त करते हैं। ऐसा करते हुए निरक्षरता और गरीबी का तर्क देते हैं।
          दलविहीनता के खतरे की ओर इशारा करते लोहिया बतलाते हैं कि, ''पार्टियों के न रहने पर शिक्षित और शिष्ट व्यवहार वाले लोग ही चुने जाएँगे, दूसरे शब्दों में यथास्थिति के पोषक लोग, निरक्षर लोग, नाराज और शोर मचाने वाले लोग अधिकाधिक बाहर हो जाएँगे। किंतु यही तत्व रंगीन मानव-जातियों का सबसे अधिक प्रतिनिधित्व करते हैं। वयस्क मताधिकार ने इन लोशो को बीच में लाया है। दलविहीन राजनीति या परोक्ष चुनाव का उद्देश्य इन लोगों को बाहर रखना है।''
          यूं पार्टी प्रणाली जैसे टाइप्ड होती जा रही है वह भी पूरी दुनिया में विफल होती जा रही है। गोरी जातियों के लिए उसने एक नए राजनैतिक कर्म के समान हो गई है जो अपने प्रति अतिरिक्त निष्ठा के आधार पर पहचान देती है। लोहिया इससे परेशान थे कि राजनैतिक पार्टियों का इस्तेमाल बेशर्मी से अपने व्यक्ति-उत्थान के लिए हो रहा है। ''ये व्यक्ति को सुविधा भी देती हैं और प्रतिष्ठा भी और अकसर उसी अनुपात में जितना वह कमीना होता है।'' हालांकि लोहिया आशा नहीं छोड़ते और ऐसे सच्चे संत नेता की प्रतीक्षा करने की सलाह देते हैं—''जो ऐसी पार्टी बनाएगा जो कभी भी सरकार में नहीं आएगी, लेकिन हमेशा अन्याय से लड़ेगी...।''
          इस दूरारूढ कल्पना के बाद लोहिया फिर इस सवाल  पर आते हैं कि आखिर रंगीन समाज के लोग क्यों सेना या पार्टी की तानाशाही से आशा कर बैठते हैं। इसकी तह में जाते हुए वे पाते हैं कि गोरे समाजों के मुकाबले रंगीन समाज एक रुका हुआ समाज है जिसने अपनी आबादी बढ़ाई पर उसकी आय में कमी होती गई है। सैकड़ों सालों से वह गुलाम रहा और अब जबकि वह आजाद हो रहा है तो गोरे समाजों की बराबरी करना चाहता है। कमजोर साधनों के आधार पर गोरों की नकल कर आधुनिक बनने की उसकी चाह ही तानाशाही समाधानों में अपनी कामना की पूर्ति के स्वप्न देखती है।
          यहाँ वे एक और बड़ी गड़बड़ी की ओर ध्यान दिलाना चाहते हैं। वह यह कि एकरूपता समानता नहीं होती। किसी के समान दीखने से ही वह उसके समान नहीं हो जाता। वे लिखते हैं, ''रंगीन आदमी में एकरूपता और समानता को एक ही समझने की कमजोरी है, क्योंकि उसने गोरी जाति की शक्ति और उसकी सुख-सुविधाओं को देखा है। वह सोचता है गोरों की नकल करने से उसमें भी वही ताकत आ जाएगी और उसे भी आधुनिक सुविधाएं मिल जाएँगी।''
          इस गड़बड़ी को हम भारत की दलित और अगड़ी जातियों के संदर्भ में भी देखते हैं। कभी वे जनेऊ धारण करने का आंदोलन चलाते हैं कभी सिंह टाइटल को लगाकर खुद को अगड़ा बनाना चाहते हैं पर उनकी तरह दिखने से जरूरी है अपना आत्मविश्वास कायम करना और अपने मानदंड रचना जो नकल से नहीं होगा।
          लोहिया देखते हैं कि आधुनिकीकरण के पीछे पागल रंगीन समाज का आदमी जब सत्तासीन होता है तब ''उत्पादन और उपभोग का आधुनिकीकरण राज्य की नीति का मुख्य ध्रुवतारा बन जाता है।'' इस नीति से जो गंभीर तनाव व दबाव पैदा होता है वह उन्हें तानाशाही की ओर ले जाता है।
          इस तनाव और तानाशाही की ओर रंगीन जातियों के झुकाव के काणों को तलाशते हुए लोहिया देखते हैं कि उत्पादन और उपभोग के आधुनिकीकरण के लिए जो पूँजी चाहिए वह रंगीन देशों की पहुँच के बाहर है, गोरे देश चाहें भी तो इसमें हमारी मदद नहीं कर सकते। यहाँ एक बड़ा संकट आबादी का बढऩा भी है। गोरों की आबादी भी उसी तेजी से बढ़ी है पर उसके उत्पादन साधनों का विकास भी उसी तेजी से हो रहा है जो रंगीन जातियों के यहाँ नहीं होता। ऐसे में रंगीन राष्ट्र एक रास्ता निकालते हैं। वह टुकड़ों में आधुनिकीकरण करना चाहते हैं, देश को कई क्षेत्रों में बांट वह उनका कई चरणों में विकास की कोशिश करता है। इससे काफी तनाव पैदा होता है। तब जिन क्षेत्रों का विकास हो जाता है या जो माडल बन जाते हैं वे बाकी पिछड़े तबकों के लिए तनाव का कारण बन जाता है फिर जो शीतयुद्ध आरंभ होता है वह रंगीन देशों को सेना या पार्टी की तानाशाही की ओर ले जाता है।
          यहाँ फिर लोहिया को साम्यवादी सरकारें एक बेहतर उदाहरण के रूप में याद आती हैं जिन्होंने इस समस्या को 'बेहतर ढंग से समझा है...।' क्योंकि उन्होंने उत्पादन और उपभोग के आधुनिकीकरण को अलग-अलग रखा है। वे बताते हैं कि चीन के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री का खर्चा भारतीय राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री से करीब बीस गुना कम होगा। वे लिखते हैं—''वे सारी जनता के लिए, मानक निर्धारित करते हैं। साम्यवादी नेताओं का स्तर सादगी का होता है, शायद त्याग का भी जबकि गैर-साम्यवादी नेताओं का स्तर गोरों की नकल के अनुसार होता है।'' यहाँ हम दिनकर की पंक्तियाँ याद कर सकते हैं—''बेलगाम अगर रहा भोग, निश्चय संहार मचेगा...।'' आज भी हम लोहिया और दिनकर के सवालों के आलोक में नेताओं के बेलगाम भोग और गरीब अन्नदाताओं की आत्महत्या के आंकड़ों को सामने रख झंझट के कारकों को पहचान सकते हैं, और यह सब गांधी के देश में होता है। हद यह है कि इसी टुकड़े विकास की तर्ज पर मॉडल कहला रहे गुजरात का मुख्यमंत्री अब गांधी की तस्वीरों का भी उपयोग अपनी छवि सुधारने में करते हुए जरा नहीं शर्माता।
          बड़ी आबादी और साधनों की कमी के हिसाब से लोहिया आधुनिकीकरण के किसी अन्य प्रकार पर विचार करने को कहते हैं। प्रतियोगिता को मूल संभव तो वहां सोच-समझकर छोटी मशीनों और जहाँ जरूरी हों वहां भारी उद्योगों की नीति अपनानी चाहिए। इसे लोहिया रंगीन देशों के आधुनिकीकरण का एकमात्र, जरूरी रास्ता बतलाते हैं।
          रंगीन आदमी क्रूर, तानाशाह नेतृत्व को क्यों स्वीकारता है, के जवाब वे कहते हैं कि—''इसलिए कि वह नेतृत्व उसे आधुनिक लगता है। वह उम्मीद करता है कि क्रूर नेतृत्व किसी समय उसे आधुनिक बना देगा।'' यहाँ उनका निष्कर्ष बहुत स्पष्ट है—''जब रंगीन जनता आधुनिकीकरण के सही आयामों को भलीभाँति ग्रहण करेगी तभी वह इस नेतृत्व को उखाड़ फेंकेगी जो बहुत धोखेबाज है और अपने को तथा अपने आसपास के लोगों को आधुनिक बनाता है। जनता को नहीं या जो मानव के रूप में भारी कीमत चुकाकर यूरोप की नकल करता है।''
          इस तरह रंगीन देशों की क्रांति के अवरोधों की सही पहचान करते हैं लोहिया—''जब क्रांति वास्तव में हुई हो या होने को हो तो बुद्धिजीवी अपव्यय को तथा शासक वर्गों की विलासिता को देखने लगते हैं जो तब तक उन्हें आधुनिकीकरण लगता रहा। च्याँग का चीन सारे रंगीन विश्व में दिखाई देगा।''
कुमार मुकुल की प्रभात प्रकाशन से आयी पुस्‍तक 'डॉ.लोहिया और उनका जीवन दर्शन ' से

मंगलवार, 7 मई 2013

खून फिर खून है ...साहिर लुधियानवी


ज़ुल्म फिर ज़ुल्म है, बढता है तो मिट जाता है
खून फिर खून है, टपकेगा तो जम जायेगा

खाक-ए-सेहरा पे जमे या कफ़-ए-कातिल पे जमे
फ़रक-ए-इन्साफ़ पे या पा-ए-सलासल पे जमे
तेघ-ए-बेदाद पे या लाश-ए-बिस्मिल पे जमे
खून फिर खून है टपकेगा तो जम जायेगा

लाख बैठे कोइ छुप छुप के कमीन गाहों में
खून खुद देता है जल्लादों के मसकन का सुराग
साजिशें लाख उढ़ाती रहें ज़ुलमत का नकाब
ले के हर बूंद निकलती है हथेली पे चराग

ज़ुल्म की किस्‍मत-ए-नाकारा-ओ-रुस्वा से कहो
जब्र की हिकमत-ए-पुरकार के ईमा से कहो
मेहमल-ए-मजलिस-ए-अकवाम की लैला से कहो
खून दीवाना है, दामन पे लपक सकता है
शोला-ए-तुंद है, खिरमन पे लपक सकता है

तुम ने जिस खून को मकतल में दबाना चाहा
आज वो कुचा-ओ-बज़ार में आ निकला है
कहीं शोला कहीं नारा कहीं पत्थर बन के
खून चलता है तो रुकता नहीं सन्गीनों से
सर जो उठता है तो दबता नहीं आईनों से

ज़ुल्म की बात ही क्या, ज़ुल्म की औकात ही क्या
ज़ुल्म बस ज़ुल्म है, आगाज़ से अंजाम तलक
खून फिर खून है, सो शक्ल बदल सकता है
ऐसी शक्लें के मिटाओ तो मिटाये ना बने
ऐसे शोले के बुझाओ तो बुझाये ना बने
ऐसे नारे के दबाओ तो दबाये ना बने

रविवार, 20 जनवरी 2013

कवि-कथाकार महाप्रकाश जी को जन संस्कृति मंच की ओर से श्रद्धांजलि


मैथिली की प्रगतिशील धारा के चर्चित कवि और कथाकार महाप्रकाश जी 19 जनवरी को हमारे बीच नहीं रहे। दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में उनका फेफड़े और किडनी में संक्रमण का इलाज चल रहा था, वहीं उन्होंने आखिरी सांसें ली।
सहरसा (बिहार) के बनगांव में 14 जुलाई 1949 को महाप्रकाश जी का जन्म हुआ था। 1968-69 से उन्होंने लेखन की शुरुआत की थी। 1972 में प्रकाशित उनके काव्य संग्रह ‘कविता संभवा’ की काफी चर्चा हुई थी। यात्री और राजकमल चैधरी के बाद वे मैथिली की प्रगतिशील धारा के अत्यंत महत्वपूर्ण कवि थे। हाल में ही अंतिका प्रकाशन से उनका दूसरा कविता संग्रह ‘समय के संग’ प्रकाशित हुआ था। चांद, अंतिम प्रहर में, इश्तिहार, बोध, हिंसा, जूता हमर माथ प सवार अइछ, पंद्रह अगस्त, शांतिक स्वरूप आदि उनकी महत्वपूर्ण कविताएं हैं। महाप्रकाश जी ने कहानियां भी खूब लिखीं, लेकिन उनका कोई गंभीर मूल्यांकन नहीं हुआ है। ध्वंस, दीवाल, खाली हौसला, अदृश्य त्रिभुज, बिस्कुट, पाखंड पर्व आदि उनकी चर्चित कहानियां हैं। ‘पाखंड पर्व’ में उन्होंने कुलीन मैथिली समाज की जनविरोधी प्रवृत्तियों की आलोचना की है। उनकी कविताओं और कहानियों का अनुवाद हिंदी और बांग्ला में भी हुआ। महाप्रकाश जी ने अनुवाद का काम भी किया। मैथिली उपन्यासकार ललित के उपन्यास ‘पृथ्वीपुत्र’ का उनके द्वारा किया गया अनुवाद विपक्ष पत्रिका के विशेषांक में प्रकाशित हुआ था। उनकी रचनाओं में मिथिला का व्यापक जीवन नजर आता है। पूंजीवाद के खिलाफ अपनी रचनाओं में वे निरंतर मुखर रहे।
युवा पीढ़ी के रचनाकार महाप्रकाश जी के जबर्दस्त प्रशंसक रहे। उन्होंने कई नए रचनाकारों को गढ़ने में अहम भूमिका निभाई। वे बहुत अच्छे वक्ता थे। गप्पें करना, संगीत सुनना और आत्मकथा पढ़ना उन्हें खासतौर से पसंद था। वे बेहद स्वाभिमानी और संवेदनशील थे। इस स्वाभिमान ने ही उन्हें जनसामान्य सा जीवन चुनने में मदद की और संवेदनशीलता ने प्रगतिशील विचारधारा के प्रति प्रतिबद्ध बनाया। युवा कवि राजेश कमल के अनुसार वे अक्सर दुनिया जहान में घट रही घटनाओं को लेकर फोन करते थे और बताते कि क्या गलत है और क्या सही है। फोन पर वे अपनी कविता या कहानी के बारे में बात लगभग नहीं करते थे।
महाप्रकाश जी के शव को 19 जनवरी को शाम में लोधी रोड, नई दिल्ली के विद्युत शवदाहगृह में अग्नि के हवाले किया गया। इस मौके पर उनके बेटों और करीबी परिजनों के साथ कहानीकार गौरीनाथ, आलोचक श्रीधरम, कवि रमण, युवा कवि खालिद, भाकपा-माले केंद्रीय कमेटी सदस्य प्रभात कुमार, सुधीर सुमन आदि मौजूद थे।
आज 20 जनवरी को बिहार की राजधानी पटना में जन संस्कृति मंच के राज्य कार्यालय में महाप्रकाश जी की स्मृति मंे एक शोकसभा हुई, जिसमें वरिष्ठ पत्रकार मणिकांत ठाकुर, कथाकार अशोक कुमार, शायर संजय कुमार कुंदन, कवि राजेश कमल, प्रतिभा, संतोष सहर, रंजीव, रंगकर्मी संतोष झा और समता राय ने उन्हें श्रद्धांजलि दी।
मातृभाषा, साहित्य और प्रगतिशील विचारधारा तथा नई रचनाशीलता के प्रति अपने गहरे समर्पण के लिए महाप्रकाश जी हमेशा याद आएंगे। जन संस्कृति मंच की ओर से उन्हें हार्दिक श्रद्धांजलि।
सुधीर सुमन, राष्ट्रीय सहसचिव, जन संस्कृति मंच
मोबाइल- 09868990959  

बुधवार, 19 दिसम्बर 2012

पूरी दुनिया में हमारे देश और समाज की बेहद शर्मनाक स्थिति होती जा रही है: प्रो. मैनेजर पांडेय

जन संस्कृति मंच
गैंगरेप की घटना बेहद चिंतनीय: जन संस्कृति मंच
यह स्त्री के अस्तित्व पर हमला है: प्रो. मैनेजर पांडेय
जनता के गुस्से को बेहतर समाज के निर्माण की ओर मोड़ना जरूरी

जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रो. मैनेजर पांडेय ने दिल्ली में गैंगरेप की बर्बर घटना पर गहरी चिंता जाहिर करते हुए कहा है कि सरकार और समाज दोनों को गंभीरता से यह सोचना होगा कि वे कैसे इस तरह के कुकृत्य को खत्म करंेगे। इस देश में स्त्रियों के विरुद्ध अत्याचार, हिंसा और बलात्कार की घटनाएं पहले से भी अधिक बढ़ती जा रही हैं। खुद सरकारी आंकड़ों के अनुसार दिल्ली में अत्याचार और बलात्कार की सबसे ज्यादा घटनाएं घट रही हैं। प्रशासन और सरकार उन्हें सुरक्षा देने में पूरी तरह विफल हैं। समाज के हर तबके और हर वर्ग की स्त्रियों और बच्चों के प्रति ज्यादती और नृशंसता की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ी हैं। जबकि किसी भी देश या समाज की सभ्यता का पैमाना यह है कि वहां स्त्रियों और बच्चों के साथ किस तरह का व्यवहार होता है, इस पैमाने पर पूरी दुनिया में हमारे समाज और देश की बेहद शर्मनाक स्थिति होती जा रही है।
उन्होंने कहा है कि गैंगरेप के दोषियों को तो सख्त सजा होनी ही चाहिए, लेकिन साथ ही बलात्कार, उत्पीड़न और हिंसा की तमाम घटनाओं के दोषी किस तरह दंडित किए जाएं, कानून और पुलिस प्रशासन की गड़बडि़यों या सामाजिक-राजनीतिक संरक्षण के कारण उनके बच निकलने की घटनाओं पर अंकुश कैसे लगाया जाए, इस बारे में गंभीरता से सोचना चाहिए, क्योंकि दोषियों के बच निकलने से भी इस तरह की मानसिकता वालों का मनोबल बढ़ता है।
रविवार 16 दिसंबर को फिजियोथेरपी की छात्रा के साथ उस प्राइवेट बस में जिस बर्बरता के साथ गैंगरेप किया गया और उसके यौनांगों में लोहे के राॅड से हमला किया गया, उसके विवरण काफी दिल दहलाने वाले और चिंतित करने वाले हैं। यह सिर्फ बलात्कार नहीं, बल्कि आजादी और बराबरी के साथ जीने की आकांक्षा रखने और अपने सम्मान के लिए प्रतिरोध करने वाली स्त्री के अस्तित्व पर ही वहशियाना हमला है। इसे किसी भी कीमत पर बर्दास्त नहीं किया जा सकता। इस वहशियाना कृत्य के बाद युवक-युवतियों, छात्र-छात्राओं, विभिन्न वर्गाें और तबकों के लोगों का जो गुस्सा सड़कों पर उभरा है, उस गुस्से को उस बेहतर समाज के निर्माण की ओर मोड़ना होगा, जहां कोई भी स्त्री किसी भी वक्त अपनी इच्छा से किसी के साथ कहीं भी आ जा सके, जहां उसे मौजमस्ती का वस्तु समझकर कोई उत्पीडि़त या दमित न करे, जहां उसकी स्वतंत्रता, आत्मनिर्णय और समानता के अधिकार पर कोई हमला न हो। जो पुलिस अधिकारी, नौकरशाह, राजनीतिक पार्टी, राजनेता या सरकार स्त्रियों की इन अधिकारों का समर्थन नहीं करते और उल्टे उन्हें ही सामंती-पूंजीवादी पितृृसत्तात्मक समाज की कोढ़ से पैदा हो रहे अपराधियों से बच कर रहने की नसीहत दे रहे हैं, जो यह उपदेश दे रहे हैं कि वे किस तरह का कपड़ा पहने, किस वक्त कहां आएं-जाएं, उन्हें भी उनके पद से हटाया जाना चाहिए।
प्रो. मैनेजर पांडेय ने कहा है कि बलात्कार और उत्पीड़न को झेलने वाली स्त्री को ही जब गलत बताया जाता है, तो उससे बलात्कारियों का मनोबल बढ़ता है। एक बलत्कृत को क्यों अपनी इज्जत को लेकर अपराधबोध पालना चाहिए, बल्कि उस समाज को अपनी इज्जत के बारे में सोचना चाहिए कि क्या वह खुद किसी इज्जत लायक है, जहां इस तरह की घटनाएं घटती हैं। उस समाज को खुद को बदलने के बारे में सोचना ही होगा, जहां एक ओर खाप पंचायतें इज्जत के नाम पर अपना जीवनसाथी चुनने वाले लड़कियों और लड़कों की हत्या करती हैं और जहां दूसरी ओर देश की राजधानी दिल्ली में स्त्रियों के आखेट में घुमते लोग लगातार रेप, हिंसा और हत्या को अंजाम देते रहते हैं। प्रो. पांडेय ने कहा है कि पुलिस, न्यायपालिका और विभिन्न लोकतांत्रिक संस्थाओं में बैठे स्त्री विरोधी लोगों के विरुद्ध भी संघर्ष करना वक्त की जरूरत है। यह अजीब है कि बलात्कार की घटनाएं जिस दौर में बढ़ती जा रही है उसी दौर में न्यायालयों से इन मामलों में दोषियों को दंडित करने की दर पहले से लगभग आधी हो गई है। बलात्कार की परिभाषा में भी खोट है, लोहे के राॅड, बोतल या किसी अन्य वस्तु से यौनांगों पर किए गए प्रहार को बलात्कार नहीं माना जाता, जबकि इसके लिए तो और भी कठोर सजा होनी चाहिए। बलात्कार की परिभाषा में बदलाव, चिकित्सीय जांच के प्रति तत्परता और पुलिस की जवाबदेही को सुनिश्चित करना भी जरूरी है।
प्रो. पांडेय ने कहा कि वे संसद में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज्य के इस कथन से कतई सहमत नहीं हैं कि जिस लड़की का गैंगरेप हुआ, अगर वह बच भी गई तो जीवन भर जिंदा लाश बनकर रह जाएगी। सवाल यह है कि क्यों वह जीवन भर जिंदा लाश बनकर रहेगी? उसका गुनाह क्या है? जीवन भर जिंदा लाश बनकर अपराधियों को क्यों नहीं रहना चाहिए? वह बहादुर लड़की है, उसने तो जान पर खेलकर वहशियों का प्रतिरोध किया है, इस तरह के प्रतिरोध और समाज में पूरी स्वतंत्रता और स्वाभिमान के साथ जीने के स्त्री के अधिकार का तो खुलकर समर्थन किया जाना चाहिए। उसके जीवन की रक्षा हो और पूरे स्वाभिमान के साथ वह इस समाज में रहे, इसकी हरसंभव कोशिश और कामना करनी चाहिए।

 सुधीर सुमन, राष्ट्रीय सहसचिव, जन संस्कृति मंच की ओर से जारी

बृहस्पतिवार, 13 दिसम्बर 2012

कथाकार कामतानाथ को जन संस्कृति मंच की श्रद्धांजलि


कथाकार कामतानाथ नहीं रहे। विगत 7 दिसंबर को 78 साल की उम्र में गुर्दे के कैंसर से लखनऊ के डाŒ राममनोहर लोहिया आयुÆवज्ञान संस्थान में उनका निधन हो गया। उनका जन्म 22 सितंबर 1934 को हुआ था। स्वाधीनता आंदोलन पर केंदि्रत उनका उपन्यास 'कालकथा काफी चर्चित हुआ, जिसके दो खंंड प्रकाशित हो चुके थे और दो अभी प्रकाशित होने वाले हैं। कामतानाथ की पहली कहानी 'मेहमान 1961 में प्रकाशित हुर्इ थी। उनकी दूसरी कहानी 'लाशें काफी चर्चित रही। वे साठ के दशक से अब तक की हिंदी कहानी के सफर के चश्मदीद गवाह थे। कामतानाथ साठोत्तरी पीढ़ी के ऐसे रचनाकार थे, जो अपने लेखन में हमेशा प्रगतिशील जनपक्षीय मूल्यों के साथ खड़े रहे। इतिहास के प्रति उनका प्रगतिशील नजरिया उनके उपन्यास 'कालकथा में भी परिलक्षित होता है। प्रगतिशील और समांतर कथा आंदोलनों में उनकी सक्रिय भागीदारी रही। 'सुबह होने तक, 'एक और हिंदुस्तान, 'समुद्रतट पर खुलने वाली खिड़की, 'पिघलेगी बर्फ और 'तुम्हारे नाम उनके प्रमुख उपन्यास हैं। 'छुटिटयां, 'तीसरी आंख, 'सब ठीक हो जाएगा, 'शिकस्त, 'रिश्ते नाते, 'आकाश से झांकता वह चेहरा, 'सोवियत संघ का पतन क्यों हुआ आदि कहानी संग्रहों की उनकी कर्इ कहानियां काफी चर्चित रहीं। कुछ कहानियों का नाटय मंचन भी हुआ। उनकी कहानी 'संक्रमण की लगभग 500 सौ प्रस्तुतियां हुर्इं, जिसमेें देवेंद्रराज अंकुर और नसीरुददीन शाह जैसे नाटय निर्देशक और अभिनेता की भागीदारी भी रही। उन्होंने 'दिशाहीन, 'फूलन, 'कल्पतरु की छांह, 'दाखिला डाट काम नामक नाटक लिखे। एकांकी वार्ड नं-1 और प्रहसन 'भारत भाग्य विधाता ही नहीं, बलिक इब्सन के मशहूर नाटक 'घोस्ट का 'प्रेत नाम से अनुवाद तथा मोपांसा की कहानियों पर आधारित नाटक 'औरत का लेखन नाटकों के प्रति उनके गहरे जुड़ाव की बानगी हंै। उनकी कहानी 'खलनायक पर एक लघु फिल्म भी बनी। कामतानाथ को उनके साहितियक योगदान के लिए पहल सम्मान, मुकितबोध पुरस्कार, यशपाल पुरस्कार, महात्मा गांधी सम्मान तथा उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान का साहित्य भूषण पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
कामतानाथ का व्यकितत्व जितना सहज, सरल, सादगी और आत्मीय था, उनका लेखन और भाषा शैली भी उसी तरह की थी। लेखन में किसी सनसनी और चमत्कार के पीछे दौड़ने के बजाए पूरे धैर्य के साथ वे अपने समय और इतिहास की सच्चाइयों को वे दर्ज करते रहे। कामतानाथ उन लेखकों में से थे, जो लेखन को एक सामाजिक-राजनीतिक कर्म मानते हैं। उन्होंने मजदूरों के जीवन पर तो कहानियां लिखीं हीं, श्रमिक आंदोलनों में भी उनकी भागीदारी रही। कामतानाथ रिजर्वबैंक से सेवानिवृत्त हुए थे। अपने कार्यस्थल पर एक कामरेड के तौर पर ही उनकी पहचान थी। समाज और देश के प्रति एक लेखक और बुद्धिजीवी की सक्रिय भूमिका के वे पक्षधर थे। उनके मित्रों का एक बहुत बड़ा संसार था। अपनी पत्नी के बीमारी की वजह से हाल के वर्षों में उनका कहीं आना-जाना कम ही हो पाता था और खुद भी लंबे समय से बीमार चल रहे थे। अपने आत्मीय स्वभाव और जनपक्षीय लेखन के लिए कामतानाथ जी हमेशा याद आएंगे। उन्हें जन संस्कृति मंच की ओर से हार्र्दिक श्रद्धांजलि।  

                                      सुधीर सुमन, राष्ट्रीय सहसचिव, जन संस्कृति मंच की ओर से जारी

रविवार, 9 दिसम्बर 2012

The Directory of Best Hindi Blogs is out!


We present to you our bouquet of outstanding Hindi blogs. Like flowers and foliage in an appealing bouquet, you will find in this directory blogs in a range of hues: established and new… experimental and conservative… very informal and very serious… too personal and too social-minded… by top professionals, PhDs and professors and by kids and not so educated adults… highly content-rich and still developing…

We are also conscious that we might have left out some excellent blogs. As in the case of the Directory of Best Indian Blogs, we’d make amends in subsequent updations of the Directory of Best Hindi Blogs if such blogs are brought to our notice.
We are a small team and our resources are rather limited. We possess only ordinary IQ and are error-prone. Yet, two things we can assure you of, and we are very proud of them: we are sincere with our job, and we are fair.
Regards
ITB team
So, here is the Directory of Best Hindi Blogs. It has nearly 200 blogs, listed alphabetically [according to the operative part of the URL. Alphabetisation is in Roman alphabets, as URLs are presently available in Roman script only]. At the end of the list of blogs, we have listed top-quality blogging platforms, aggregators and blogs about blogs. Multi-blogger blogs and community blogs are included in the main directory.


blog directory ब्लॉग डाइरैक्टरी 
aadhasachonline-आधा सच...
aarambha-आरम्भ
aasthaaurchintan-आस्था और चिंतन
abhi-cse-love-एहसास प्यार का..
adaalat.in-अदालत
ahilyaa-एक कली दो पत्तियाँ
akaltara-सिंहावलोकन
akhtarkhanakela-आपका-अख्तर खान "अकेला"
akoham-एकोऽहम्
amit-nivedit-बस यूँ ही " .......अमित"
amritatanmay-Amrita Tanmay
anilpusadkar-अमीर धरती गरीब लोग
anubhaw-अनुभव
anvarat-अनवरत
apnapanchoo-अपना पंचू
apnokasath-अपनों का साथ
archanachaoji-मेरे मन की
aruncroy-सरोकार
asuvidha-असुविधा....
atulshrivastavaa-सत्‍यमेव जयते ! ... (?)
avinashvachaspati-अविनाश वाचस्‍पति
azdak-अज़दक
bairang-बैरंग
bal-kishore-Bal-Kishore
balliabole-balliabole/ बलिया बोले
bamulahija-Bamulahija
banarahebanaras-बना रहे बनारस
battkuchni-बतकुचनी
bhartiynari-भारतीय नारी
bitspratik-प्रतीक माहेश्वरी
brajkiduniya-ब्रज की दुनिया
bspabla-ज़िंदगी के मेले
cartoonsbyirfan-ITNI SI BAAT
chalaabihari-चला बिहारी ब्लॉगर बनने
chalte-chalte-चलते-चलते...!
chavannichap-chavanni chap (चवन्नी चैप)
chouthaakhambha-चौथा खंबा
dakbabu-डाकिया डाक लाया
darshansandbox-हर रोज़ एक प्रश्न?
dashamlav-दशमलव
deepakmystical-दीपक बाबा की बक बक
devendra-bechainaatma-बेचैन आत्मा
dilkikalam-dileep-दिल की कलम से...
dillidamamla-ऐवें कुछ भी
doosrapahlu-दूसरा पहलू
drashu-***…….सीधी खरी बात…….***
drprabhattandon-होम्योपैथी-नई सोच/नई दिशायें
drrajeshvyas-कलावाक्
ekla-chalo-एकला चलो
ek-shaam-mere-naam-एक शाम मेरे नाम
ek-ziddi-dhun-एक ज़िद्दी धुन
epandit-ई-पंडित
filmcrossword-फ़िल्म जगत
galtikiski-गलती किसकी?
gautamrajrishi-पाल ले इक रोग नादां...
geetchaturvedi-वैतागवाड़ी
geetkalash-गीत कलश
ghughutibasuti-घुघूतीबासूती
girijeshrao-एक आलसी का चिठ्ठा
guleri-उसने कहा था...
gustakh-गुस्ताख़
gyandarpan-ज्ञान दर्पण
halchal.org-मानसिक हलचल
haqbaat-हक बात
harkirathaqeer-हरकीरत ' हीर'
hindi2tech-हिन्दी 2 टेक
hindiacom-कारवॉं karvaan
hindizen-Hindizen - हिन्दीज़ेन
hunkaar-हुंकार
indianscifiarvind-साईब्लाग [sciblog]
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jazbaattheemotions-जज़्बात...दिल से दिल तक
jhoothasach-झूठा सच - Jhootha Sach
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jonakehsake-जो न कह सके
kabaadkhaana-कबाड़खाना
kadachit-कदाचित
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kalptaru-कल्पतरु
karmnasha-कर्मनाशा
kashivishvavidyalay-यही है वह जगह
katha-chakra-कथा चक्र
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kavitarawatbpl-KAVITA RAWAT
kavita-verma-कासे कहूँ?
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kuchhalagsa-कुछ अलग सा
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