कारवॉं

नयी मंज़िल के मीरे-कारवाँ भी और होते हैं
पुराने ख़िज़्रे-रह बदले वो तर्ज़े-रहबरी बदला
-फ़िराक़ गोरखपुरी

सोमवार, 30 जुलाई 2018

वेनेजुएला संकट और धेले के तीन विकासपुरुष

वेनेजुएला संकट से आप जियो-मरो टाइप विकास को समझ सकते हैं। सर्वाधिक मिस वर्ल्‍ड देने वाले देश में आज दूध 80 लाख रूपये लीटर बिक रहा। इस लिहाज से आप इन विकास पुरुषों की असली कीमत जान सकते हैं। ये त्‍ाथाकथ‍ित पूंजीपति जो सरकार से जनता के टैक्‍स का पैसा बैंकों के माध्‍यम से झटक कर पूंजीपतियों की लिस्‍ट में अव्‍वल बन जाते हैं असली संकट के समय उनसे ज्‍यादा धनी कोई भी खटाल चलाने वाला और अनाज पैदा करने वाला किसान हो सकता है। क्‍योेकि संकट में किसी की भी प्राथमिकता खाना होगी ना कि हजार जीबी नेट का डाटा। यह फ्री डाटा और ऐसे उदयोपतियों के साथ खुद को खडा दिखाने वाले नेता लोग संकट में धेले के तीन नजर आएंगे।

मंगलवार, 29 मई 2018

मैं शबाना - भारतीय समाज में एक औरत होने की विडंबना

यूसुफ रईस के उपन्‍यास 'मैं शबाना' से गुजरते हुए दो चर्चित उपन्‍यासों की कथाएं जहन में कौंधीं। एक जैनेन्‍द्र की 'त्‍यागपत्र' और दूसरी मिर्जा हाजी रूस्‍वा की 'उमराव जान अदा'। इनमें जो बात कॉमन है, वह है विडंबना। भारतीय समाज में एक औरत होने की विडंबना। कुर्रतुल एन हैदर की कहानी 'अगले जनम मोहे बिटिया ना कीजो' भी इसी विडंबना को रूपायित करती है। जब तक यह विडंबना है इसे बारंबार सामने लाने की कोशिशें जारी रहेंगी, जारी रहनी चाहिए।
'मैं शबाना' में यही कोशिश की गयी है। उपन्‍यास की भाषा सहज और चित्रमयता लिये है। शबाना इस समाज से लडती है और करीब करीब लडाई जीतने को होती है कि विडंबना का विष उसके बचाए सपनों पर पानी फेर देता है। इस जहर की काट एक ही है शिक्षा। यह उपन्‍यास भी उस शिक्षा को आगे बढाने का एक माध्‍यम है। इसके लिए उपन्‍यासकार बधाई के पात्र हैं।

सोमवार, 12 फ़रवरी 2018

उत्‍सवता मुझे रास नहीं आती

अरसा बाद आज चेतन का फोन आया।
पूछा - क्‍या हो रहा, बोले - रजाई में हूं।
मां कैसी हैं...। ठीक हैं।
इधर दिल्‍ली नहीं आए।
मेने बताया कि एकाध दिन को आया था पर मिल नहीं सका। होली में कुछ ज्‍यादा वक्‍त मिलेगा तो मिलते हैं उस वक्‍त।
फिर उन्‍होंने पूछा - कैसा रहा साहित्‍योत्‍सव।
मैंने कहा - उत्‍सव आदि में मेरी रूचि नहीं। यह सेलिब्रिटी लोगों के लिए है।
सोचा,अब सोशल मीडिया के चलते साहित्‍य में भी सेलिब्रेटी दिन-दूरी रात चौगूनी दर से बढ रहे तो मंच तो चाहिए।
इससे पहले आगरा में पहली बार साहित्‍योत्‍सव की रिपोर्टिंग के लिए गया था, बेमन से। तो जो रिपोर्ट बनी वह उनके अनुकूल नहीं थी, पर लोगों को पसंद आयी।
यहां जयपुर में तीन साहित्‍योत्‍सव हुए एक साथ आगे-पीछे। मैं सीधे इनमें से किसी से जुड़ा भी नहीं था। साहित्यिक संगठनों से भी मेरा हमेशा से लगभग ना के बराबर संबंध रहा है। दिल्‍ली रहने लगा तो जसम की सदस्‍यता भी दिलायी गयी मुझे। पर इससे कोई अंतर नहीं पड़ा। क्‍येाकि जसम के बिहार के तमाम साथी पहले से ही निकट रहे हैं।
इससे पहले सहरसा में जलेस से तब जुडे रामचैतन्‍य धीरज ने मुझे जोडना चाहा था। पर मेरी कभी भी रूचि साहित्यिक संगठनों से जुडकर साहित्‍य में जगह बनाने में नहीं रही। इन संगठनों के कार्यक्रम जो भी मुझे खींचते थे, उनमें मैं शिरकत करता था, बिना भेद-भाव के।
पर उत्‍सवता मुझे रास नहीं आयी। मंच पर खुद को श्रोता से अलग होकर बोलना भी मुझे अच्‍छा नहीं लगा कभी। एक घेरे में बैठकर मैं पूरे दिन बातें कर सकता हूं पर अलग से लोगों को संबोधित करना मेरे लिए सहज नहीं। मंच से केवल कविता पाठ कर पाता हूं मैं, सहजता से। बाकी अगर कभी मुझे बोलना पड़ा तो वक्‍तव्‍य को लिखकर ले जाना मेरे लिए जरूरी होता है अक्‍सर।
तो इन साहित्‍योत्‍सवों के समय मैं दिल्‍ली था परिवार के साथ। वहां एक शाम अच्‍युतानंद म‍िश्र, कुमार वीरेन्‍द्र, अजय प्रकाश, इरेन्‍द्र, राजेश चन्‍द्र, मजीद अहमद अादि साथियों से बातें हुईं। साहित्‍योत्‍सव की खबरें फेसबुक के माध्‍यम से कुछ आयीं मुझे तक। प्रेम भारद्वाज की वाल से पता चला कि वे जयपुर में हैं। उन्‍हीं से पता चला कि विष्‍णु खरं भी आये हैं। तो अफसोस हुआ कि जयपुर रहता तो इन लोगों से बातें करना अच्‍छा लगता। एक संजीव कुमार की पोस्‍ट से पता चला कि संदीप मील की सक्रियता से जलेस ने भी उत्‍सव किया। मील का एक दो बार फोन आया था, बारिश के चलते तय समय पर हमलोग म‍िल नहीं सकें। पर जनपर्व की कोई सूचना इसके पहले मुझे नहीं थी। प्रलेस के कार्यक्रम की जानकारी थी मुझे और अपनी वाल पर उसे मैंने शेयर भी किया था। फिर गोविंद जी से भेंट हुई तो मैंने उन्‍हें बताया था कि मैं तो भई साल की इकलौती अखबारी छुटिटयों में दिल्‍ली जा रहा।

शुक्रवार, 10 नवंबर 2017

फ़टपाथ पर पीपल के नीचे बिकती पूडि़यों का स्‍वाद - कुमार मुकुल - कुछ डायरीनुमा

ना दोस्‍त है ना रकीब है,तेरा शहर कितना अजीब है...

सुबह जगा तो धुंधलका छंटने लगा था और पड़ोसी के लौपडॉग को प्रशिक्षण देने को उसका ट्रेनर उसे पार्क ले जाने की तैयारी में था। रविवार को मेरी फुर्ती भी कुछ बढ जाती है सो दिशा-फरागत हो मैंने वह टेपडांस बजाया जो ऑरकुट मित्र और कथाकार उदय प्रकाश के जर्मन साथी के प्रोफाइल से अपने यहां जोड़ रखा है,और उस पर उतनी देर लगातार कसरतनुमा डांस किया सेहत के लिहाज से। फिर सोचा कि आज पार्क चला जाए और अपने अग्रज कविमित्र लीलाधर मंडलोई के साथा टहला जाए और गुमटी की चाय पीते दुनिया जहान की लानत-मलामत और व्‍याख्‍या की जाए।
तभी याद आया कि आज अपनी नेट की इकलौती नियमित पर अदेखी चैट साथी अरूणा राय भी तो इंतजार करेंगी। ओह यह लड़की भी न लड़की कहो तो नाराज, तू तड़ाक मत कीजिए,पच्‍चीस की हूं पर पचास सी सोचती हूं,ओह बाबा तो चलिए आप मेरी बच्‍ची हुईं अपनी प्‍यारी अरूणा जी। दारोगा की नौकरी और उस पर ईमानदारी का तमगा और आजादी की असीम उड़ानें भरने की तैयारी तो उसे मैं मिल गया एक कविकाठी उसके शब्‍दों में नेट पर सकून का साथी।
ऑरकुट पर उसने ही खोज की थी मेरी और लिख मारा - ना दोस्‍त है ना रकीब है
तेरा शहर कितना अजीब है...

मैंने भी लिखा - ऐसी दुनिया में जुनूं, ऐसे जमाने में वफा
इस तरह खुद को तमाशा न बना मान भी जा...

फिर तो जो रोज की शाब्दिक जद्दोजहद शुरू हुई तो जबरदस्‍त तकरारों के बीच जारी है। अब स्थिति यह है कि घर में झगडूं तो अपनी आभा मैडम कहती हैं कि अभी करती हूं अरूणा से शिकायत।
तो उसे मैसेज किया कि आज तो मंडलोई जी के साथ गुजरेगी सुबह, आने पर ही चैट होगी। तो पार्क पहुंचकर पास से जनसत्‍ता लिया और उनका इंतजार करते पढने लगा। उसमें अपने जवारी भाई कुमार वीरेंद्र की कविता थी , पढकर एक अलग ही दुनिया में चला गया, गांव-देहात की। कुमार ने अपनी अलग ही सहज गंवई भाषा अर्जित की है उसकी छटा इस कविता में दिख रही थी- छत पे घरनी ने
पसार दिया है धान
धूप में भूख के,सुख रहे धान...

कुमार पिछले साल मुबई में थे पर वहां से भी वे गंवई कविता को ही स्‍वर दे रहे थे और आखिर उस स्‍वर ने उनका रूख गांव की ओर कर दिया। पिछले माह उनका फोन आया था, कि अभी तो वे यहीं रहकर खेती-बधारी कराएंगे। उनसे बात कर मेरा मन केदारनाथ सिंह की कविता के धान के बच्‍चों की तरह उन्‍मन हो गया। कि मैं यहां क्‍या कर रहा हूं इस रौशन वीराने में।
अब मंडलोई जी आ गए हैं और मैं उनके साथ पार्क के चक्‍कर लगाते बाते करने लगा हूं दुनिया जहान की। वे पूछते हैं ये क्‍या है यार दिल्‍ली के इन कवियेां में , कि वे इस पर कविता का मूल्‍यांकन करते हैं कि कौन किसके साथ धूम रहा है। मैंने कहा हा यह तो दिल्‍ली की फितरत है,मुझे विनय कुमार की पंक्तियां याद आईं-
हर मंजहब तंदूर छाप , हर नीयत खुद में खोयी सी
खंजर जिसके हाथ लगा वह शख्‍स शिकारी दिल्‍ली में।

फिर मंडलोई कसरत करने लगे और बोले कि यार अब तो मैं बूढा हो रहा हूं । वे पचपन के हैं , मैंने कहा, ऐसा ना कहिए नहीं तो मुझे आपकी तरह कसरत शुरू करनी पड़ेगी, कि अभी तो आप पूरी तरह दुरूस्‍त हैं। फिर हम पीपल के नीचे की गुमटी पर गए पहले पत्र-पत्रिकाएं देखीं फिर कम चीनी की चाय पीते हुए यह येाजना बनाने लगे कि कुछ अलग जीवंत होना चाहिए , कि कविता कहानी काफी नहीं है। कि अगले रविवार को जरा देर से आएंगे और यह जो यहां कोने पर फुटपाथ पर जो दाल की पूडि़या बेच रहा है मजदूरेां के लिए उसका स्‍वाद लेंगे हम। फिर उन्‍होंने कहा कि क्‍यों न इन लेागों की कहानी को हम दर्ज करें इनका जीवन, कि कविता में वह कहां अंट पाता है। तो इस पर सहमति बन गई कि आगे इस पर काम करेंगे हमलेाग मिलकर।
फिर बातें करते हम उनके घर आगए और भाभी जी ने फिर चाय का आग्रह किया तो चाय नमकीन लेते हुए मंडलोई जी ने रात लिखी कविताएं सुनाई तीन चार। उन कविताओं में कविता का शमशेरियता वाला शिल्‍प उभर रहा था कुछ कविताएं पच्‍चासी साल की अपनी मां और भाईयेां के बहाने अपने गांव-कस्‍बे को याद करते लिखी थीं उन्‍होंने। एक कविता संयोग से आज के आलोचना के माहौल पर भी थी। मैंने कहा कि ये कविताएं दे दीजिए मैं उन्‍हें अपने ब्‍लाग पर डाल दूंगा। वे असमंजस में पड़ गए कि रात तेा लिखी ही हैं अभी इन पर कलम चलानी है। मैंने कहा वह पहला ड्राफ्ट होगा फिर आप उस पर काम करते रहेंगे। पर वे उलझन में थे , तेा बोले कि तुम्‍हें लगता है यह आलोचना की राजनीति पर जो कविता है वह ज्‍यादा रूच गई है तेा उसे ले लो। तब उन्‍होंने वह कविता वहीं बैठे-बैठे फेयर की। फिर बताया कि कविता एकादश करके एक संकलन किया है मैंने ,मेधा से आया है , और किताब दी । वाकई अपने तरह का संकलन लगा वह, जिसमें विजेन्‍दे,ऋतुराज,वेणुगोपाल आदि इधर के दौर में चर्चा से करीब - करीब बाहर रहे कवि शामिल दिखे। तब दुखी होते उन्‍होंने बताया कि वेणु गोपाल को कैंसर हो गया है, ओह, पिछले सालों गैंगरीन से उनकी एक टांग काट दी गई थी और अब यह त्रासदी। मैं हैदराबाद में वेणु जी के साथ एक ही अखबार में काम कर चुका था। उस समय साठ के आस-पास के उस कवि को जिस मस्‍ती में देखा था उसे इन घटनाओं से जेाड़़कर देखता हूं तेा जी उन्‍मन हो जाता है। वाराणसी में पहल सम्‍मान के समय उनसे भेंट भी हुई थी। अपने एक पैर के साथ भी वे उसी तरह अलमस्‍त दिखे।
क्‍या हो रहा है हमारे समय के इन लेखकों के साथ । अपने प्‍यारे कवि वीरने डंगवाल केा भी जब गले में कैंसर और उसके आपरेशन की बात सुनी और देखी तो धक्‍का लगा था। पर जब उनसेआपरेशन थियेटर में मिला था तेा कैसेी गर्मजोशी से हाथ मिलाया था उन्‍होंने , वैसे वे गले मिलते थे भर बांह और मैं संकोच में पड़ जाता था।
ओह ... यह दिल्‍ली भी क्‍या-क्‍या दिखाती है या जीवन ही दिखाता है क्‍या क्‍या - पर फिर वेणु गेापाल की कविता हमारा सम्‍मोहन तोड़ती है- ऐसा ही क्‍यों होता है-
कि हिन्‍दी का कवि।
बहता या डूबता तो
अपनी कविता में है
लेकिन उसकी लाश
अक्‍सर दिल्‍ली में मिलती है.....

मंगलवार, 24 अक्तूबर 2017

मिथक प्‍यार का

बेचैन सी एक लड़की जब झांकती है मेरी आंखों में...


बेचैन सी एक लड़की जब झांकती है मेरी आंखों में
वहां पाती है जगत कुएं का
जिसकी तली में होता है जल
जिसमें चक्‍कर काटत हैं मछलियों रंग-बिरंगी

लड़की के हाथों में टुकड़े होते हैं पत्‍थर के
पट-पट-पट
उनसे अठगोटिया खेलती है लड़की
कि गिर पड़ता है एक पत्‍थर जगत से लुडककर पानी में
टप...अच्‍छी लगती है ध्‍वनि
टप-टप-टप वह गिराती जाती है पत्‍थर
उसका हाथ खाली हो जाता है
तो वह देखती है
लाल फ्राक पहने उसका चेहरा
त ल म ला रहा होता है तली में
कि
वह करती है कू...
प्रतिध्‍वनि लौटती है
कू -कू -कू
लड़की समझती है कि मैंने उसे पुकारा है
और हंस पड़ती है
झर-झर-झर
झर-झर-झर लौटती है प्रतिध्‍वनि
जैसे बारिश हो रही हो
शर्म से भीगती भाग जाती है लड़की
धम-घम-घम

इसी तरह सुबह होती है शाम होती है
आती है रात
आकाश उतराने लगता है मेरे भीतर
तारे चिन-चिन करते
कि कंपकंपी छूटने लगती है
और तरेगन डोलते रहते हैं सारी रात
सितारे मंढे चंदोवे सा

फिर आती है सुबह
टप-झर-धम-धम-टप-झर-झर-झर

कि जगत पर उतरने लगते हैं
निशान पावों के

इसी तरह बदलती हैं ऋतुएं
आती है बरसात
पानी उपर आ जाता है जगत के पास
थोडा झुककर ही उसे छू लिया करती है लड़की
थरथरा उठता है जल

फिर आता है जाड़ा
प्रतिबंधों की मार से कंपाता

और अंत में गर्मी
कि लड़की आती है जगत पर एक सुबह
तो जल उतर चुका होता है तली में

इस आखिरी बार
उसे छू लेना चाहती है लडकी
कि निचोडती है खुद को
और टपकते हैं आंसू
टप-टप
प्रतिध्‍वनि लौटती है टप-टप-टप
लड़की को लगता है कि मैं भी रो रहा हूं
और फफक कर भाग उठती है वह
भाग चलता है जल तली से।

9 टिप्‍पणियां:

L.Goswami ने कहा…
मिथक को परिभाषित करती अच्छी कविता.
preeti ने कहा…
behtareen ...
वन्दना ने कहा…
गज़ब्…………………बेहतरीन्…………………शानदार ………………लाजवाब्…………………अब तो शब्द भी कम पड रहे हैं।
वन्दना ने कहा…
फिर क्‍यों खींचते हैं पहाड़

बेहद गहन सोच का पर्याय है आपका लेखन्।
वन्दना ने कहा…
इच्छाओं की उम्र नहीं होती

क्या गज़ब का लेखन है……………नतमस्तक हूँ।
आज आपका ही लिखा पढ रही हूँ और अपने को धन्य कर रही हूँ।
shabdsrijan ने कहा…
आपकी यह कविता अपनी सहजता में उदात्त की ओर ले जाने वाली खिडकियां खोलती है।
योगेंद्र कृष्णा
सूर्यकान्त गुप्ता ने कहा…
इस आखिरी बार
उसे छू लेना चाहती है लडकी
कि निचोडती है खुद को
और टपकते हैं आंसू
टप-टप भावपूर्ण रचना।
वाणी गीत ने कहा…
इस आखिरी बार
उसे छू लेना चाहती है लडकी
कि निचोडती है खुद को
और टपकते हैं आंसू
टप-टप
प्रतिध्‍वनि लौटती है टप-टप-टप
लड़की को लगता है कि मैं भी रो रहा हूं

अद्भुत ...!
arun c roy ने कहा…
मुकुल जी आपकी कवितायेँ पढना ए़क अनुभव है.. किसी और लोक में ले जाती है आपकी कविताएं, आपके गीत ... पहली कविता आपकी.. इच्छाओं की उम्र नहीं होती पढ़ी थी और आज भी जेहन में ताज़ी है कविता ... बेचैन सी एक लड़की जब झांकती है मेरी आंखों में... पढ़ कर तो अपने बचपने में चला गया जब ए़क लड़की यूं ही झाँका करती थी मेरे घर के आगे के कुए में ! समय बीतता गया वो लड़की बड़ी हुई लेकिन उस बूढ़े कुए की तरह उसके सपने सूख गए और वो लड़की पांच लड़कियों को जन्म देकर पिछले साल जुगार गयी... लगता है ... आज भी वो लड़की झांकती है मेरी आँखों में... उस बूढ़े कुए में... जो सूख गया है अब ! झकझोर दी है आपकी कविता !