हमारे कारवॉं को मंजिलों का इंतजार है , ये आंधियों , ये बिजलियों की पीठ पर सवार है , तू आ कदम मिला के चल , चलेंगे एक साथ हम , अगर कहीं है स्‍वर्ग तो उतार ला जमीन पर , तू जिन्‍दा है तो जिन्‍दगी की जीत में यकीन कर - शैलेंद्र

बृहस्पतिवार, 15 मार्च 2012

कवितायेँ - सुशील कुमार


(1)

बुरका

जब खुदा मेरी देह बना रहा था
उसी समय उसने
तुम्हारी आँखों पर
बनाया था हया का पर्दा

तुमनें मन की कालिमा से
एक लिबास बनाया
और
हमने पहन लिया 
तुम्हारी कालिख छिपाने के लिए

तुम हमेशा मुझे पर्दे के मायने समझाते हो
और मैं हाँ-हाँ में सिर हिलाती हूँ
मन करता है
तुम्हारी बातों की मुखालफत करूँ

मैं जानती हूँ कि
बेहयाई मेरे बदन में नहीं है
जो ढँक लूँ किसी लिबास से
बल्कि
वो तैर रही है तुम्हारी आँखों में
बागी, बेख़ौफ़ लड़ती हुई हर पल
हया के पर्दे से

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(2)

लिखता हूँ कविता

बेचने के लिए नहीं लिखता था कविता 
इसलिए लिखता रहा
और तकिये के नीचे दबाता रहा

कुछ ग़ुम हो गयीं और कुछ ग़ुम कर दी गयीं 
कुछ कुम्हलाई सी सोयी रही चुपचाप
कुछ रुठीं रहीं मुझसे कई बरस
कुछ सरक कर फर्श पर आ गिरी 
कुछ नें रेंगना शुरू कर दिया
कुछ चीखने लगीं
कुछ उछालने लगीं हवा में नारे
कर के अपनी मुठ्ठी बंद दस्तख देने लगीं
प्रकाशकों के दरवाजों पर
कुछ मंच देखते ही चढ़ बैठी और तांडव कर डाला

बेचने के लिए नहीं लिखता था
इसलिए कोई मोल भी न लगाया इनका
अनमोल हैं ये
लेकिन अब कमजोर नहीं है
कि तकिये से मुंह दबा दूँ इनका   

चीखतीं हैं अब, उठ खड़ी होती हैं
कभी-कभी मेरे भी खिलाफ

ये मेरी नहीं रह गयीं हैं अब
उनकी हैं जिनकी आवाज रह गयी है
दबी हुई सी
उनकी है जिनकी आत्मा में
दबे हैं बगावत के शोले

लिखता हूँ कविता, बेचता  नहीं हूँ
इसलिए मौकापरस्त नहीं बल्कि
जुल्मों सितम की काली कोठरी में
बगावत का चीराग हैं कवितायें मेरी
 
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(3)

तंत्र का जन

मरना होगा
रोज - रोज
जनतंत्र में
तंत्र का जन बन कर

जन का तंत्र के बन जाने तक |
 
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(4) 

कविता का जन्म

एक अजीब सी बेचैनी है 
जो मुझे समझ में आती तो है 
लेकिन 
अगर बात किसी को समझाने की हो 
तो अवर्णनीय हो जाती है
और
जिसकी वजह से कलम उठा कर 
खुद को टीपू सुल्तान  समझता हूँ  
और हमलावर तेवर से निकालता हूँ 
अपनी कॉपी 
रंग डालने के लिए 

पहनाने लगता हूँ नग्न बेचैनी को 
शब्दों का जामा 
गढ़ता हुआ वाक्य-दर-वाक्य 
कोसता हूँ निर्लज बेचैनी को 
जो नग्न हो जाती है पुन:
अगली पंक्ति तक जाते-जाते  

एक-एक वाक्य गढ़ने की जद्दोजहत में 
यह भूल जाता हूँ कि 
कविता हँस रही है मुझ पर 
यह सोचकर कि 
टूट ही जाएगी रीढ़ की हड्डी
इस बेचैन कवि की  
मुझ को गढ़ने में
और मैं मुस्कराता हूँ 
यह देख कर  
कि मेरी बेचैनी
रात के ढलते-ढलते  
कितनी अच्छी लग रही है  
पारंपरिक पोशाक में
पौ फटते ही जन्मी है कविता 
सारी बेचैनियों के खिलाफ !
 
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(5) 

शहर में चांदनी

भागो कि सब भाग रहे हैं
शहर में
कंकड़ीले  जंगलों में
मुंह छिपाने के लिए

चाँद
ईद का हो या
पूर्णिमा का
टी.वी. में निकलता है अब
रात मगर क्या हुआ

मेरी परछाई के साथ
चांदनी चली आई
कमरे में
शौम्य, शीतल,
उजास से भरी हुई

लगा मेरा कमरा
एक तराजू है
और
मै तौल रहा हूँ
चांदनी को
एक पलड़े में रख कर
कभी खुद से
कभी अपने तम से

लगा रहा हूँ हिसाब
कितना लुट चुका हूँ
शहर में !
 
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(6)

गुन्जाईशों का दूसरा नाम

लो वह दिन भी आ गया
जब हमारा खून गर्म तो होता है
लेकिन
उबलता नहीं है

सूख कर कड़कड़ाई हुई साखों में
रगड़ तो होती है मगर
अब वो चिंगारी नहीं निकलती
जिससे धू-धू कर
जंगल में आग लग जाती थी

आयरन की कमीं वाले हमलोगों नें
अपने खून में लोहे की तलाश भी छोड़ दी है
जिससे बनाए जाते थे खंजर

यह
उबाल रहित खून
आग रहित जंगल और
खंजर रहित विद्रोह का नया दौर है

फिर भी मजे की बात तो यह है कि
यहाँ समाजवाद
अजय भवन के मनहूस सन्नाटे में
आगंतुकों की बाट जोहती
कामरेड अजय घोष की मूर्ति नहीं
बल्कि
छांट कर रखी गयीं
पुस्तकालय की किताबों के चंद मुड़े हुए पन्नों में
बची गुन्जाईशों का दूसरा नाम है
 
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(7)
 
दिशाओं के अहंकार को ललकारती भुजाएं
और
चीखकर बेदर्दी की इन्तहां को चुनौती देतीं
हथेलियों में धसीं कीलें 

एक-एक बूंद टपकता लहू
जो सींचता है उसी जमीन पर
लगे फूल के पौधों को
जहाँ सलीब पर खड़ा है सच
जब भी लगता है कि
हार रहा है मेरा सच
सलीब को देखता हूँ

लगता है कोई खड़ा है मेरे लिए
झूठ के खिलाफ
 
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जन्म - 1978, झारखण्ड के हजारीबाग में | शिक्षा - समाज सेवा में स्नातकोत्तर, दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक| बारह वर्षों से सामाजिक क्षेत्र में सक्रिय रूप से कार्यरत | लम्बे समय तक एच.आई.वी. / एड्स जागरूकता के लिए उच्य जोखिम समूह (यौन कर्मियों, समलैंगिकों व ट्रकर्स) के साथ कार्य का अनुभव | साथ ही साथ जन सरोकार के मुद्दों के साथ एवं दक्षिण एशिया शांति कार्यकर्मों के संचालन व समन्वय के क्षेत्र में सक्रियता से काम करते रहे हैं | वर्तमान में दिल्ली स्थित एन.जी.ओ. कंसल्टेंसी कंपनी गोल्डेन थॉट कंसल्टेंट्स प्राइवेट लिमिटेड के साथ चीफ कंसल्टेंट के रूप में कार्यरत है और कई सामाजिक, सरकारी एवं गैर-सरकारी संस्थाओं (जैसे यूनिसेफ, नाको, वी.वी.गिरी राष्ट्रीय श्रम संस्थान, श्रमिक शिक्षा बोर्ड आदि) के साथ प्रशिक्षक, मूल्यांकनकर्ता व सलाहकार के रूप में जुडाव | पता : ए-26/ए, पहली मंजिल, पांडव नगर, मदर डेरी के सामने, दिल्ली-110092 * ई-मेल : goldenthoughtconsultants@gmail.com * मोबाईल : (+91) 9311188949, (+91) 9811188949, * फोन : (+91)11-22486499, (+91)11-22485347
 

रविवार, 19 फरवरी 2012

जहाँ हम कविता पढ़ते हैं - मिथिलेश श्रीवास्तव


मित्रों,

अकेडमी आफ़ फाइन आर्ट्स और लिटरेचर का डायलाग कर्यक्रम हर महीने होता है जिसमें हर बार अलग-अलग कविओं का समूह कविता पढ़ने आता है| मैं कई बार सोचता हूँ कि कोई एक ही जगह हर बार कविता सुनने क्यों जाये| अचानक मुझे सुझा कि आखिर कोई एक ही मंदिर या मस्जिद या गुरूद्वारे इबादत के लिए क्यों जाता है| शायद इसीलिए कि उसको उस जगह पर अगाध भरोसा रहता है| हर बार एक नयी आध्यात्मिकता का एहसास होता है| कविता की इस जगह पर वैसा ही एहसास होता है- शांति, आध्यात्मिकता, मित्रता-भाव, भाषा की नई भंगिमा हर बार, लय और ध्वनियाँ, भरोसा-भाव, इत्यादि| एक कवि बार-बार कविता पढता है, तो वह अपना लय पा लेता है| सुननेवाला अनेक लयों से समृद्ध होता है|
अकेडमी का म्यूजियम हॉल जहाँ हम कविता पढ़ते हैं हर बार नया लगता है| वहां आनेवाला हर दोस्त नई उर्जा से भरा दिखता है| यह सब कुछ अच्छा लगता है| जब सब कुछ अच्छा लगता है तो २५ फ़रवरी, २०१२ के डायलाग में आना हमारे जरुरी कामों की फेहरिस्त में सबसे ऊपर होना चाहिए| कार्यक्रम का ब्यौरा संलग्न है| जरुर पहुँचिये|
मित्रों किसी भी कवि के लिए एक चुनौती से कम नहीं होती कविता क्यूंकि कविता अपने रास्ते स्वयं तय करती है राह ऊबड़ खाबड़ रहस्य रोमांच से भरी हो सकती है पर
मैं कविता को एक जिज्ञासा प्रश्नाकुलता और बेचैनी का सबब मानती हूँ मेरा मानना है इस संवेदन...हीन समय और समाज में कविता सुनना सुनाना साझा करना बहुत कठिन होता जा रहा है और इस दौर को हर बार हर संभव कोशिश से इस अभियान को साकार करते हैं मिथिलेश जी यहाँ पहुंचकर न केवल अच्छी कवितायेँ सुनाने को मिलती हैं बल्कि खुद को टटोलने और खुद को पाने की जद्दोजहद भी शांत होती है कहने और सुनाने का जो साथ बैठकर लुत्फ़ है इससे आप सब भी उठा सकते हैं फिर आइये शामिल हो जाइए हमारी टोली में मिलते हैं इस्सी महीने की २५ तारीख को

मित्रों......आप में से काफी लोग कवितायेँ लिखते है, उन्हें फेसबुक पर शेयर भी करते हैं .... लोग पसंद भी करते हैं.....लायिक या कमेन्ट भी करते हैं, पर क्या आप कवितायेँ पढ़ते भी हैं, सुनते भी हैं....अपने अनुभव से आपको बताना चाहूंगी कि कवि की कव...िता को पढना और उनके मुख से कविता सुनना ये दोनों बिलकुल अलग तरह की बातें हैं! काव्य-पाठ में स्वर का ठहराव, तेजी, लहजा, भाव-भंगिमाएं आदि का अपना महत्त्व होता है और यकीनन जब हम कविता पाठ सुनते हैं तो कवि के वे भाव भी उसमें सम्मिलित होते हैं जो पढ़ते समय शायद हम महसूस नहीं कर पाते या जिनकी हम कल्पना करते हैं! मैं आप सभी को समय-समय पर उन आयोजनों की जानकारी देती रहती हूँ जहाँ मैं कविता पढने या सुनने जाती हूँ! मैंने पिछले दिनों काफी लोगों को कविता पढ़ते सुना, और ये शायद ही आप लोगों को समझा पाऊँगी कि मन एक आनंद-मिश्रित प्रसन्नता से आल्हादित हो उठता है, जब अपने प्रिय कवियों को कविता सुनाते हुए सामने पाती हूँ! स्वयं भी जब कविता पढ़ती हूँ और उन लोगों की त्वरित प्रतिक्रिया पाती हूँ तो मन को सुखद अनुभूति होती है! पिछले दिनों मैंने आप लोगों से "अकादमी ऑफ़ फाईन आर्टस एंड लिटरेचर" में होने वाले आयोजन 'डायलोग" की रिपोर्ट भी साझा की थी! इसका अगला आयोजन भी शीघ्र ही होने वाला है...आईये और आप भी कविता पाठ का आनंद उठाइए...... तो मुझे कविता पढना और सुनना दोनों अच्छा लगता है! और आपको?

तोहरा नियर जिनगी में कोई ना हमार बा - सुधीर सुमन


युवानीति द्वारा सांस्कृतिक जनोत्सव अभियान की शुरुआत और कवि भोला के अभिनंदन समारोह के मौके पर लिखी गई टिप्पणी

यह ऐतिहासिक मौका है कि युवानीति आज उसी मुहल्ले में नाटक करके अपने नए अभियान की शुरुआत कर रही है, जहां से उसने चैतीस साल पहले कथाकार मधुकर सिंह की कहानी ‘दुश्मन’ के मंचन के साथ अपने सफर का आरंभ किया था। इस बार वह नाटक के साथ कविता और फिल्मों को लेकर भी आई है। फिल्में भी ऐसी जो आम तौर पर सिनेमा हाॅल और टीवी पर नजर नहीं आतीं, पर जो जनता के हित में हैं और उसकी बदहाली के वजहों की शिनाख्त करती हैं। जो जनता की जिंदगी को बदल देने का रास्ता बताती हैं। और कविता की वही पंरपरा है जिसे रमता जी, नागार्जुन, गोरख पांडेय, विजेंद्र अनिल, अकारी जी, नरायण कवि आदि ने गढ़ा है, जो कविता गरीब-मेहनतकश जनता के संघर्षों की ऊर्जा और बुनियादी बदलाव के संकल्प से लैस है। भोला कवि की जिंदगी की जद्दोजहद ने इसी परंपरा में उन्हें अपनी मुक्ति की तलाश के लिए प्रेरित किया है। आज यह सुखद संयोग है कि इस आयोजन में युवानीति-जसम और आरा शहर के नागरिकों की ओर से उनके कविकर्म के लिए उन्हें सम्मानित किया जा रहा है।
मैं और युवानीति के पूर्व सचिव सुनील सरीन ट्रेन के रद्द हो जाने के कारण इस आयोजन में शामिल नहीं हो पाए हैं। बेशक इस वक्त हम देश की राजधानी दिल्ली मंे हैं, जहां सिर्फ और सिर्फ देश की गरीब-मेहनतकश जनता को छलने की योजनाएं बनती हैं, लेकिन आज हमारी निगाह अपने आरा शहर के इस छोटे से मुहल्ले पर लगी हुई है, जहां जनता के सांस्कृतिक-राजनीतिक और सामाजिक जीवन को बदलने की जद्दोजहद चल रही है, जहां दिल्ली-पटना के सरकारों के विकास और सुशासन के नकली दावांे के खिलाफ जनता के बदलाव की आकांक्षा को स्वर मिल रहा है। न केवल स्वर मिल रहा है, बल्कि इस आकांक्षा को यहां सम्मानित भी किया जा रहा है। भोला जी की कविताएं क्या हैं, आम जनता का दुख-दर्द ही तो है उनमें, जनता की जिंदगी में बदलाव के लिए जो लंबा संघर्ष चल रहा है, जो उसकी आजादी, बराबरी और खुदमुख्तारी का संघर्ष है, उसी के प्रति उम्मीद और भावनात्मक लगाव का इजहार ही तो है उनकी कविताएं। उन्होंने कोई पद-प्रतिष्ठा और पुरस्कार के लिए तो लिखा नहीं। जिस तरह कबीर कपड़ा बुनते हुए, रैदास जूते बनाते हुए कविताई करते रहे, उसी तरह भोला पान बेचते हुए कविताई करते रहे हैं। भोला आशु कवि हैं यानी ऐसे कवि जो तुरत कुछ पंक्तियां गढ़के आपको सुना देते हैं। महान कवियों के इतिहास में शायद भोला का नाम दर्ज न हो पाए, पर जिस तरह इतिहास में बहुसंख्यक जनता का नाम भले नहीं होता, लेकिन वह बनता उन्हीं के जरिए है, उसी तरह भोला की कविताएं भी हैं। वे आरा काव्य-जगत की अनिवार्य उपस्थिति रहे हैं। जसम के पहले महासचिव क्रांतिकारी कवि गोरख पांडेय की याद में हर साल होने वाले नुक्कड़ काव्यगोष्ठी ‘कउड़ा’ के आयोजन में भोला जी का उत्साह देखने लायक होता है। हमने देखा है कि जब भी उन्हें कार्यक्रमों में बोलने का मौका मिला है, वे कम ही शब्दों में बोलते रहे हैं, पर हमेशा उनकी कोशिश यह रही है कि कुछ सारतत्व-सा सूत्रबद्ध करके रख दें। और ऐसे मौके पर अक्सर लोग उनकी कुछ ही पंक्तियों के वक्तव्य पर वाह, वाह कर उठते रहे हैं।
भोला को मैं अपने बचपन से नवादा थाने के इर्द-गिर्द ही पान की गुमटी लगाते देख रहा हूं। वहीं बैठकर वे गरीब-मेहनतकशों पर जुल्म ढाने वाले थाने और कोर्ट को उड़ाने और जलाने की बात करते रहे हैं, बेशक व्यावहारिक तौर पर नहीं, जुबानी ही सही, पर इन संस्थाओं के प्रति जनता का जो गहरा गुस्सा है, वह तो इसके जरिए अभिव्यक्त होता ही रहा है। कितनी बार उन्हें प्रशासन के अतिक्रमण हटाओ अभियान के कारण वहां से हटना पड़ा, पर बार-बार वे वहीं आकर जम जाते रहे। उनका पान दूकान आरा में जनसंस्कृति और जनता की राजनीति से जुड़े लोगों के मेल-मिलाप का अड्डा रहा है। और वे खुद भी तो शहर में भाकपा-माले के हर आंदोलन और अभियान का अनिवार्य अंग रहे हैं। वे उन समझदार लोगों में नहीं हैं, जो सिर्फ अपनी और अपने घर-परिवार की ही जिंदगी को बदलने में लगे रहते हैं, बल्कि वे उनकी कतार में रहे हैं, जो सबकी जिंदगी को बदलते हुए अपनी जिंदगी को बदलना चाहते हैं। भले व्यंग्य में कभी उन्होंने खुद पर बेवकूफ पान वाले का लेबल लगा लिया था, पर वे पढ़े-लिखे और अपने ही निजी स्वार्थ की दुनिया में खोये रहने वाले समझदारों में से नहीं हैं, बल्कि उन समझदारों में से हैं जिनके लिए रमता जी ने कहा था कि राजनीति सबके बूझे के बुझावे के पड़ी, देशवा फंसल बाटे जाल में छोड़ावे के पड़ी। भोला जी शहर में माले और जसम की गतिविधियों मे शिरकत करते और पान की दूकान पर बैठे हुए कांग्रेस और गैर-कांग्रेस की तमाम सरकारों को आते-जाते देखते रहे हैं और उन्होंने महसूस किया है कि गरीबों की पीड़ा खत्म ही नहीं हो रही है। आप इसी गीत को देख लीजिए-
कवन हउवे देवी-देवता, कौन ह मलिकवा
बतावे केहू हो, आज पूछता गरीबवा
बढ़वा में डूबनी, सुखड़वा में सुखइनी
जड़वा के रतिया कलप के हम बितइनी
करी केकरा पर भरोसा, पूछी हम तरीकवा 
बतावे केहू हो, आज पूछता गरीबवा
कांग्रेस के लंबे शासन के बाद लालू जी जो ब्राह्मणवाद और धार्मिक अंधविश्वास की आलोचना करते हुए सत्ता में आए थे, वे बहुत ही जल्दी उसी की शरण में चले गए, लेकिन भोला जी ने ऐसा नहीं किया। बल्कि अपनी पान की दूकान पर बैठकर उनकी सरकार की भी आलोचना की। जिंदगी भर वे किराये के घर में रहे, बाल-बच्चों के लिए जितना करना चाहिए था, उतना कर नहीं पाए, लेकिन वे अपनी मुश्किलों के हल के लिए किसी देवी-देवता के शरण में नहीं गए और ना ही मुश्किलों के कारण निराशा में डूबे। उनकी कविता में भी गरीब तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद सवाल पूछता है और यह सवाल पूछना ही उनकी कविता और व्यक्ति दोनों की ताकत है। मुझे जनमत के पुराने अंक में पढ़ी हुई ‘मैं आदमी हूं’ शीर्षक की उनकी एक कविता याद आती है, जिसमें उन्होंने मेहनतकश मनुष्यों की जुझारू शक्ति, शान और सौंदर्य के बारे में लिखा था। इतना ही नही, भोला ने जाने-अनजाने हमें यह सिखाया कि गरीब-मेहनतकश आदमी की निगाह से देखने से ही शासन-प्रशासन के दावों और समय का असली सच समझ में आ सकता है। ‘पढ़निहार बुड़बक का जनिहें, का पढ़ावल जा रहल बा’ कविता इसी की तो बानगी है, जिसमें वे अखबार की खबरों पर सवाल उठाते हुए कहते हैं कि नीचा को ऊंचा और ऊंचा को नीचा बताया जा रहा है, जिन्हें शरीफ कहा जा रहा है, दरअसल लोगों की निगाह वे लुच्चे हैं। उसी कविता में आगे वे कहते हैं गरीबन के कइसे गारल जा रहल बा। अपनी आवाज के जरिए वे बकायदा गारने ( कसकर निचोड़ने) की प्रक्रिया को भी व्यक्त करते हैं।
आज जबकि बिहार सरकार ग्लोबल समिट के नाम पर जनता के करोड़ो रुपये फूंक रही है और जिस तरीके से जनता को बेवकूफ बनाने का खेल चल रहा है, उसके परिप्रेक्ष्य में मुझे जनमत में ही सितंबर 87 में छपी भोला जी की एक और कविता की याद आती है- जान जाई त जाई, ना छूटी कभी/ बा लड़ाई इ लामा, ना टूटी कभी (जान जाए तो जाए, पर न छूटेगी कभी/ है लंबी लड़ाई जो नहीं टूटेगी कभी)। और इस लंबी लड़ाई में यकीन के बल पर ही भोला आज दो टूक कहते हैं- जनता के खीस (गुस्सा), देखिंहे (देखेंगे) नीतीश। भोला जानते हैं कि यह लड़ाई लंबी है और इस लंबी लड़ाई में दुश्मनों और दोस्तों की पहचान लगातार होनी है। जिस तरह गरीब जनता सरकार और प्रशासन के नस-नस को जानती है, उसी तरह भोला भी उन्हें जानते-समझते हैं। उनके पैमाने से अफसर और मच्छड़, हड्डा और गुंडा, नेता और कुत्ता एक ही हैं। अब नेता तो जनता के संघर्ष के भी होते हैं, पर उनके लिए उनका पैमाना अलग है, यहां तो नेता साथी होते हंै। तभी तो 1987 की कविता में उन्होंने लिखा कि ‘साथ साथी के हमरा ई जबसे मिलल/ नेह के ई लहरिया, ना सूखी कभी।’ और यह नेह कभी नहीं खत्म नहीं हुआ। आज भी वे उसी लगाव से कहते हैं-
तोहरा नियर केहू ना हमार बा
मनवा के आस विश्वास मिलल तोहरा से
तोहरे से जुड़ल हमार जिनिगी के तार बा।
अस्वस्थता के कारण भले ही उनका शरीर कमजोर हो गया है, पर जिनिगी का तार पहले की तरह ही मजबूत है। सलामत रहे भोला का गोला यानी उनकी कविताओं की पुस्तिकाएं। सलामत रहे उनका लाल झोला और उसमें रखा उनका हथौड़ा, जिसके बल पर वे जनता के दुश्मनों से फरिया लेने का हौसला रखते रहे है।


कवि भोला की भोजपुरी रचनाएं और उनका हिंदी अनुवाद

तोहरा नियर केहू ना हमार बा
तोहरा नियर केहू ना हमार बा
देखला प अंखिया से लउकत संसार बा
मनवा के आस विश्वास मिलल तोहरा से
जिनिगी के जानि जवन खास मिलल तोहरा से
तोहरे से जुड़ल हमार जिनिगी के तार बा
देखला प अंखिया से लउकत संसार बा
हेने आव नाया एगो दुनिया बसाईं जा
जिनिगी के बाग आव फिर से खिलाईं जा
देखिए के तोहरा के मिलल आधार बा
देखला प अंखिया से लउकत संसार बा
दहशत में पड़ल बिया दुनिया ई सउंसे
लह-लह लहकत बिया दुनिया ई सउंसे
छोडि़ं जा दुनिया आव लागत ई आसार बा

(आप सब के जैसा कोई और हमारा नहीं है
आंख से देखने से सारा संसार दिखता है
मन को आशा और विश्वास आप ही से मिला है
जिंदगी को खास जान आप ही से मिला है
आप ही से मेरी जिंदगी का तार जुड़ा है
आंख से देखने से सारा संसार दिखता है
इधर आइए एक नई दुनिया बसाई जाए
जिंदगी के बाग को फिर से खिलाया जाए
आपको देखके ही मुझे आधार मिला है
आंख से देखने से सारा संसार दिखता है
यह सारी दुनिया दहशत में पड़ी हुई है
यह दुनिया लह-लह लहक रही है
इस दुनिया को छोड़के आइए, यही आसार लग रहा है)

जान जाई त जाई
जान जाई त जाई, ना छूटी कभी
बा लड़ाई ई लामा, ना टूटी कभी
रात-दिन ई करम हम त करबे करब
आई त आई, ना रुकी कभी
बा दरद राग-रागिन के, गइबे करब
दुख आई त आई, ना झूठी कभी
साथ साथी के हमरा ई जबसे मिलल
नेह के ई लहरिया, ना सूखी कभी
5सितंबर, 87 समकालीन जनमत में प्रकाशित

(जान जानी है तो जाए, पर नहीं छूटेगी कभी
यह लड़ाई तो तो लंबी है, नहीं टूटेगी कभी
रात-दिन यह कर्म तो हम करेंगे ही करेंगे
आना होगा तो आएगा ही, नहीं रुकेगा कभी
यह दर्द है राग-रागिनी का, जिसे गाऊंगा ही
साथी का यह साथ मुझे जबसे मिला है
स्नेह की यह लता तो नहीं कभी सूखेगी नहीं)

आज पूछता गरीबवा
कवन हउवे देवी-देवता, कौन ह मलिकवा
बतावे केहू हो, आज पूछता गरीबवा
बढ़वा में डूबनी, सुखड़वा में सुखइनी
जड़वा के रतिया कलप के हम बितइनी
करी केकरा पर भरोसा, पूछी हम तरीकवा
बतावे केहू हो, आज पूछता गरीबवा
जाति धरम के हम कुछहूं न जननी
साथी करम के करनवा बतवनी
ना रोजी, ना रोटी, न रहे के मकनवा
बतावे केहू हो आज पूछता गरीबवा
माटी, पत्थर, धातु और कागज पर देखनी
दिहनी बहुते कुछुवो न पवनी
इ लोरवा, इ लहूवा से बूझल पियसवा
बतावे केहू हो आज पूछता गरीबवा।

( कौन है देवी-देवता और कौन है मालिक
कोई बताए, आज यह गरीब पूछ रहा है।
बाढ़ में डूबे, सुखाड़ में सुखाए
जाड़ों की रातें कलप के बिताए
करें किस पर भरोसा, पूछें हम तरीका
कोई बताए, आज यह गरीब पूछ रहा है।
जाति-धरम को हमने कुछ नहीं जाना
साथी कर्म के कारणों को बताए
न रोजी है, न रोटी और न रहने का मकान
कोई बताए, आज यह गरीब पूछ रहा है।
मिट्टी, पत्थर, धातु और कागज पर देखे
उसे दिए बहुत, पर कुछ भी नहीं पाए
आंसू और खून से अपनी प्यास बुझाए
कोई बताए, आज यह गरीब पूछ रहा है।)





सोमवार, 13 फरवरी 2012

मैहर में - वेलेंटाइन डे के दिन - सुधीर सुमन

उस्ताद अलाउद्दीन खान के मैहर में कुछ घंटे
पिछले साल भोपाल में फैज पर आयोजित एक कार्यक्रम से लौटते वक्त मैं पहली बार मैहर गया था। यह उसी का रिपोर्ताज है.


13 फरवरी, 2011, भोपाल, जश्ने फैज।
इंकलाब का इश्क, इश्क का इंकलाब-
बामे मीना से माहताब उतरे, दश्ते साकी में आफताब आए
हर रगे खूं में फिर चरागां हो, सामने फिर वो बेनकाब आए।
कैसा है वह महबूब जो बेनकाब होके सामने आए तो हर रगे खूं में चरागां हो जाएगा! अचानक मानो कोई भेद पा लिया हो मैंने। पहली बार जैसे इन पंक्तियों का पूरा अर्थ खुला। ट्रेन तो छूट ही जाती, अगर दोस्त राजू को एक बार उसका समय न देखने को कहता।
रात के अंधेरे से होके ट्रेन भागी जा रही है, भीतर भी कोई सफर जारी है। कटनी स्टेशन गुजर चुका है। एक अजीब-सा रोमांच है। मालूम है कि जहां उतरना है वह छोटा-सा स्टेशन है, कहीं आंख न लग जाए। जाग रहा हूं। रात धीरे-धीरे घुल रही है किसी रोशनी के भीतर। रात का अंतिम प्रहर है। राग बसंत का कोई टुकड़ा जेहन में चल रहा है। अभी सूरज की लालिमा दूर है। सुबह के पहले प्रहर का राग अल्हैया बिलावल चेतना के किसी तलघर में बज रहा है। फूलों के बंद पंखुड़ी मानो धीरे-धीरे खुल रहे हों, संग भागते दृश्य अब खुलने लगे हैं। घरों और वृक्षों के साये नजर आ रहे हैं। खेत हंै और खेतों में गेहूं की फसल है, इसका अंदाजा हो रहा है। एक साधु टेªन के गेट के पास खड़ा है। उसे भी वहीं उतरना है। आखिर सूरज भी आज हमारे साथ ही दाखिल होता है वहां। हल्का ललछौंहा सूरज, परवाज करते पंछी, ज्यों मद्धम सा कोई राग, जैसे राग जैजैवंती। जिसके सरोद और जिसकी भैरवी का जादू हमारे हृदय को हमेशा झंकृत करता रहा है, आज उसी साधक की कर्मभूमि पर था। और भैरवी ही क्या, उसने तो कितने ही राग-रागनियों को साधा था, उसे तो हेमंत, शोभावती, दुर्गेश्वरी, मदनमंजरी सरीखे कई रागों के निर्माण का श्रेय जाता है, वह तो कई-कई साज बजाने में पारंगत था, कई साजों के महान फनकारों का वह उस्ताद था। उसके शिष्य आज भी दुनिया में उसका नाम रोशन कर रहे हैं। उसी ने तो आम लोगों का एक बैंड बनाया था- मैहर बैंड। 14 फरवरी की वह सुबह सदा के लिए यादगार बन गई। मैं पहली बार मैहर में था, भारतीय शास्त्रीय संगीत के महान उस्ताद अलाउद्दीन खान की जमीन पर।
मैहर- एकदम छोटा-सा स्टेशन है। जहां टिकट मिलता है, वहीं एक तरह से क्लाॅक रूम भी है। अपना भारी-भरकम बैग थमाया, रसीद ली और चल पड़ा किसी वाहन की तलाश में। चाय पीते हुए पता चला कि अकेले जाने पर छह गुना अधिक किराया लगेगा। समय कम है, अगली ट्रेन भी पकड़नी है। एक किशोर आॅटो वाले को हाथ देता हूं। वह नहाने पर जोर दे रहा है, पहले मुझे ऐसी जगह ले जाना चाहता है, जहां नहा भी सकूं। मैं पूछता हूं कि मैं बिना नहाया लग रहा हूं, तो वह सकपकाता है। आॅटो खुली और मैंने उससे पूछा कि क्या उस्ताद अलाउद्दीन के बारे में वह जानता है, 2 मिनट भी न हुए होंगे, उसने उनके घर के सामने आॅटो रोक दिया, घर रास्ते में ही था। सुबह हो चुकी थी, गेट बंद था। सामने बड़ा सा कैंपस था, गेरु रंग की दीवारें और खिड़़की और झरोखों का रंग- हरे और नीले का मेल हो जैसे। बायीं ओर एक खूबसूरत कलाकारी वाला घर, ऊपर एक छप्पर, बाद में मालूम हुआ कि वह मजार था। खैर, बाहर से मैंने घर की तस्वीरें ली और आगे बढ़ गया कि लौटते वक्त देखूंगा।
मैं पहले पहाड़ पर मौजूद सरस्वती का वह मंदिर देखना चाहता हूं, जहां अलाउद्दीन खां संगीत की साधना करते थे। ड्राइवर आॅटो आगे बढ़ा देता है। वहां पहुंचते ही वह जोर देने लगा कि चलिए मैं अपने जान-पहचान के प्रसाद वाले ले चलता हूं, वह ठीक-ठाक प्रसाद देता है। मैंने उससे कहा कि मुझे प्रसाद वगैरह नहीं लेना, मैं सिर्फ इस मंदिर को देखने आया हूं। उसने अजीब तरीके से मुझे देखा और तुरंत बोला- ‘तब मुझे भाड़़़़ा दीजिए, मैं चलूं।’ जबकि उसने वादा किया था कि लौटते वक्त वह मुझे उस्ताद के घर ले जाएगा। जाहिर है देवी तो इन लोगांे के लिए रोजी-रोटी हैं और भक्त उसके माध्यम। उसने रास्ते में बताया भी कि इस कस्बे की जो भी तरक्की हुई, वह देवी के कारण ही हुई है। यद्यपि तरक्की कितनी हुई है, यह तो वहां मौजूद बहुसंख्यक लोगों के चेहरे और उनके कपड़ों से महसूस किया जा सकता है। आॅटो चालक जिसने बड़े गर्व से बताया था कि उसके पिता ने भी मंदिर तक सीढि़यां बनाने के लिए पत्थर काटा था, और कि उस्ताद बड़े कलाकार हैं, जिन्होंने मैहर का नाम पूरी दुनिया में रोशन किया, पैसे लेकर अगली सवारी की तलाश में निकल गया। हालांकि एक जगह चप्पल रखने के चक्कर में संकोचवश प्रसाद तो मुझे लेना ही पड़ा, वह अलग किस्सा है। खैर, आॅटो से उतरते ही सामने दिखते पहाड़़ों ने नजर को जैसे बांध लिया।
मोबाइल का कैमरा आॅन किया और उस सड़क पे आगे की ओर बढ़ चला, जो मंदिर की ओर जाती है। सुबह के लगभग साढ़े सात बज रहे थे। चिडि़यों की चहचहाहट से वातावरण गुंजायमान था। मुझे मोबाइल से तस्वीरें लेते देख, एक छोटे लड़़के ने आवाज दी- इसका फोटो खींचो, उसने अपने से एक बड़े लड़़के की ओर इशारा किया, जो एक कुर्सी पर बैठा हुआ था। मैंने उसकी तस्वीर ली, वह थोड़़ा-सा अचकचाया, लेकिन छोटे लड़के को खुश देखकर फिर सामान्य हो गया। सड़क के दोनों ओर चुनरी और प्रसाद की दूकानें थीं। पयासी जी, पांडेय प्रसाद भंडार, कामना प्रसाद भंडार, इसी तरह के कई टीन शेड वाले भंडार यानी प्रसाद की दूकानें। ग्रामीण स्त्री पुरुषों का समूह और बच्चे बडे जोश में उनसे कदम से कदम मिलाते चले जा रहे हैं, कहीं पीछे न रह जाएं, मुड़ मुड़ के देखती एक छोटी-सी बच्ची, बार-बार मेरे मोबाइल कैमरे की जद में आती है। एक बूढी अपने परिवार के पुरुष सदस्य से धीरे चलने का आग्रह करती है- आगिए चली जाइत हऊअ भइया!  मेरे बायें पुलिस चैकी है- ‘पुलिस चैकी, शारदा धाम, मैहर’ और दायीं ओर आगे एक विशाल ‘दीवार पोस्टर’ की तरह विवेकानंद की मूर्ति- उनकी सर्वाधिक मशहूर छवि। विवेकानंद की मूर्ति यहां किसने बनाई और उसका क्या मकसद हो सकता है, एक पल ये सवाल आए जेहन में, पर दृश्य तो तेजी से बदल रहे थे और कानों तक आती आवाजें भी। अब निगाह कैफे सुरबहार पर चली गई, बनाया है मध्य प्रदेश राज्य पर्यटन विभाग ने, मगर वह सिर्फ कैफे है, सुरबहार की आज की हकीकत है- कइसे बनी कइसे बनी फुलौरी बिना चटनी कइसे बनी और ये गोटेदार लहंगा जैसे गीतोें की तर्ज पर बने धर्मिक गीत- आठो पहर मां की करती हूं पूजा/ मन में बसी हो, मन में बसी.... म्यूजिक बहुत तेज है।
तेज ही नहीं, कुछ ज्यादा ही सुलभ भी है आजकल म्यूजिक, उसको तो हम जेब में ही डाले घूमते रहते हैं। अचानक मोबाइल घनघना उठता है।
-अच्छा, तो आज वेलेंटाइन डे है! ओहो, 14 फरवरी है न! तो क्या करूं? शमशेर की पंक्तियां झटके से जेहन में आती हैं- इल्मो-हिकमत, दीनो-ईमां, मुल्को-दौलत, हुस्नो-इश्क/ आपको बाजार से जो कहिए ला देता हूं मैं। एक शरारत भरा तंज फेंका जाता है कि मेरे जैसा नास्तिक भी मंदिर में पहुंच गया। लेकिन धर्म का जो बाजार सजा है, उसमें तो कोई खरीदार बनके गया ही नहीं हूं मैं, और न ही मुझे देवी से कुछ मांगना है। क्या फर्क पड़ता है कि किसी महानगर या नगर के मार्केट में नहीं हूं, मैहर में हूं वेलेंटाइन डे के दिन।
सुनते हैं कि मैहर के राजा बृजनाथ उस्ताद अलाउद्दीन को मैहर ले आए थे। लेकिन कितना गहरा स्वाभिमान था उस जमाने के कलाकारों में! कहीं पढ़ी हुई एक घटना की याद आ गई कि किस तरह एक सूटेड-बूटेड युवक आया और बागीचे में साधारण पोशाक में मिट्टी से सने उस्ताद को देखकर उन्हें माली समझ बैठा और उस्ताद को बुलाने के लिए कहा। उस्ताद ने पूछा कि क्या काम है, तो उसका जवाब था कि संगीत सिखना है। उस्ताद ने कहा कि वे आराम कर रहे हैं, तो उसने बिगड़कर कहा कि जाकर कहो कि कोई बड़ा आदमी आया है। खैर, उस्ताद अंदर गए और कपड़े बदलकर जब बाहर आए तब तक एक रियासत के राजा पहुंच गए और उन्होंने पहुंचते ही उनके पैर छुए। अब शागिर्द बनने आया नौजवान लगा माफी मांगने। इस पर उस्ताद बोले- तुमसे कोई भूल नहीं हुई, जिनके पास दो पैसे आ जाते हैं, वे गरीबों को इसी निगाह से देखते हैं। रही संगीत सिखाने की बात तो मैं तुम्हें संगीत नहीं सिखा सकता, क्योंकि जिस आदमी के दिल में गरीबों के लिए कोई दर्द नहीं है, उसमें संगीत जन्म नहीं ले सकता। कहते हैं कि उसने उस्ताद को रुपये पैसे का लालच भी दिया, लेकिन उनका दो टूक जवाब था- संगीत को रुपये-पैसे से नहीं खरीदा जा सकता।
मालूम नहीं यह घटना कितनी सच्ची है, लेकिन एक प्रिय और आदर्श कलाकार की जो छवि जनता गढ़ती है, वह भी तो कुछ ऐसी ही होती है न! कुदरत में मौजूद और हमारे अपने भीतर मौजूद संगीत की साधना भी तो किसी पहाड़ पर दम साधकर चढ़ने जैसा ही होता होगा। ऊपर पहाड़ पर मौजूद मंदिर को देखकर मैं तो सिर्फ कल्पना ही कर सकता हूं कि कैसे उस्ताद उस मंदिर में पहुंचते होंगे और किस तरह उनकी संगीत साधना चलती होगी।
 गो कि अब तो हमारे लिए मंदिर तक जाने के लिए लिफ्ट भी था। लेकिन अपने पैरों से पहाड़ पर चढ़ने की चुनौती छोड़कर लिफ्ट में कौन जाए! और वैसे भी जब सीढि़यां हों तो चढ़ना थोड़ा आसान हो जाता है। लेकिन आप आदी न हों तो थोड़ी अतिरिक्त मेहनत और ताकत तो लगती ही है। एक ओर सीढि़यों पर बैठे हैं भीख मांगते लाचार भिखारी, तो दूसरी ओर उन पर सीमेंट कंपनियों और सेठों के नाम विराजमान हैं- यश की लालसा है या विज्ञापन! दावे हैं कि किसी ने 200 तो किसी ने 400 तो किसी ने 500 सीढियां बनवाई है। इस लिहाज से तो लगता है करीब 1000 सीढि़यां तो चढ़ना ही पड़ेगा, वैसे सीढि़यां गिनने में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं है। मैं तो एक सुर में ऊपर जाना चाहता हूं, पर एक जगह दो-तीन मिनट के लिए रुकना पड़ता है। एकाध पेड़ों पर फूल नजर आते हैं। लगता ही नहीं कि बहार का मौसम है। झड़े हुए पत्तों वाले एक पेड़ पे एक बड़ा-सा सुर्ख लाल फूल आकर्षित करता है अपनी ओर। पहाड़ से नीचे एक जगह पानी ऐसे जमा हुआ है, जैसे किसी ने कहीं से उठा के उसे वहां रख दिया हो और वह वहीं लेट गया हो पैर पसारे, सिर ढलका है, बाजू फैले हैं, अपने बिखरे हुए कपड़ों का भी मानो उसे ध्यान नही है, वह ठहरा हुआ पानी मानो नींद में है अब तक- सुबह की सुगबुगाहटों से बेखबर।
देवी के मंदिर तक विज्ञान का पहुंचना लाजिम हैं, बिजली के तार हैं, जिस पर बैठी एक चिडि़या को देख रहा हूं। भीड़ में फंसा हुआ, धीरे-धीरे ऊपर खिसक रहा हूं। फिल्मी पैरोडी का शोर थमा नहीं है, पर इसी शोर में अचानक स्थानीय भाषा में गीत गाता महिलाओं का एक काफिला मिलता है, कानों को कुछ राहत मिलती है। सोचता हूं कि कितना अच्छा होता कि या तो इन ग्रामीण महिलाओं की आवाज होती या सुबह के इस वक्त उस्ताद की भैरवी ही यहां गूंज रही होती या वायलिन पर उनके द्वारा संगीतबद्ध कीर्तन ही बज रहा होता, तो वातावरण कितना सुकूनदेह होता। लेकिन वह सब तो बस सीडी और इंटरनेट में है। उस महान साधक ने जहां वर्षों तक साधना की, वहीं से उसका महान सम्मोहक संगीत लापता है और फिल्मी गानों के तर्ज पर बनाए गए सतही किस्म के धर्मिक कहे जाने वाले गानों का बोलबाला है।
देर हो रही है, भीड़ में बच्चों के रोने की आवाजें हैं। लोग इतने हैं कि सीढि़यां कुछ ज्यादा ही संकरी लग रही हैं। नीचे झांकने पर हल्का-सा डर लगता है। अचानक कुत्तों के चिल्लाने और लड़ने की आवाज आती है, भीड़ में किसके पैर के नीचे दबे, पता नहीं! कहीं किसी के पैर के नीचे तो नहीं आ गए! ठीक मंदिर के पास वाली सीढ़ी से पहले मोड़ पर हैं हम। अपने अंदर से ही कोई चिल्लाता है- यहीं आना था तुम्हें, अभी अगर भगदड़ मच जाए तो चले जाओगे हजार फिट नीचे। वह व्यंग्य भी करता है- कितना अच्छा है, मोक्ष पा जाओगे! लेकिन एक बार चल पड़े तो वापस लौटना मुश्किल है, जो हो, जाना तो पड़ेगा ही ऊपर तक। एक तरफ बाबा अलाउद्दीन की लगन, उनकी साधना और मां शारदा के प्रति भक्ति का इतिहास है, तो दूसरी ओर एक भीड़ का वर्तमान है, जहां एक मैहर माई हैं, जो लोगों की मनोकामनाएं पूरी करती हैं। दर्शनार्थियों में महिलाओं की संख्या अधिक है। आर्थिक रूप से ज्यादातर निम्न और कुछ मध्यवित्त लगते इन भक्तों के लिए कोई फर्क नहीं पड़ता कि मूर्ति किसकी है, इतना ही काफी है कि वह देवी हैं, वैसी ही जैसी बहुत सारी देवियां होती हैं। आखिर हम मंदिर में पहुंच जाते हैं, जहां मूर्ति को ठीक से देख पाना भी संभव नहीं है। जल्दी-जल्दी निकल जाने का निर्देश है। लोगों को भी इससे मतलब नहीं है कि कब की मूर्ति है, कैसी मूर्ति है। फोटो खींचना मना है, फोटो में देख लेंगे तो यहां आएंगे क्यांे! बाजार प्रभावित होगा न! ऊपर पर्याप्त चैड़ी जगह है।
मैं मंदिर के चारों ओर मौजूद दूसरे पहाड़ों को देखने में मशगूल हो जाता हूं। सूखे घास और उसके रंग वाली झाडि़यों और बौने पेड़ों वाले पहाड़ हैं और पहाड़ों के सामने वाले हिस्सों को जैसे किसी ने बिल्कुल सीधी दीवारों की तरह तरास दिया है। दूसरी ओर पहाड़ों के नीचे बीच के समतल मैदानी जगह में कुुछ छोटे-छोटे खेतों में बिछी हरियाली की चादर और पानी के दर्पणों का अपना जादू है। मोबाइल कैमरे को जूम करके खेतों की हरियाली को करीब लाता हूं। चारों ओर अद्भुत लैंडस्केप है, ट्री स्केप और माउंटेन स्केप भी। दूर क्षितिज पर चारों ओर कुछ धुंध-सा है, आसमान नीला और पहाड़ मैटमैले, सामने बिल्कुल पास के पेड़ों के पत्ते पर कुछ पीलापन अधिक है।  मंदिर के पीछे की सड़क पर बिल्कुल शांति है। कहीं दूर कौए की कांव-कांव की आवाज सुनाई पड़ती है। कोई पक्षी बोल रहा है- डिक, डिक, डिक, डिक,....एक परिक्रमा-सा हो जाता है।
 अचानक घड़ी पर निगाह जाती है, अरे! ट्रेन का समय नजदीक आ रहा है। लगभग कूदता-फांदता, वापस लौटते लोगों के बीच से रास्ता बनाता, तेजी से नीचे उतरता हूं और पहंुच जाता हूं उस्ताद के घर। इस बार गेट खुला मिलता है। जिसने भारतीय शास्त्रीय संगीत को कई रत्न दिए उस अप्रतिम साधक की मजार के पास खड़ा हूं। उसी कैंपस में उनकी तथा उनकी पत्नी की मजार है। सामने जो घर है उसके दरवाजों की रंगाई का काम हो रहा है। मैं एक मजदूर से पूछता हूं कि क्या उस्ताद से संबंधित कुछ चीजें देख सकता हूं। एक प्रौढ़ सज्जन आते हैं और मुझे अंदर वहां ले जाते हैं, जहां उस्ताद की जिंदगी के सफर को समेटे हुए कई तस्वीरें मौजूद हैं। कहीं वे अंग्रेजी सूटबुट मे कड़ी-नुकीली मूंछों में किसी रायबहादुर सरीखे दिखते हैं, कहीं प्रधानमंत्री राजेंद्र प्रसाद से पद्मभूषण ले रहे हैं, षष्ठिपूर्ति के मौके पर मिला अभिनंदन पत्र भी है। उनके गुरु अमीर खां और उनके भी गुरु की तस्वीरें हैं। उस्ताद पांच भाई थे। पांचों एक तस्वीर में नजर आते हैं। उस्ताद अकबर अली खान की भी तस्वीर है। वे सज्जन जिनकी तीन पीढि़यां उनकी सेवा में रही है, बताते हैं कि यहीं रविशंकर और निखिल बनर्जी को वे संगीत सिखाया करते थे। उनका नाम है दंडक रावत।
विजीटर बुक में जसम की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की ओर से अपनी साझी संस्कृति की इस महान प्रतिभा के प्रति अपने उद्गार दर्ज करता हूं। दंडक जी मुझे उनके मजार के पास ले जाते हैं, चेंबर खोल के दिखाते हैं चिरनिद्रा में सोए उस्ताद को। मैं उन्हें सलाम करता हूं। बाहर दीवार पर एक बड़ा शिलापट्ट लगा हुआ है जिस पर यह दर्ज है कि यह मजार पद्मविभूषण आचार्य बाबा अलाउद्दीन खां साहब और माता श्रीमती मदीना खातून की स्मृति में बनाई गई है। किसी का लिखा हुआ याद आता है, अपनी पत्नी मदीना खातुन के लिए ही उस्ताद ने राग मदनमंजरी बनाया था। इस मजार को बनाने का काम 13. 2. 1992 को शुरू हुआ और 15.12.1994 को पूरा हुआ। इसके निर्माण में वास्तुशिल्पी तपन घोष, मिस्त्री मुहम्मद कमरुद्दीन, लखानी लाल पटेल की भूमिका और बाबा के घराने के कुछ छात्रा और अनुयायी तथा पंडित रविशंकर के सहयोग का भी जिक्र है।
बाबा के पुत्र और शिष्य अली अकबर खान के तरफ से लिखा गया यह संदेश पढ़ता हूं- ‘‘मेरा यह हार्दिक विश्वास है कि एक महान संगीतज्ञ और महात्मा की स्मृति में निर्मित यह मजार किसी प्रकार के जाति, रंग एवं धर्मभेद न रखते हुए जीवन के उच्च लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए भावी पीढ़ी को प्रेरित करेगी और उनका ज्ञान पथ आलोकित करेगी।’’ मेरे मुंह से अनायास निकल जाता है- आमीन!
हर साल यहां संगीत समारोह होता है। इस समारोह में आने की सोचता हुआ, उस कैंपस से निकलता हूं। जल्दी जल्दी भाग रहा हूं, स्टेशन की ओर। जोरों की भूख भी लगी हुई है। एक नौजवान से स्टेशन की ओर जाने वाली सड़क के बारे में पूछता हूं। वह भी स्टेशन जा रहा होता है। अपना नाम साहबलाल कोल बताता है, नेहरु युवा कंेद्र और किसी एक एनजीओ से जुड़ा हुआ है। इस इलाके की शिक्षा के कम प्रतिशत को लेकर चिंतित है। उसे लगता है कि एनजीओ के माध्यम से वह दूर-दराज के लोगों से जुड़ पाता है। वह किसी भी पिछड़े हुए, अभावग्रस्त इलाके के नौजवान-सा है। मां शारदा का नाम होटलों और दूकानों के साईनबोर्डों पर मौजूद हैं, लेकिन इस इलाके में शिक्षा को लेकर चिंतित इस नौजवान के सपने मालूम नहीं कब साकार होंगे! फिलहाल मंदिर की ओर जाने वालों की तादाद बढ़ गई है। मैं वापस लौट रहा हूूं। एक आॅटो के पीछे लिखा हुआ है- ऐ सनम तू जन्नत की हूर है, पर यह भी है कि तू मुझसे दूर है। सोच रहा हूं कौन किससे दूर है और क्यों? कला, शिक्षा, नया समाज, आजादी, प्रगति, बेहतर जिंदगी, इंकलाब!  फिर फैज हैं लबों पर-
आइए हाथ उठाए हम भी
हम जिन्हें रस्मे-दुआ याद नहीं
हम जिन्हें सोजे-मुहब्बत के सिवा
कोई बुत कोई खुदा याद नहीं।

बुधवार, 8 फरवरी 2012

घूमो तो दुनिया मेला है ...





हमको भी लगता था ऐसा /
कुछ लिख लेंगे,कुछ पढ़ लेंगे /
इस भागती-दौड़ती दुनिया में /
हम चार क़दम भी बढ़  लेंगे /

अपनी इन जागती आँखों में /
सपना जैसा इक सपना था /
बेगानों की इस भीड़ में भी /
लगता था कोई अपना था/

हमने भी वहम कुछ पाले थे /
हमको भी कुछ खुशफहमियाँ थीं /
महलों में तसव्वुर के कितनी /
ख्वाबीदा-सी शहज़ादियां थीं/

दुनिया तो बहुत आसान-सी थी /
क़दमों में रवानी,राहें सहल /
सब कुछ अपना-सा लगता था/
सोये लम्हे या जागते पल /

वो कमसिनी के कुछ क़िस्से थे/
वो बचपन की कुछ बातें थीं/
वो सादादिली का अफ़साना /
वो इश्क़ की नाज़ुक ग़ज़लें थीं/

और वक़्त ने एक लम्हा यकदम /
इक ऐसी भीड़ में ला पटका/
नाआशना था हर शख्श जहां /
हर शख्श जहां पर तनहा था/

था कौन यहाँ दिल का साथी /
एहसास से कैसा रिश्ता था/
बस उनको ही सब मानते थे /
जो ज़ाहिर था,जो दिखता था/

अपनी थी ख़्वाबों की दुनिया /
अपनी थी ख़लाओं की धरती /
अपनी थी जसामत कोई नहीं/
लोहा,सोना,पत्थर ,मिट्टी /

फिर भी तो सुकूँ इस बात का है/
सब चलता है,सब चलता है /
कातिल हो,ताजिर हो ,शैदा /
सब अपनी आग में जलता है/

आंसू हो हंसी ,दुख हो ,सुख हो /
सबका इक अपना हिस्सा है/
घूमो तो दुनिया मेला है/
देखो तो एक तमाशा है /
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मंगलवार, 7 फरवरी 2012

चंद ही रोज़ की क़िस्मत है ......





किसी ख़ुशबू की तरह आ के बिखर जाती है /
इक  उदासी  मेरे आँगन में बिखर जाती है  /
चंद बेबूझ तमन्नाओं की होती है निशस्त  /
जाने क्या सोचता रहता है ये बूढा-सा दरख़्त /
आस्मां एक वरक़,चाँद की हल्की-सी लकीर /
रात के सीने में पेवस्त धुंए  की   शमशीर /
चंद बदरंग मकां, हाँफते दर और दीवार  /
खिड़कियाँ परदों से उलझी हुईं ,कमरे बेज़ार /
दूर से आती  हुई  रिक्शे  की बेकल घंटी   /
और शराबी की वही गालियाँ कुछ फाहश-सी /
जाने से बिजली के हर ओर अन्धेरा वो दबीज़ /
याद आ जाना अचानक कोई भूली हुई चीज़ /
आस्मां तारों के ज़रिये से कोई करता सवाल /
और सीने में ज़मीं के कोई गहरा-सा मलाल /
मेरा  बेचैनी  से कमरे  में टहलना  यूं ही    /
अपनी नाअहली पे ग़ुस्से से उबलना यूं ही /
सुब्ह से शाम तक हर शख्श के चेहरे पे सवाल /
नारसा ज़िंदगी  ,हर एक तमन्ना बेहाल /
सारे मंज़र पे अजब एक मुलम्मा चस्पां /
भीड़ में देखिये हर शख्श का चेहरा वीराँ  /
पर चटानों से कोई बूँद फिसलती सी है /
ज़िंदगी जैसे हों  हालात,बहलती ही है /
आलमे-हब्स ,ये हर ओर थकन और घुटन /
टीस सी सीने में है सच है के है सीने में जलन /
ख़्वाब आँखों से किया करता है किस दर्जा गुरेज़ /
धडकनें हुआ करती हैं अक्सर कुछ तेज़ /
मुस्करा देता है जब नींद में ड़ूबा बच्चा /
ऐसे ही हब्स में लगता है के सक्ता टूटा /
तेज़ हो धूप मगर गुलमोहर देता है सुकूँ/
जाग उठता है अचानक कोई सोया-सा जुनूँ/
हाकिमे-शह्र,अभी जश्न मनाते जाओ /
ग़ोश्त इंसान का खाते हो तो खाते जाओ /
ज़िंदा मंज़र से जो खींचा है लगातार लहू /
दिल में आबादी के भर दी है अजब-सी इक hoo/
माना के पस्त हैं ,पजमुर्दा हैं,पसमांदा हैं लोग / 
ख़ूब फ़र्बा हो ,परेशान हैं दरमान्दा हैं लोग /
मौत की ज़हनियत ,तुम अपने ही जी की कर लो /
इनकी आहों से ही तुम अपने ख़जाने भर लो /
ज़िंदगी मौत से हारी है न हारेगी कभी /
सुब्ह को रोक ले, शब ऐसी न भारी है कभी /
चंद ही रोज़ की क़िस्मत है तुम्हारी ख़ातिर/
राज कर पाए न कर पाएंगे हम पर ताजिर /
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शुक्रवार, 3 फरवरी 2012

मैंने गलत सवाल नहीं उठाया था - प्रकाशन विवाद

  • Kumar Mukul शिल्पायन ने साल भर पहले ही मेरी इस किताब के प्रकाशन से मना कर दिया था एक विवाद के बाद पर अभी भी किताब इस साईट पे बिकती दिख रही है इसके क्या मानी है ,मित्र समझाएं
    मंगलवार को 21:01 बजे ·
  • Raju Ranjan ‎...order dekar dekhiye book aapke ghar pahunchti hai ki nahi ....agar pahunchti hai to editor ka purba hawa bahana padega....
    मंगलवार को 21:04 बजे · · 1
  • Ashish Pandey इसका अर्थ है कि डाटाबेस में एडिटिंग नहीं की गई !!और यदि फ्लिपकार्ट में add हो रही है तो उन्होंने छापी है फिर !!किसी अन्य के द्वारा आर्डर करके मंगवाएँ फिर आगे की बात हो सकती है ..
    मंगलवार को 21:09 बजे · · 2
  • Kumar Mukul देखते हैं इस तरह कर के भी ,उन्होंने नहीं छापी है जैसा वे कह रहे हैं तो इस तरह के झूठे विज्ञापन के क्या मायने ,यह तो नेट की चीजों की अविस्वसनिअता बतलाता है
    मंगलवार को 21:16 बजे ·
  • Ashish Pandey यह लापरवाही है.... बात चलते ही अपडेट तो कर दी !रिमूव करने पर सीक्वल प्रोग्रामिंग को बदलना होगा उस पर काम नहीं किया !!क्योंकि फिर इसके बाद जो पुस्तकें आई होंगी सबके कोड पुनः भरने पड़ेंगे सो मेहनत से बचने के लिए यह लापरवाही है ...
    मंगलवार को 21:21 बजे ·
  • Anju Sharma Mukul ji, ye laparvahi se jyada to beimani lag rahi hai.....
    मंगलवार को 21:25 बजे ·
  • Kumar Mukul haan beimani to hai hi, salon is kitab ka bigyapan hans aadi patrikaon me hota raha...ab lekhak ke pas dekhne ko net pe yah jhutha prachar hai,is kitab ke saath ki baki kitabon pe bhi to sawal uthta hai ki unme bhi kisi ke sath to aisa nahi hua
    मंगलवार को 21:51 बजे · · 1
  • Kumar Mukul अवनीश सिंह चौहान, माया मृग, सत्‍यानंद निरूपम, अशोक कुमार पांडेय आदि इस विषय से जुडे मित्रों से आग्रह है कि वे इस बारे में मेरी मदद करें कि मैं इस फ्राड से कैसे निपटूं
    मंगलवार को 22:06 बजे ·
  • Ashok Kumar Pandey Behtar ho ki aap us website par case kijiye. Lalit ka saaf kahna hai ki unhone yah kitab nahi chhapi hai. kya aapne is website se tathyon ki chhanbeen kii hai? Apka shilpayan ke sath kya samjhauta hua tha? contract ki sharten kya thiin? Yahan Public manch par koi hal nahi niklne vala. Yahan beimani ka aarop lagane se behtar hota ki aap Legal karyvahi karte.
    बुधवार को 00:53 बजे · · 1
  • Kumar Mukul अभी शिल्‍पायन के प्रकाशक ललित जी का फोन आया कि नेट पर यह उनके दवारा नहीं डाला गया है,कि मैं इसे हटा लूं, मैंने कहा कि आप फेशबुक पर हैं और वहां आप यह बात लिख दें कि यह विज्ञापन आपके दवारा नहीं
    बुधवार को 00:54 बजे ·
  • Kumar Mukul और जब तक यह नेट पर है मेरा अधिकार बनता है कि मैं इसे इस तरह सामने रखूं
    बुधवार को 00:55 बजे ·
  • Kumar Mukul अगर यह गलत है तो यह केस ललित जी करें क्‍योंकि मेरी ही नहीं तमाम किताबों की बाबत वहां लिखा है मतलब सारी किताबों कोप्रिट एशिया इस तरह बेच रहा है या उसका कोई इस्‍तेमाल कर रहा है
    बुधवार को 00:58 बजे ·
  • Kumar Mukul अशोक जी अगर कोई समझौता नहीं हुआ था तो फिर हंस अदि पत्रिकाओं में 200 रूपये पुस्‍तक की कीमत के साथ जो विज्ञापन आए वो बिना समझौते के क्‍यों आ गये
    बुधवार को 01:03 बजे ·
  • Ashok Kumar Pandey समझौता नहीं हुआ था, यह आप बता रहे हैं. आमतौर पर सही तरीका यही होता है कि पहले कांट्रेक्ट हो उसके बाद किताब छपे. खैर यह आपके और उनके बीच का मामला है. अब जब प्रकाशक कह रहा है कि किताब छपी ही नहीं है, वह बाज़ार में उपलब्ध नही है, उसके कैटलाग में नहीं है...तो एक वेबसाईट पर यह कैसे है यह वेबसाईट से पूछा जाना चाहिए. संभव है कि पहले यह योजना में रही हो, इसका विज्ञापन भी किया गया हो, फिर चूंकि कोई कांट्रेक्ट था ही नहीं तो प्रकाशक ने अपनी सुविधा से इसका प्रकाशन न किया लेकिन वेबसाईट ने इसे अपने यहाँ से हटाया भी नहीं. मेरा बस यह कहना है कि इस मंच से इसका कोई हल निकल ही नहीं सकता. बेहतर यही होगा कि इस वेबसाईट तथा प्रकाशक से बात कर मुद्दा सुलझाया जाय.
    बुधवार को 04:00 बजे · · 2
  • Kumar Mukul अशोक जी आपसे जैसी कि अभी बात हुयी आपने वेबसाईट को मेल किया है तो उसका जवाब आने दीजिए, रही बात प्रकाशक की तो मेरी ओर से आप ही बात कर लें और मुझे बातएं, मेरा बस इतना कहना है कि जब तक मेरी किताब का नाम पिंट एशिया पर शिल्‍पायन के साथ टैग है मैं उस तस्‍वीर को यहां और बाकी जगह जारी करूंगा, बाकी कमेंटस मैं हटा सकता हूं अगर उसमें कुछ आपत्‍तीजनक हो,
    बुधवार को 04:11 बजे ·
  • Alok Srivastava मुकुल जी...अगर प्रकाशक ने आपकी पुस्तक को प्रकाशित ही नहीं किया तो किसी भी वेबसाइट पर इसे जारी करना और दिखाना गैरकानूनी है.
    मै तो बोलूँगा की आप इस वेबसाइट से और प्रकाशक से पहले पूरा जवाब मांगे...हो सकता है की गलती से वेबसाइट पर से पुस्तक हटाई नहीं गयी हो और शायद सचमुच में पुस्तक नहीं छपी हो क्योकि पुस्तक का आवरण भी वेबसाइट पर उपलब्ध नहीं है.
    लेकिन किसी भी परिस्थिति में ये सरासर गलत है और प्रकाशक को इस का जवाब देना ही होगा...आप कृपया गूगल में सर्च कर के देखिये की ये पुस्तक कही किसी और वेबसाइट पर भी तो उपलब्ध नहीं है..
    बुधवार को 07:56 बजे · · 2
  • Kumar Mukul आपने सही कहा आलोक जी, मैंने पिछले विवाद के समय ही प्रकाशक से कहा था कि आप इस साइट पर से मेरी किताब हटवा दें क्‍योंकि आपकी बाकी सारी किताबें का भी प्रचार वहां हैं, पर उन्‍होंने फिर कोई जवाब नहीं दिया, वे बस एकतरफा चाहते हैं कि मैं इसकी कोई चर्चा ना करूं,अब मेरी किताब नाम कीमत के साथ अगर कहीं दिख रही तो मुझे उसकीचर्चा का अधिकार कैसे नही है
    बुधवार को 08:14 बजे ·
  • Kumar Sujeet Singh Kanhaiya मैंने printasia को अभी enquiry भेजी है. साइट ने २४ घंटों में जवाब देने की बात कही है. जवाब मिले तो आगे का पता चले:
    कविता का नीलम आकाश
    Author : कुमार मुकुल
    Language: Hindi
    Kindly inform the ISBN and year of publication of this book.
    How long it will take you to send the book after order?
    Thanks
    बुधवार को 08:37 बजे · · 1
  • Kumar Mukul चलिए भाई अच्‍छा किया आपने , देखें जवाब क्‍या आता है, और इधर का लिखा कुछ पढाइए
    बुधवार को 08:54 बजे ·
  • Kumar Sujeet Singh Kanhaiya यह प्रकाशन का उद्योग कुछ अजब है.
    कम्प्यूटर संबंधित मेरी दो अंग्रेजी पुस्तकें दिल्ली के गलगोटिया और कलकत्ता के एक प्रकाशक ने छापी थीं. गलगोटिया ने तो धेले भर रायल्टी न दी (पुस्तक की 5 प्रतियाँ दी थी!) जबकि पुस्तक कम से कम एक तो विदेशी विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में भी है. दूसरे ने तीन साल बाद मात्र कुछ सौ प्रतियों की बिक्री दिखा कर एक चेक भेजा जो bank से bounce हो गया. गुस्से में कानूनी नोटिस भेज कर उस चेक की रकम का ड्राफ़्ट ले पाया पर आगे कोई उम्मीद नहीं.
    एक बड़ी पत्रिका को दो तीन बार कुछ कविताएँ भेजीं – संपादक इतने मेहरबान सिद्ध हुए कि जिस दिन रचना पहुँची उसी दिन बिना कोई पर्ची तक लगाए जवाबी लिफ़ाफ़े में भरवा दी (आजकल तो स्पीडपोस्ट की डिलिवरी डेट मिल जाती है, वापसी लिफ़ाफ़े पर डाकखाने की मुहर भी दिख जाती है) – दो दिन रख कर फेंकते तो लगता कम से कम किसी सहायक ने तो दो मिनट दिए होंगे भेजे कागजों को.
    बुधवार को 09:14 बजे · · 1
  • Jayprakash Manas मैंने शिल्पायन के मालिक और व्यवस्थापक श्री शर्मा जी से बात की । उन्होंने बताया कि उनकी बात हो चुकी है आज ही कुमार मुकुल जी से । अच्छा होगा दोनों आपस में बात करके स्पष्ट करलें ।
    बुधवार को 09:16 बजे · · 1
  • Kumar Mukul हां मानस जी , हुई बात का जिक्र मैंने उपर किया है
    बुधवार को 10:02 बजे · · 1
  • Om Nishchal Mukul Bhai.jab kitab chhapi hi nhi to vigyapan se koi hani to nahi ho rahi. ulte prachar hi ho raha hai.hone dijiye, jab kahin aur se chhap jayegi to prakashak khud chinta karega.
    बुधवार को 22:41 बजे · · 4
  • Kumar Mukul प्रिंट एशिया का जवाब जो उन्‍होंने लेखक मित्र कुमार सुजीत सिंह कन्‍हैया को भेजा है - From:
    Date: Thu, Feb 2, 2012 at 6:04 PM
    Subject: Enquiry about a Book
    To: kss.kanhaiya@gmail.com

    Dear KSS Kanhaiya,

    Thank you for contacting Printsasia Customer Support.

    Sorry to say that the book "कविता का नीलम आकाश" you are looking for is out of stock at the moment.

    Please feel free to contact us, in case you find any book which is of your interest.

    Thanks,

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    बीते कल 08:58 बजे · · 1 ·
  • Kumar Sujeet Singh Kanhaiya इतना तो अब लग ही रहा है कि प्रकाशक ने printasia (एवं शायद अन्यों को भी) पुस्तक की खबर प्रकाशन के पूर्व ही दे दी होगी और अब तक पुस्तक की उपलब्धता की सूचना तथा पुस्तक की details (ISBN, प्रकाशन तिथि, मुखपृष्ठ का चित्र आदि) अब तक न दी है। शायद वे अभी भी प्रकाशित करने की योजना में हों और शर्तें तय करने की आवश्यकता हो।
    बीते कल 09:09 बजे ·
  • Kumar Mukul प्रकाशन से तो वे उसी समय इनकार कर चुके थे जब मैंने प्रिंट एशिया पर पहली बार किताब का यह विज्ञापन देखा और किताब आने के पहले ऐसे विज्ञापन के खिलाफ लिखा था , खैर देखते हैं कब तक प्रिंट एशिया पर यह विज्ञापन रहता है, नेट के तौर तरीकों का भी तो कुछ पता चले
    बीते कल 09:14 बजे · · 1
  • Om Nishchal मुकुल मेरे भाई, जीवन बस इसी एक काम के लिए नहीं है। इसका विनियोग
    केवल रचनात्‍मकता के लिए होने दो। प्रकाशन और नेट का तंत्र कुछ कुछ
    रहस्‍यवाद-सा है। इसकी सम्‍यक् टीका मुश्‍किल है।
    22 घंटे पहले · · 1
  • Maya Mrig आदरणीय मुकुल जी, कोई भी कार्रवाई से पूर्व पुस्‍तक का आदेश देकर वास्‍तविक स्थिति जानना, साथ ही संबंधित दोनों पक्षों से संवाद बहुत जरुरी है। यदि यह प्रकाशन पूर्व दी गई सूचनाओं पर आधारित विज्ञापन है तो प्रकाशक का दायित्‍व था कि संबंधित वेबसाइट को सूचना देते कि यह पुस्‍तक प्रकाशित नहीं की जा रही है कृपया इसे विज्ञापन से हटा दें, वेबसाइट को जब तक अधिकृत सूचना ना मिले वे इसे प्रकाशित या हटाने का काम नहीं करते...शिल्‍पायन बहुत सम्‍माननीय प्रकाशन संस्‍थान है, उसे तुरंत इस बारे में पूरी जानकारी देकर भ्रम दूर करना चाहिए और आवश्‍यक हो तो लेखक से क्षमायाचना करने में संकोच नहीं होना चाहिए।
    21 घंटे पहले · · 5
  • Sunita Kumari कभी-कभी ऐसा हो जाना स्वभाविक है लेकिन उसे सुधारा जा सकता है...
    21 घंटे पहले ·
  • अवनीश सिंह चौहान aadarneey maya mrig jee se mein sahamat hoon....
    16 घंटे पहले ·
  • Kumar Mukul चलिए मित्रों की बातों से बल मिला , कि मैंने गलत सवाल नहीं उठाया था, अब देखें कुछ ललित जी को भी समझ में आता है कि नहीं , अब मैं साइट से नाम हटने का इंतजार करूंगा ...बस, माया जी, ओम निश्‍चल जी, अवनीश जी सुनीता जी और कन्‍हैया जी आदि तमाम मित्रों का मैं आभारी हूं कि उनकी बातों से मुझे नैतिक बल मिला

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